“गंगा! तू कितनी क्रूर निकली, निगल गई मेरा जवईनिया”
गंगा! तू माँ नहीं, अब एक जलजला है,
जिसने हमारे जवईनिया को क्रूरता से निगला है।
हमने तुझे पूजा, तुझसे जीवन माँगा,
तूने हमें मौत दी, और दर्द का दरिया थमा दिया।
वो मिट्टी, जिसमें हमारी जड़ें थीं,
वो आँगन, जिसमें हमारी यादें थीं।
तूने सब कुछ खींच लिया अपने गर्भ में,
बिना पछतावे, बिना एक आँसू के।
क्या यही है तेरी ममता की परिभाषा?
तूने माँ बनकर कभी सहारा नहीं दिया,
बल्कि बाढ़ बनकर छीन लिया सब,
तू एक क्रूर देवी बन गई – शांत दिखती, पर भीतर से निष्ठुर।
जब दीवारें काँप रही थीं,
जब बच्चे चीख रहे थे,
जब बुज़ुर्ग जमीन छोड़ने को मजबूर थे,
तू बहती रही – जैसे कुछ भी मायने नहीं रखता।
जवईनिया अब तेरे पेट में समा चुका है,
पर हमारी चीखें अब तुझे चैन से बहने नहीं देंगी।
हर धार में, हर लहर में,
अब तू हमारी बद्दुआओं का बोझ भी ढोएगी।
हमने तुझे “गंगा मैया” कहा,
पर तू माँ नहीं निकली,
तू तो निकली एक क्रूर प्रवाह,
जो श्रद्धा खाकर, अस्तित्व बहा ले गई।
बद्रीनाथ पाण्डेय

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