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विनय सिंह बैस की कलम से – अब के बरस भेज भैया को बाबुल

“अब के बरस भेज भैया को बाबुल,
सावन में लीजो बुलाय रे।
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ,
दीजो संदेशा भिजाय रे।
अब के बरस भेज भैया को बाबुल…”

रायबरेली। सावन के महीने में बहन-बेटियों को मायके बुलाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। परंपरा यह भी रही है कि बहन-बेटियों का अपने आप या ससुराल पक्ष के किसी सदस्य के साथ मायके आना ठीक नहीं समझा जाता है। अमूमन कोई मायके वाला ही विदा कराने जाता है। बहनों को विदा कराने के लिए अक्सर उनके भाई और बुआ को विदा कराने के लिए भाई या भतीजे जाते रहे हैं।

पिता/चाचा सामान्यतः बेटियों को विदा कराने नहीं जाते थे। क्योंकि ऐसी मान्यता रही है कि जिसके पैर पूज लिए, फिर उसके घर में पानी भी नहीं पीना चाहिए। किसी विषम परिस्थिति में अगर पिता या चाचा को बिटिया को विदा कराने जाना ही पड़े तो वह बिटिया के गांव के किसी अन्य रिश्तेदार या उस गांव में ब्याही गई गांव-जवार की किसी अन्य लड़की के यहां भोजन-पानी कर लेते थे। इस तरह परंपरा का निर्वाह भी हो जाता था और पिता/चाचा को भूखे पेट सोना भी नहीं पड़ता था। कोई समस्या नहीं आती थी।

समस्या तब हुई जब हमारे ससुर जो कि दिखित राजपूत हैं, उन्होंने हम बैसों के यहां अपनी बिटिया की शादी कर दी। दिखित राजपूत मुख्यतः बांदा, फतेहपुर जिलों में पाए जाते हैं। इनका निकास वहीं से है। पुरानी hierarchy के अनुसार यह लोग अपने को बैसों से काफी बड़ा ठाकुर मानते हैं। बाँदा निवासी हमारे एक दिखित मित्र तो यह तक कहते थे कि गंगा के पार के सब ठाकुर हमसे छोटे हैं। अब प्रश्न यह कि बड़े ठाकुर, छोटे ठाकुरों के यहाँ अपनी बेटी का ब्याह क्यों करने लगे?

तो उत्तर यह कि एक किवदंती के अनुसार कभी किसी दिखित लड़की की किसी बैस नवयुवक ने आताताइयों से रक्षा की थी। तब से दिखिताना (गदागंज के आसपास का क्षेत्र) के दिखित बैसों के यहां शादी करने लगे। (इस पर पूरी कहानी फिर कभी)

मेरे पूरे परिवार बल्कि मेरे पूरे गांव में, मैं पहला व्यक्ति हूं जिसकी शादी दिखित राजपूतों के यहां हुई है। मेरी शादी के कुछ सालों बाद तक मेरी श्रीमती जी को विदा कराने उनके भाई वगैरह ही आते रहे। एक बार ऐसा संयोग हुआ कि मेरे ससुर जी स्वयं सावन के महीने में अपनी बिटिया को विदा कराने हमारे घर यानि लालगंज बैसवारा मुंबई से आ गए।

अब वह ठहरे पुराने परंपरावादी आदमी! कहने लगे कि मैं बिटिया के घर भोजन-पानी नहीं करूंगा। घरवालों और खुद उनकी बिटिया के अनुरोध पर उन्होंने पानी तो पी लिया लेकिन इस बात पर अड़ गए कि भोजन तो नहीं करूंगा। अब उनके साथ समस्या यह थी कि आस-पास उनके गांव कि कोई दिखित लड़की भी नहीं थी जिसके घर में वह भोजन कर लें। उनकी बहन का घर काफी दूर था।

चूँकि मेरा घर कानपुर-रायबरेली मुख्य सड़क पर है और घर से कुछ दूरी पर ही दो होटल (ढाबे) हैं। इसलिए दूसरा विकल्प यह था कि होटल/ढाबे से खाना मंगा लिया जाए। इस बात पर चर्चा हो ही रही थी कि इस ‘गंभीर समस्या’ का समाधान कैसे निकाला जाए। तब तक मैं कहीं से प्रकट हो गया और पूरी बात सुनने के बाद ससुर जी से पूरे सम्मान से कहा- “यह बहुत अच्छी बात है कि मुंबई जैसे अल्ट्रा मॉडर्न सिटी में रहते हुए भी आप परंपरा को मानते हैं।

फिर तो आप यह भी मानते होंगे कि बासी, तला-भुजा भोजन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है। आपकी उम्र में तो बिल्कुल हानिकारक होता है। इसलिए आप किसी सस्ते होटल/ढाबे का बासी भोजन करने के बजाए घर में ही भोजन करो और उसका भुगतान कर दो। आप यह मान लो कि आपने होटल में खाना खाया है।”

कुछ ना-नुकर के बाद ससुर जी इस बात पर मान गए। रात को बढ़िया से भोजन किया। सुबह का नाश्ता करने के पश्चात जब बिदा-बिदाई की तैयारी होने लगी तो ससुर जी अपनी बिटिया यानि मेरी श्रीमती जी से पूछने लगे कि भोजन के लिए कितना पैसा देना ठीक रहेगा। श्रीमती जी बोली – “पापा, क्या आप अपनी बिटिया के घर को अपना घर नहीं मानते? मानते हैं तो फिर घर में खाने के पैसे कौन देता है भला?”

लेकिन ससुर जी नहीं माने तो श्रीमती जी बोली – “ठीक है शुभ के लिए ₹100 बच्चों को दे दीजिए। आपकी बात भी रह जायेगी और बच्चे भी खुश हो जाएंगे।”

मैं बगल में ही खड़ा था। इसके पहले कि 100/- रुपये में बात फाइनल होती मैं तपाक से बोल पड़ा- “पापा, बोर्डिंग और लॉजिंग दोनों का चार्ज पड़ेगा। गांधी जी वाले नोट (500 रुपये) से कम में भला कैसे बात बनेगी।”

ससुर जी श्रीमती जी को देख कर मुस्कुराते हुए बोले- “बिटिया तुम तो कहती थी कि ‘इनको’ पैसों का कोई लालच नहीं है।”

श्रीमती जी बोली- “मैं तो अब भी कहती हूँ कि ‘इन्हें’ पैसों का कोई लालच नहीं है। लेकिन ‘दिखितों’ को देखते ही इनके अंदर का ‘बैस’ जाग उठता है।”

(विनय सिंह बैस)
जिनकी शादी दिखितों के यहां हुई है

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