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विनय सिंह बैस की कलम से – सावन वाला सच्चा प्यार!!

विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। बहुत समय पहले की बात है। तब मैं छोटा बच्चा हुआ करता था। सावन का महीना था। उस दिन आज ही की तरह आसमान जैसे उमड़ा पड़ा था- बड़ी-बड़ी बूँदें झमाझम बरस रही थीं। बैसवारा के बरी गांव के ‘चौघरा’ मुहल्ले की कच्ची गलियों में तेज धार के साथ पानी बह रहा था। छप्परों से पानी की मोटी-मोटी धारियाँ गिर रही थीं और हवा में भीगती मिट्टी की सुगंध और निबौरियों के सड़ने की दुर्गंध की मिश्रित सी गंध नथुनों में घुस रही थी।

बड़े-बूढ़े और ज्ञानीजन कहते हैं कि ‘इश्क’ और ‘मुश्क’ पर किसी का जोर नहीं चलता है। लेकिन मेरा खुद का अनुभव कहता है कि इश्क और मुश्क के अलावा दो चीजें और हैं जिन पर मनुष्य का जोर नहीं चलता है। वह दो चीजें हैं – ‘एक नंबर’ और ‘दो नंबर’। इन पर भी इंसान का जोर कहाँ चलता है।

जेठ की चिलचिलाती धूप हो, माघ की हाड़ कंपा देने वाली ठंडी हो या भादों की भद्दर बरसात हो; एक बार इन दोनों ने अपने आने की अकस्मात सूचना दे दी तो फिर आकर ही रहेंगी। छोटा बच्चा हो चाहे गबरू जवान, अधेड़ हो चाहे बूढ़ा, नर हो चाहे नारी; थोड़ी देर इन्हें रोक तो सकता है, कुछ विलंब तो करा सकता है, पर टाल हरगिज नहीं सकता। इससे पंगा लेने वालों का कई बार सरेआम अगवाड़ा गीला और पिछवाड़ा पीला होते भी देखा गया है।

तो हुआ यूं कि एक बार ऐसे ही सावन की मूसलाधार बरसात में, जब दुपहरिया भी शाम जैसी लग रही थी; तब मुझे जोर से ‘दो नंबर’ लग आई। थोड़ी देर तो मैंने बर्दाश्त किया कि इंद्र देवता कुछ शांत होंगे तब मैं नित्यकर्म (जो कि उस समय आपातकालीन कर्म बन चुका था) से निबट लूंगा। लेकिन उस दिन इंद्र महाराज पूरी रौ में थे, पूरे फॉर्म में थे; रुकने, थकने, विश्राम लेने का नाम ही न ले रहे थे। इसलिए मजबूरन मुझे झमाझम बारिश में ही ‘पाकिस्तान’ जाने का निर्णय लेना पड़ा।

उन दिनों घरों में आमतौर पर शौचालय नहीं हुआ करते थे। जो थोड़े समृद्ध थे, वे भी यह मानते थे कि रसोई और शौचालय एक घर में कैसे हो सकते हैं भला? हम समृद्ध थे या नहीं, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह जरूर पता है कि मेरे घर में शौचालय नहीं था। इसलिए मैं बड़ा सा काला वाला छाता (जिसकी डंडी लकड़ी की थी) लेकर घर के पास वाले तालाब की तरफ कुछ सीधा, कुछ टेढ़ा होकर जाने लगा।

तालाब के रास्ते में सबसे पहले भैंसों को बांधने की जगह जिसे हम चक्की कहते थे (एक जमाने में वहां गेंहू पीसने वाली पत्थर के दो बड़े पाट वाली चक्की हुआ करती थी जिसे बैलों के माध्यम से चलाया जाता था) आती थी, फिर बाईं तरफ लेखपाल बाबा का बड़ा सा खेत और दाईं तरफ राठौर फूफा की फुलवारी जिसमें जामुन, नीम आदि के छोटे-बड़े पेड़ थे, आया करता था। उसके कुछ आगे बढ़ने पर ऑफर (खलिहान) आता, फिर पीपल का बड़ा सा बूढ़ा पेड़ दिखता, उसके आगे पुत्तू बाबा का घूर, फिर मेरा घूर और उसके आगे सीधा दनकुंवा ताल, जहां हमें निपटने जाना था।

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वैसे तो यह कुल दूरी बमुश्किल सौ मीटर होगी, साफ-सीधे मौसम में दो मिनट का रास्ता होगा लेकिन चूंकि उस दिन कुछ ज्यादा ही जोर से बारिश हो रही थी, नाली अपनी सीमायें तोड़कर गली तक जा पहुंची थी और गली एक बड़ी नाली बन चुकी थी। यानि गली और नाली का फर्क मिट चुका था। बस अंतर यह था कि नाली के काले, शांत पानी की जगह गली में धूसर, उफनता हुआ, झागयुक्त, बुलबुले वाला पानी बह रहा था। वैसे तो मैं ताल तक की गली से भलीभांति परिचित था। न जाने कितनी बार सुबह-शाम, अंधेरे-उजाले, अकेले-दुकेले गया था। लेकिन उस दिन वही कच्ची गली एक चौड़ी नाली या छोटी नहरिया बन चुकी थी। कहाँ से शुरू है, कहाँ खतम, इसका अंदाज लगाना मुश्किल था।

इसलिए मैं एक हाथ से छाता पकड़े, दूसरे से लोटा पकड़े हुए बड़ी सावधानी से धीरे-धीरे टो-टो (टोह-टोह) करके कदम रखते हुए अपनी मंजिल की तरफ जा रहा था। चक्की पार करके अभी फूफा की फुलवारी के पास पहुंचा ही था कि मुझे लगा कि छोटे वाले नीम के पेड़ की डाली पर एक आकृति सामने वाले घर की तरफ मुंह करके बैठी हुई है। पहले तो मुझे लगा कि शायद मुझे कुछ भ्रम हुआ है। हो सकता है कि बारिश के कारण मैं ठीक से देख नहीं पाया। लेकिन थोड़ा और आगे बढ़ा तो मेरा शक, पुख्ता विश्वास में बदल गया। यह कोई मानव जैसी ही आकृति थी जो नीम की डाल पर पैर नीचे लटकाकर बैठी हुई थी।

उस समय मुझे लगा कि अम्मा और दादी से जो भूतों की कहानियां संझा को सुनते आया हूं, वह आज सच हो गई। सचमुच ही इस नीम की डाल पर कोई भूत-प्रेत बैठा हुआ है। शायद उसके पांव भी उल्टे होंगे और वह नजदीक जाते ही नाक से बोलते हुए मुझसे तंबाकू या बीड़ी मांगेगा। न देने पर वह भूत मुझे लग जायेगा, मुझे अपने वश में कर लेगा। फिर काया मेरी होगी पर कंट्रोल उसका होगा। जबान मेरी होगी, बोल उसके होंगे। चेहरा मेरा होगा, पर हाव-भाव उसके होंगे। यह कल्पना करते ही मैं सिहर उठा, कांप गया। मुझे बारिश के मौसम में पसीना जैसा आने लगा। डर के मारे मैं ‘दो नंबर’, ‘एक नंबर’, गड्ढे, पानी, बारिश सब कुछ भूल गया और उल्टे पांव घर की तरफ दौड़ लगा दी।

मुझे तेजी से घर की ओर वापस आते देख छोटे बाबा ने हैरत से पूछा कि- “का होइगा? कौनो कुकुर दौड़ा लिहिस का? कि कौनो करिया सांप देखि लेह्यो रस्ता मां?? ”

मैंने रुककर लगभग हांफते और कांपते हुए कहा- “नहीं बाबा, फूफा की फुलवारी वाली छोटकी नीम की डाल पर कोई भूत बैठा हुआ है।”

बाबा बोले -“अरे बंदार-वंदार होई कौनो। अपने गुट्ट (झुंड) से बिछुड़ि गा होई। और को एत्ती बरसात मां पेड़ पै जान देई।”

मैंने पूरे विश्वास से कहा- “नहीं बाबा। बंदर नहीं है। मैंने बिल्कुल पास से देखा है। कोई बिल्कुल आदमी जैसा भूत है।”

बाबा को मेरी बात पर विश्वास तो बिल्कुल नहीं हुआ, फिर भी मुझे आश्वस्त करते हुए बोले- “चलो हमहू देखी को एत्ती बरसात मां सती हून जा रहा है।”

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फिर बाबा ने एक हाथ से मोटी वाली लाठी उठाई (जिसके दूर और मोटे वाले भाग में लोहे के तीन-चार रिंग लगे हुए थे), दूसरे हाथ से छाता पकड़ा और मेरे साथ तालाब की ओर चल पड़े। नीम के पास पहुंचने से पहले ही मैंने हाथ से इशारा किया कि वह देखो बाबा, उस डाल पर भूत बैठा हुआ है। पैर नीचे लटकाए, पूरब की तरफ वाले घर की ओर मुंह करके।

बाबा ने देखा तो सचमुच में कोई नीम के पेड़ पर बैठा हुआ था। वह मुझे पीछे करके खुद आगे बढ़ते हुए बिल्कुल नीम के पास गए और उस आकृति को पहचान कर बोले – “अरे ई तो दीपू अहीं। लेकिन ई बरजोर बारिश मां बैताल काहे बने पड़े हैं?? खैर, तुम जाव निपटि के आव, तब तक हम इनके हालचाल लेइत है।”

मैं निपट के आया तो बाबा अपनी पूछताछ पूरी कर चुके थे। उन्हें दीपू भैया के इस ‘प्रेतावतार’ का गूढ़ रहस्य भी समझ आ चुका था। लेकिन मैं तो अब भी अनजान और भयाक्रांत था इसलिए बाबा से पूछा :- “बाबा, दीपू भैया पेड़ पर क्यों बैठे हुए हैं? घर से नाराज हैं क्या?? ”

बाबा शायद मुझे वह सच बताना नहीं चाहते थे, जो मेरी उम्र के लिए ठीक नहीं था। इसलिए बात को टाल गए और मुझसे बड़े दुलार से बोले:- “मुन्ना, तुम जल्दी से घरै जाव नहीं तो भीजि जइहो। सर्दी-जोखाम होइ जाई। हाथ जरुर राख से धोइ लेह्यो।”

लेकिन कहते हैं न कि ‘एक नंबर’ और ‘दो नंबर’ के अलावा ‘इश्क’ और ‘मुश्क’ भी किसी के छुपाए नहीं छुपते। कुछ दिन बाद मेरे हमउम्र एक खबरी ने मुझे सूचना दी कि दीपू भैया आजकल गोविंदा बने घूम रहे हैं। बाल बड़े कर लिए हैं, बीच से मांग निकालते हैं। पीछे के बालों को गोविंदा जैसा लुक देने के लिए मोटी गेटिस (इलास्टिक) माथे से पीछे तक पहनते हैं। बाप के रहते हुए भी क्लीन शेव करा लिया है और आगे वाली जेब में पेन जैसी कंघी डालके घूमते हैं। गोविंदा की फिल्मों के गाने पर अकेले में नाचते हैं और सबके सामने उन्हीं फिल्मों के गीत गुनगुनाते रहते हैं।

दरअसल उन्हें तालाब के दूसरी तरफ के घर में रहने वाली ‘दिव्या भारती’ से बहुत जोर से प्यार हो गया है। इतना जोर कि जब-तब आउट ऑफ कंट्रोल हो जाते हैं। फिल्मी डॉयलोग बोलने लगते हैं, उसके साथ जीने मरने की कसमें खाने लगते हैं। अपनी दिव्या भारती को इंप्रेस करने के लिए ही वह उस दिन भरी बरसात में पेड़ पर बैठकर मजनूं बने हुए थे। इससे पहले एक बार जेठ की भरी दुपहरी में ऊसर में खड़े होकर भी वह हीर बनकर अपने प्रेम की परीक्षा दे चुके हैं।

आजकल वह जहां देखो एक ही गाना गुनगुनाते रहते हैं- :-
“मैं पागल, प्रेमी दीवाना…..
दिल तेरी मोहब्बत का मारा।
तू रूठी तो रूठ के इतनी दूर चला जाऊंगा।
सारी उमर पुकारे फिर भी लौट के न आऊंगा।
लौट के न आऊंगा….. ओ ओ, ओ ओ…”

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उस समय की बाली उमरिया में टीवी और मुंडन, छेदन में वीसीआर पर चलने वाली बॉलीवुड की सुखांत फिल्में देखकर विश्वास हो चला था कि सच्चा प्रेम करने वाले एक न एक दिन मिलते जरूर हैं। घर, गांव, समाज के लोग कितना भी उपहास उड़ाएं, विरोध करें लेकिन दो जिस्मों को एक जान होने से रोक नहीं पाते हैं। सारी कायनात सच्चे प्रेमियों को मिलाने में लग जाती है। सच्चा प्यार कभी असफल हो ही नहीं सकता। इसलिए दीपू भैया का प्यार भी एक न एक दिन जरूर सफल होगा। उन्हें उनकी दिव्या भारती मिलकर ही रहेगी। ‘प्यार वाले भगवान’ के घर देर तो हो सकती है लेकिन अंधेर नहीं हो सकती है।

लेकिन अफसोस कि मेरी सारी कल्पनाएं और जज्बात फिल्मी ही निकले। दीपू भैया गोविंदा जितने भाग्यशाली नहीं रहे। उनकी प्रेमिका भी दिव्या भारती जितना साहस नहीं जुटा पाई। उनकी प्रेम कहानी का अंत ‘शोला और शबनम’ की तरह बिल्कुल भी नहीं हुआ। सुनते हैं कि गोविंदा यानि कि हमारे दीपू भैया के प्यार की भनक लगते ही दिव्या भारती के घरवालों ने उनकी पढ़ाई तत्काल प्रभाव से बंद कराकर उनके लिए लड़का ढूंढना शुरू कर दिया। और अगले सावन से पहले ही उन्होंने दिव्या भारती के हाथ पीले और हमारे दीपू भैया के सारे अरमान बिन बारिश गीले कर दिए।

मुझे आज भी इस बात की पीड़ा है कि हमारे दीपू भैया की एकदम सच्ची वाली प्रेम कहानी का बॉलीवुड प्रेम कथाओं की तरह सुखांत न होकर, ग्रीक और रोमन प्रेम कथाओं की तरह क्लाइमेक्स बिल्कुल दुखांत हुआ।

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