वाराणसी। सनातन धर्म में गणेश महोत्सव का विशेष महत्व है। यह त्योहार महाराष्ट्र और गुजरात समेत देश के कई राज्यों और विदेश में उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। खासकर, महाराष्ट्र में गणेश पूजा को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है। हर घर में प्रतिमा स्थापित कर विधि विधान से गणपति बप्पा की पूजा की जाती है।
धार्मिक मत है कि भगवान गणेश की पूजा करने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के दुख और संकट दूर हो जाते हैं। सनातन धर्म में भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है।
कब से शुरू होता है गणेश महोत्सव? हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश महोत्सव शुरू होता है। वहीं, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। दस दिवसीय गणेश महोत्सव देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है।
कब मनाया जाएगा चौरचन? हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर चौरचन मनाया जाता है। यह पर्व बिहार में धूमधाम से मनाया जाता है। मैथिली पंचांग के अनुसार, 26 अगस्त को चंद्र देव को समर्पित चौरचन मनाया जाएगा। इस शुभ अवसर पर संध्याकाल में चंद्र देव की पूजा की जाती है।
कब से शुरू होगा गणेश महोत्सव? सनातन धर्म में निशा काल पूजा को छोड़कर अन्य सभी पूजा में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए गणेश चतुर्थी पर उदया तिथि से गणना की जाएगी। इस प्रकार 27 अगस्त से गणेश महोत्सव की शुरुआत होगी। वहीं, 06 सितंबर को गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा।
स्थापना मुहूर्त : ज्योतिषियों के मुताबिक गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापना के लिए 27 अगस्त को सुबह 11 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 40 मिनट तक का शुभ मुहूर्त रहेगा। आप इस अवधि में गणपति जी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं।
गणेश चतुर्थी दुर्लभ संयोग : इस बार गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि, रवि के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का संयोग बना रहेगा। वहीं कर्क में बुध और शुक्र के होने से लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होगा। इसके अलावा गणेश चतुर्थी पर बुधवार का महासंयोग तिथि की महत्ता को गई गुना बढ़ा रहा है।
कैसे करें गणपति की स्थापना और पूजा? प्रातःकाल स्नान के बाद सबसे पहले व्रत और पूजा का संकल्प लें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। गणेश जी की मूर्ति को स्थापित करें, उन पर गंगाजल छिड़कें और उनका अभिषेक करें।
गणपति को सिंदूर, दूर्वा (21 पत्तियाँ), लाल फूल, मोदक, लड्डू, नारियल, गन्ना, फल और नैवेद्य अर्पित करें। गणेश चालीसा, अथर्वशीर्ष या फिर गणपति स्तोत्र का पाठ करें। पूजा के अंत में घंटा, शंख और मंजीरे के साथ गणेश जी की आरती करें।
यह पूजा प्रक्रिया सायंकाल के समय भी दोहराई जाती है, ताकि दिन भर गणेशजी की उपासना बनी रहे। पूजा के बाद किसी ब्राह्मण को भोजन और दान देकर फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।
गणेश चतुर्थी का महत्व : हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन दोपहर के समय हुआ था, इसीलिए इस तिथि और समय को अत्यंत शुभ माना जाता है। वे प्रथम पूज्य, बुद्धि के दाता और विघ्नों को हरने वाले देवता हैं।
कोई भी धार्मिक कार्य, विवाह, यात्रा या नया कार्य बिना गणपति पूजन के शुरू नहीं किया जाता। इस दिन का भक्तों को सालभर इंतज़ार रहता है क्योंकि यह दिन उनके लिए उत्सव, भक्ति और आनंद से भरा होता है।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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