The 1.5°C limit is now almost reached

ग्लोबल कार्बन बजट रिपोर्ट 2025: 1.5°C की सीमा अब लगभग पार

Climate कहानी, कोलकाता | 18 नवंबर 2025 : ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की ताज़ा रिपोर्ट ने दुनिया को चेताया है कि जलवायु संकट अब निर्णायक मोड़ पर है। वर्ष 2025 में जीवाश्म ईंधनों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में 1.1% की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यह 38.1 अरब टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।

⚠️ 1.5°C की सीमा लगभग खत्म

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखना अब लगभग असंभव हो गया है।
  • प्रो. पियरे फ्रिडलिंगस्टीन (एक्सेटर यूनिवर्सिटी) ने चेताया कि मौजूदा उत्सर्जन दर पर यह कार्बन बजट अगले पाँच सालों से पहले ही खत्म हो जाएगा।
  • जलवायु परिवर्तन धरती और महासागरों की प्राकृतिक कार्बन अवशोषण क्षमता को भी कम कर रहा है।

Global Carbon Budget Report 2025: The 1.5°C limit is now almost reached

रिपोर्ट कहती है कि ऊर्जा प्रणालियों का डीकार्बोनाइजेशन कई देशों में तेज़ी से हो रहा है, लेकिन यह अब भी बढ़ती ऊर्जा मांग की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है। भूमि उपयोग परिवर्तन (जैसे वनों की कटाई) से होने वाले एमिशन में गिरावट के बावजूद कुल एमिशन में कमी नहीं आई।

📊 रिपोर्ट की मुख्य बातें

  • चीन: उत्सर्जन 0.4% बढ़ा, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ोतरी से वृद्धि धीमी रही।
  • भारत: उत्सर्जन 1.4% बढ़ा, पर समय से पहले आए मॉनसून और सौर ऊर्जा विस्तार ने कोयले की खपत सीमित रखी।
  • अमेरिका: ठंडे मौसम के कारण उत्सर्जन 1.9% बढ़ा।
  • यूरोपीय संघ: उत्सर्जन 0.4% बढ़ा।
  • जापान: उत्सर्जन 2.2% घटा।
  • बाकी दुनिया: उत्सर्जन 1.1% बढ़ा।
  • विमानन क्षेत्र: उत्सर्जन 6.8% बढ़ा, कोविड-19 से पहले के स्तर से भी ऊपर।
  • तेल, गैस और कोयला: तीनों से उत्सर्जन में इज़ाफा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखना “लगभग असंभव” हो गया है।

एक्सेटर यूनिवर्सिटी के ग्लोबल सिस्टम्स इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर पियरे फ्रिडलिंगस्टीन ने कहा, “वर्तमान एमिशन दर पर 1.5°C का कार्बन बजट अगले पाँच सालों से पहले ही खत्म हो जाएगा।” उन्होंने चेताया कि जलवायु परिवर्तन अब धरती और महासागरों की प्राकृतिक कार्बन अवशोषण क्षमता को भी कम कर रहा है।

🌳 अमेज़न और दक्षिण एशिया पर संकट

  • दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के जंगल अब कार्बन अवशोषक नहीं रहे, बल्कि उत्सर्जन स्रोत बन गए हैं।
  • अमेज़न में वनों की कटाई में सुधार हुआ, लेकिन 2024 की आग ने दिखाया कि यह इकोसिस्टम बेहद संवेदनशील है।

रॉयल सोसाइटी की प्रोफेसर कोरीन ले क़्वेरे ने कहा, “हालांकि कई देशों ने आर्थिक विकास के साथ अपने एमिशन कम किए हैं, लेकिन प्रगति अब भी बहुत नाजुक है। कार्बन सिंक्स की क्षमता पर जलवायु परिवर्तन का असर चिंताजनक है।”

🇮🇳 भारतीय संदर्भ

  • भारत की उत्सर्जन वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही।
  • बिजली की माँग और बढ़ते तापमान आने वाले वर्षों में नई चुनौतियाँ लाएँगे।
  • भारत ने उत्सर्जन तीव्रता में कमी के अपने लक्ष्यों की दिशा में प्रगति दिखाई है।
  • लेकिन रिपोर्ट बताती है कि अकेले कोई देश इस संकट से नहीं निपट सकता।

रिपोर्ट ने बताया कि दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्सों में जंगल अब कार्बन अवशोषक नहीं रहेबल्कि कार्बन एमिशन स्रोत बन गए हैं। अमेज़न में वनों की कटाई में कुछ सुधार हुआ हैपर 2024 की आग ने दिखाया कि यह इकोसिस्टम अब भी बेहद संवेदनशील है।

🧪 विज्ञान का साफ संदेश

  • CICERO के शोधकर्ता ग्लेन पीटर्स ने कहा: “पेरिस समझौते को हुए दस साल हो गए, और अब भी जीवाश्म ईंधनों से उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। देशों को अब अपनी प्रतिबद्धताओं को कार्रवाई में बदलना होगा।”
  • 2025 में वायुमंडल में CO₂ की सांद्रता 425.7 ppm तक पहुँच जाएगी, जो औद्योगिक युग से पहले के स्तर से 52% ज़्यादा है।

CICERO के शोधकर्ता ग्लेन पीटर्स ने कहा, “पेरिस समझौते को हुए दस साल हो गएऔर अब भी जीवाश्म ईंधनों से एमिशन लगातार बढ़ रहा है। देशों को अब वाकई अपनी प्रतिबद्धताओं को कार्रवाई में बदलने की ज़रूरत है।”

🚨 क्लाइमेट एक्शन की असली परीक्षा

ग्लोबल कार्बन बजट 2025 बताता है कि अब वक्त वादों का नहीं, क्रियान्वयन का है

  • 1.5°C की सीमा को बचाना मुश्किल है।
  • लेकिन अगर दुनिया तुरंत और निर्णायक कदम उठाए, तो भविष्य को बदला जा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में वायुमंडल में CO₂ की सांद्रता 425.7 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) तक पहुँच जाएगीजो औद्योगिक युग से पहले के स्तर से 52% ज़्यादा है।

Climate story. India is getting scorched by the pace of climate change

ग्लोबल कार्बन बजट 2025 बताता है कि अब वक्त वादों का नहींक्रियान्वयन का है। 1.5°C की सीमा को बचाना मुश्किल हैलेकिन अगर दुनिया तुरंत और निर्णायक कदम उठाए—तो अब भी भविष्य बदला जा सकता है।

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