कोलकाता। आज 1 दिसंबर, चंद्रवार उदयातिथि की मान्यतानुसार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी या ‘मोक्षदा एकादशी’ को पवित्र ‘श्रीमद्भागवत गीता’ की पावन 5162वीं जयंती है। ‘गीता जयंती’ के पावन अवसर पर आप सभी को हार्दिक बधाई और मंगलमय जीवन की कामना करता हूँ। ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का महत्व इसी से आप समझ सकते हैं कि दुनिया का यही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाई जाती है।
📌 द्वापर युग में मार्गशीर्ष (अग्रहण) माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र की युद्ध-भूमि में ही अपने कर्तव्य-पथ से विचलित हो रहे, पार्थ (अर्जुन) को ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का पवित्र उपदेश दिया था। इसी कारण मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को ही ‘श्रीमद्भागवत गीता जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। ‘श्रीमद्भागवत गीता’ में भगवान श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया हैं, वह किसी विशेष धर्म या संप्रदाय के लिए न होकर पूरे विश्व मानव समाज के लिए ही पथ-प्रदर्शक हैं। फलतः ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का महत्व न केवल सनातनी अनुयायी या फिर भारत तक सीमित है, बल्कि विदेशों में भी लोग ‘श्रीमद्भागवत गीता’ को आदर की दृष्टि से देखते और विशेष सम्मान प्रदान करते हैं।
📌 “महाभारत” के 18 पर्व (खंड) हैं, जिसमें छठा पर्व ‘भीष्म पर्व’ कहलाता है। यह पर्व मुख्यतः कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों व कौरवों की सेनाओं के बीच युद्ध के आरंभ का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है । इस अवधि में कौरव सेना के प्रधान सेनापति इच्छा मृत्यु के आशीर्वाद से सशक्त भीष्म पितामह थे। उन्होंने ही कौरव-सेना का नेतृत्व किया था। अतः नायकत्व या पात्र-विशेष की दृष्टि से इस पर्व का नाम, उनके ही नाम पर ‘भीष्म पर्व’ रखा गया है। इसमें कुल 124 अध्याय हैं, जबकि कुछ स्रोतों में 122 या फिर 117 अध्यायों का भी उल्लेख है।

📌 ‘भीष्म पर्व’ में कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में युद्ध के लिए तैयार दोनों पक्षों की सेनाओं में युद्ध-सम्बन्धी नियमों का निर्णय, संजय द्वारा धृतराष्ट्र को युद्ध-भूमि का महत्व बतलाते हुए जम्बूखण्ड के द्वीपों का वर्णन, शाकद्वीप तथा राहु, सूर्य और चन्द्रमा का प्रमाण, दोनों पक्षों की सेनाओं का आमने-सामने होना, युद्ध के मैदान में अपने संगे-संबंधियों को अपने सामने देखकर अर्जुन के मन में उत्पन्न युद्ध-विषयक विषाद तथा व्याह-मोह को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण द्वारा उपदेश (श्रीमद्भगवद्गीता) सुनाना, उभय पक्ष के योद्धाओं में भीषण युद्ध तथा भीष्म के वध और शर-शय्या पर लेटकर उनके प्राण-त्याग के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने आदि क्रियाओं का निरूपण हुआ है।
📌 ‘भीष्म-पर्व’ की उन सभी घटनाओं में से ‘श्रीमद् भगवद्-गीता’ अर्थात श्रीकृष्ण द्वारा गीता का उपदेश ही सबसे महत्वपूर्ण घटना है। युद्ध-क्षेत्र में अपने विरुद्ध अपने ही भाइयों और गुरुजनों को देखकर उनसे युद्ध करने से श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन विचलित हो जाते हैं। तब श्रीकृष्ण उसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, निष्काम कर्म, धर्म-अधर्म, आत्मा-अनात्मा आदि का दिव्य उपदेश सुनाते हैं। तब कहीं जाकर अर्जुन अपने कर्तव्य-भाव से प्रेरित होकर युद्ध-कर्म के लिए उन्मुख होते हैं। युद्ध के आरंभ-सूचक शंखनाद होते हैं। कुरुक्षेत्र युद्ध का वास्तविक आरंभ इसी ‘भीष्म पर्व’ से माना जाता है। पहले दिन से लेकर दसवें दिन तक का महायुद्ध भीष्म पितामह के नेतृत्व में लड़ा जाता है। भीष्म की युद्ध कौशल और पराक्रम अद्भुत रहा था।
📌 ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का प्राकट्य, भारतीय दर्शन की प्रमुख धुरी है। यह दर्शाता है कि धर्म ही कर्तव्य, नीति और न्याय संबंधित युद्ध के काल का मार्ग-दर्शन करता है। गीता के उपदेश 24 अध्यायों में लगभग 700 श्लोकों में वर्णित है। महाभारत के युद्ध का अधिकांश रण-नीतिक ढांचा, यही पर्व स्थापित करता है। श्रीकृष्ण मुख से उद्भूत ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का मुख्य सार-बिंदुओं इस प्रकार से है –
📍1. निष्काम कर्मयोग : मनुष्य को अपने कर्तव्य-कर्म को निष्काम भाव से करना चाहिए, लेकिन उसके फल की उसे कभी चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि फल की लालसा, मन अशांत करता है, जिससे उसका कर्तव्य-कर्म बाधित होता है। इसलिए निष्काम कर्म ही सर्वदा श्रेष्ठ-क्रम होता है। दूसरे में कर्म करने का ही हमारा अधिकार होता है, उसके फल पर हमारा कदापि अधिकार नहीं होता है । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥”
अर्थात, – ‘अपने कर्तव्य का पालन करो, लेकिन परिणामों की चिंता मत करो। कर्मफल को ही अपने कर्म का कारण मत बनाओ और कर्म न करने में भी मत लगे रहो।’
📍2. आत्मा अमर है : शरीर जन्म लेता है और कालानुसार मिट जाता है। लेकिन आत्मा न तो, कभी जन्म लेती है और न कभी मरती ही है, वह अमर है, वह अक्षय है, वह शाश्वत है, वह अविनाशी है और वह सनातन है, जबकि भौतिक शरीर नश्वर है। आत्मा पुराने कपड़ों के समान ही शरीर को त्यागकर, नए कपड़े रूपी शरीर को धारण करती है। इसलिए अपने संबंधियों के जन्म-मृत्यु से बंधा हुआ शरीर को नष्ट होने पर शोक करना अज्ञानता ही है।
“न जायते म्रियते वा कदाचिन् नैनं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥”
📍3. धर्म और कर्तव्य सर्वोपरि : व्यक्ति के लिए उसके नैतिक और सामाजिक दायित्व या कर्तव्य ही सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसका साफ मतलब है कि अपने कर्तव्यों का पालन करना ही व्यक्ति का सबसे बड़ा धर्म होता है। अतः व्यक्ति को इसे ही सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। जीवन में परिस्थितियाँ कैसी भी हों, व्यक्ति को अपने धर्म से च्युत न होकर, उसका निरंतर पालन करना आवश्यक है। यही ईश्वरीय विधान है। अतः धर्म से विमुख होने पर जीव को पाप लगता है ।
📍4. इन्द्रिय-संयम : इंद्रिय-संयम का अर्थ होता है, इंद्रियों को अनुशासित करना और मन को सांसारिक आकर्षणों से हटाना, जिससे मन आत्मकेंद्रित और स्थिर हो सके। ध्यान, वैराग्य और जागरूक मन में ही इंद्रिय-संयमित हो सकते हैं, जो हमारी आंतरिक शांति और ज्ञान को बढ़ावा देती है। इन्द्रियों पर नियंत्रण ही शांत, संतुलित और मजबूत व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
📍5. भक्ति का महत्व : भक्ति के संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं, – “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” अर्थात ‘तुम सभी कर्तव्यों (धर्मों) को त्यागकर, केवल मेरी (ईश्वर की) शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, इसलिए शोक मत करो । मनुष्य चाहे किसी भी मार्ग से चले, ज्ञान या कर्म या योग से, परंतु अंत में उसे मुक्ति भक्ति से ही प्राप्त होगी । ईश्वर से प्रेम और उन्हीं पर विश्वास सर्वोपरि है।
📍6. सत्व, रज, तम गुण : मनुष्य की चेतना तीन भौतिक गुणों यथा; – सत्व, तम और रज से जुड़ी होती है, जो न केवल मनुष्य की चेतना और चरित्र को निर्धारित करते हैं, बल्कि उसके जीवन के कर्म, मिलने वाले फल और उसकी मृत्यु के बाद की उसकी दशा को भी तय करते हैं। मनुष्यों में यह क्षमता होती है कि वह अपनी चेतना के स्तर को, अपनी क्षमता के हिसाब से प्रभावित कर सकता है। मनुष्य अपने बुद्धि-ज्ञान और अनुभव के आधार पर, इनमें से श्रेष्ठ गुण को अपनी चेतना में अधिक स्थान दे सकता है और बाकियों को कमतर कर सकता है। तभी उसका जीवन श्रेष्ठ स्वरूप को प्राप्त कर सकता है।
📍7. विश्वस्वरुप योगेश्वर कृष्ण : श्रीकृष्ण अपने उपदेशों के महत्व को स्थापित करने के लिए अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाते हैं। उनके विराट स्वरूप के चार गुण हैं; अनंत भुजाओं वाला (असंख्य बाहें), सूर्य और चन्द्र रूपी नेत्रों वाला (आँखें सूर्य और चंद्रमा हैं), प्रज्वलित अग्नि रूपी मुख वाला (जलता हुआ मुख) और अपने तेज से संसार को तपाने वाला (पूरे विश्व को अपने तेज से गर्म करना) हैं। श्रीकृष्ण योग के स्वामी हैं, जिन्होंने अर्जुन को कर्म, भक्ति और ज्ञान योग का उपदेश दिया। श्रीकृष्ण के विश्वव्यापी और अविनाशी स्वरूप यह सिद्ध करता है कि ईश्वर सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। अर्जुन कहता है, – ‘हे विश्वेश्वर! मैं आपके न आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देख पा रहा हूँ।’
“नान्तं(न्) न मध्यं (न्) न पुनस्तवादिं (म्), पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥”
📍8. जन्म-मरण से मुक्ति या मोक्ष : मोक्ष का अर्थ है, जन्म और मृत्यु के चक्र (सांसारिक जीवन) से आत्मा की पूर्ण मुक्ति, जहाँ वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होकर परम आनंद या परम सत्य (ईश्वर) को प्राप्त कर लेती है । यह एक आध्यात्मिक अवस्था होती है, जिसमें आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है और जन्म-मरण, भय तथा सांसारिक चिंताओं से परे हो जाती है। ईश्वर-भक्ति, ज्ञान और निष्काम कर्म से ही आत्मा उस दिव्य मोक्ष को प्राप्त कर सकती है।
‘श्रीमद्भागवत गीता’ मानव-मात्र को ही जीवन की चुनौतियों का सामना करने, कर्म के प्रति सजग रहकर उसे संपादित करने पर ध्यान केंद्रित करने और सही व गलत तथ्यों के बीच के अंतर को समझ पाने की क्षमता प्रदान करती है। यह आत्मज्ञान, भक्ति और योग का अद्वितीय त्रिवेणी-भाव-संगम है, जो व्यक्ति में मानसिक शांति और आत्मविश्वास को बढ़ाती है। गीता, जीवन के हर पहलू के लिए समाधान प्रदान करती है और एक नया समाज बनाने के लिए लोभ, अहंकार, और स्वार्थ से दूर रहने की प्रेरणा देती है।
(गीता जयंती विशेष, 1 दिसंबर, 2025)
श्रीराम पुकार शर्मा,
अध्यापक व लेखक
ई-मेल सम्पर्क – rampukar17@gmail.com
(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक
ई-मेल सूत्र – rampukar17@gmail.com
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