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विनय सिंह बैस की कलम से : कहानी विंग कमांडर शर्मा जी की

नई दिल्ली। एयरफोर्स स्टेशन बीदर में हमारे एक सीनियर अधिकारी विंग कमांडर शर्मा जी (बदला हुआ नाम) थे। वह उस समय वायु सेना में आए थे (60s में) जब अधिकतर वायुयोद्धा अपनी तनख्वाह का बड़ा भाग अपने घर जरूर भेजते थे। शर्मा जी अपने घर के प्रति कुछ ज्यादा ही समर्पित थे। इसलिए अपने कुछ निजी खर्चों के लिए न्यूनतम राशि बचाकर वह सारा का सारा पैसा घर भेज दिया करते थे।

उस समय और समाज की परंपरा के अनुसार उनकी कम उम्र में शादी हो गई तो बच्चे भी जल्दी ही हो गए। कुछ ही वर्षों में बच्चे पढ़ने लिखने लगे। तब भी वह जितना भी पैसा बचाते घर भेज देते। कभी खाद खरीदने के लिए, कभी कपड़े वाली दुकान का हिसाब चुकता करने के लिए, कभी सुनार का पैसा देने के लिए।

कभी भतीजी की शादी में, कभी घर के कमरे बनाने के लिए, कभी ट्यूबवेल का पक्का कमरा बनवाने के लिए। उनकी तनख्वाह हर महीने खत्म हो जाती, लेकिन घरवालों की डिमांड खत्म न होती। अगले महीने से फिर यही सिलसिला शुरू हो जाता।

हालांकि तब संबंध दोनों तरफ से निभाए जा रहे थे जब तक कि उनके मां-बाप थे, तब तक तो पूरी छुट्टी के दौरान उन्हें पलकों पर रखा ही जाता था। राजकुमार की तरह घर में उनके खाने-पीने का ध्यान रखा जाता। उनकी मां रोज ही कुछ नया और देसी उनके खाने के लिए बनाती। पिताजी भी सब्जियों और फल का ढेर लगा देते।

दूध-दही घर में ही था, न होता तो बाहर से व्यवस्था करते। जाते समय गाय का दो किलो शुद्ध देसी घी भी देना न भूलते। पेड़ा, लड्डू, अमावट, गुलैया, चना-चबेना भी साथ बांध देते। शर्मा जी मना करते रह जाते पर मां-बाप के स्नेह के सामने आखिकार हार मान लेते।

मां-बाप के स्वर्गवास के पश्चात उनके भाई और परिवार के अन्य सदस्य भी उनका और उनकी पत्नी-बच्चों का मान सम्मान करते। जब तक वह घर में रहते, वह लोग उनके आगे पीछे घूमते रहते। लेकिन साथ ही अपनी डिमांड भी बताते रहते कि फलाना काम होना है, ढिमका काम अटका पड़ा है। पैसे मिल जाएं तो जल्दी से हो जाएगा।

शर्मा जी तुरंत ही पिघल जाते थे और जितना संभव हो सकता था, उसी समय पैसा दे देते। फिर छुट्टी से वापस आकर अगली तनख्वाह मिलते ही और पैसे गांव भेजते। कई बार तो पीएफ, आईएफबीए से लोन लेकर भी घरवालों की जरूरतें पूरी की।

घर में अपनी लगभग सारी जमा पूंजी देने के कारण उनके पास कोई पैसा नहीं बचता था। जितनी आय लगभग उतना ही व्यय। कोई जमा पूंजी नहीं। कहते किसके लिए पैसा बचाना, बच्चे पढ़ लिखकर कमाने लगेंगे।

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गांव में इतनी तो खेती है ही कि दो जून के भोजन की किल्लत न हो। उन्होंने पूरे 26 साल तक नौकरी की। आगे भी शायद करते लेकिन जब उनके जूनियर उनसे पहले प्रमोट हो गए तो उन्होंने supersession ग्राउंड पर सर्विस से डिस्चार्ज ले लिया।

अपनी 26 वर्ष की सेवा के दौरान वह राजस्थान के रेगिस्तान, उत्तर-पूर्व के दुर्गम क्षेत्रों, थॉइस की हाड़ कंपा देनी वाली ठंड में भी सेवा करते रहे कि उनके परिवार और घरवालों को कष्ट न हो। पैसों की कोई दिक्कत न हो। 26 वर्ष के पश्चात जब वह विंग कमांडर की रैंक से रिटायर हुए तो ठीक-ठाक पेंशन के अलावा उन्हें रिटायरमेंट बेनिफिट के तौर पर काफी पैसा मिला।

एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी और अब बड़े हो चले बच्चों से अपने ‘मन की बात’ कह डाली कि इतने वर्षों से मैं घर से बाहर रहा हूं। पूरी किशोरावस्था और जवानी में जंगल, पहाड़ो, बियाबानों में भटकता रहा हूँ। बंजारों की तरह जीवन रहा कि आज यहां तो कल वहां। अब मैं घर जाकर आराम करूंगा।

भगवान की कृपा से मेरे बच्चे भी बड़े हो गए हैं, कमाने भी लगे हैं। इसीलिए अब मैं अपने भाई-भतीजों के साथ हंसी-खुशी गांव में रहूंगा। बहुत कर लिया पीटी, परेड, अर्ली पार्टी, नाईट फ्लाइंग। बहुत सुन लिया सीनियर के आदेश, बहुत सह लिया तनाव और काम का बोझ।

अब मैं शेष जीवन शांति के साथ गांव में बिताऊंगा। कथा-कीर्तन में भाग लूंगा। सालों से जिन रिश्तेदारों के घर नहीं जा पाया, उनसे मिलूंगा। बचपन, स्कूल के दोस्तों के साथ मौज मस्ती करूंगा। महीने में एक बार कैंटीन जाया करूंगा, महीने भर का जरूरी सामान ले आऊंगा। शाम वाली दवाई भी। फिर मौज करूंगा।

सुबह नंगे पैर ओस में टहलूँगा। दिन भर खेत खलिहान में घूम-टहल करूंगा। गर्मी में पास की नहर में नहाऊंगा। ठंडी में कुंए के गर्म पानी से स्नान करूंगा। पेड़ से आम जामुन खाऊंगा। महुआ बिनूँगा, कच्चे कैथे की चटनी खाऊंगा। खेत की साग-सब्जी सेवन करूंगा।

खेत से मूली उखाड़कर कच्ची खाऊंगा, मटर का होरा भूजूँगा। गन्ने तोड़कर चुहूँगा, गरम-गरम राब और ताज़ा गुड़ की भेली खाऊंगा। घर का शुद्ध दूध-दही सेवन करूंगा। साफ-शांत वातावरण में रहूंगा। दाल-रोटी खाऊंगा और प्रभु के गुण गाऊंगा।

हालांकि उनकी पत्नी और बच्चों ने उनकी ‘मन की बात’ का पुरजोर विरोध किया। सभी चाहते थी विंग कमांडर साहब रिटायरमेंट के पैसों से किसी अच्छे शहर में या फिर किसी वायुसेना स्टेशन के पास फ्लैट या जमीन खरीद लें। ताकि बुढ़ापे में भी कैंटीन, मेडिकल आदि की सुविधा आसानी से मिलती रहे।

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साथी-संगी भी मिलते रहेंगे। बुध, शुक्र, शनिवार, रविवार नॉन वेज खाने और ड्रिंक करने का मन करे तो मेस और बार भी जा सकते थे। स्टेशन के बाहर वैसे भी सिविलियन से ज्यादा रिटायर्ड फौजियों ने घर बना रखे हैं तो कोई अजनबी जैसा भी नहीं लगेगा।

सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी पत्नी भी अफवा मीटिंग जा सकती थी, संगिनियों से घुल मिल सकती थी। पर विंग कमांडर साहब नहीं माने तो नहीं माने। बच्चों की तरह जिद पर अड़ गए कि गांव ही जायेंगे।

अंततोगत्वा, वह गांव में सेटल होने का प्लान लेकर अकेले ही घर पहुंच गए। अपने भाई और भतीजे को अपने रिटायरमेंट की बात बताई तो वह लोग बहुत खुश हुए। उन सभी लोगों ने उनके रिटायरमेंट की राशि का उपयोग करने की योजना तुरंत ही बना ली।

भाई कहने लगा कि बहुत दिन से कार खरीदने की सोच रहा था, अब आपका रिटायरमेंट का पैसा मिला है तो ले लेंगे। भतीजा बोला कि कब से सोच रहा था कि एमबीए कर लूं लेकिन आपके रिटायरमेंट तक रुका हुआ था। भतीजी भी बच्चों का मुंडन धूमधाम से करने के लिए चाचा के रिटायरमेंट का इंतजार कर रही थी।

उनके भाई की पत्नी बोली कि भाई साहब हम लोग आपके आने का इंतजार ही कर रहे थे। तीन कमरे के घर में अब गुजारा नहीं होता है। एक कमरा हम लोगों का है, दो कमरों में बच्चों ने कब्जा कर रखा है। कोई मेहमान आ जाता है तो बच्चों को बहुत डिस्टर्बेंस होती है। ऊपर वाला फ्लोर बन जाए तो अच्छा रहेगा।

विंग कमांडर साहब बोले -“हां यह तो ठीक ही है। अब मुझे भी यही रहना है तो कमरे तो बढ़ने ही चाहिए। कुछ दिन बाद मेरी पत्नी भी आ जायेगी तो हम लोग नीचे वाले कमरे में रह लेंगे। बुढ़ापे में सीढियां कौन चढ़ेगा। बच्चों को ऊपर भेज देंगे। उनकी भी प्राइवेसी हो जाएगी। शांति से पढ़ लिख सकेंगे। सब लोग मिलजुल कर रहेंगे, खाएंगे-पियेंगे, मौज करेंगे।”

यह सुनते ही परिवार के लोगों का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगा। भतीजा तो अपनी मम्मी से उनके सामने ही कहने लगा कि वह अपना कमरा खाली नहीं करेगा। ऊपर बहुत गर्मी लगेगी। उसकी बहन भी अपना कमरा छोड़ने और ऊपर जाने को राजी नहीं थी।

वह लोग शर्मा जी को सिर्फ “एटीएम-कम-गेस्ट” समझते थे। ऐसा गेस्ट जो कुछ दिनों के लिए आता है, सबकी जरूरते पूरी करता है और वापस चला जाता है। मेहमान का घर में बहुत दिन रुकना वैसे भी शास्त्रों और समाज में उचित नहीं माना गया है।

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उनके भाई और बच्चों ने कभी सोचा भी नहीं था कि शर्मा जी गांव में रहने आ जाएंगे। उनका मानना था कि दुनिया गांव से शहर की ओर भाग रही है, ऐसे में कौन ऐसा मूर्ख होगा जो शहर का विलासिता पूर्ण, 24 घंटे लाइट और पक्की सड़कों वाला जीवन छोड़कर कच्ची सड़क, बिना एसी, फ्रिज वाले घर तथा एक हफ्ता दिन- एक हफ्ता रात बिजली वाले गांव में बसना चाहेगा। लगता है विंग कमांडर साहब 45 बरस की उम्र में ही सठिया गए हैं। लोग सच ही तो कहते हैं कि फौजियों का दिमाग घुटने में होता है।

दो महीने में ही विंग कमांडर साहब को ऐसा लगने लगा कि उनके पैसों की जरूरत तो सबको है लेकिन उनकी जरूरत किसी को नहीं है। चार-पांच महीने बड़ी मुश्किल से गुजारने के बाद वह हताश-निराश, टूटे हुए दिल के साथ वापस शहर अपने ‘परिवार’ के पास लौट आए।

उस समय तक वायु सेना में सेम रैंक पर लेकिन घटे हुए वेतनमान पर (फ्लाइंग ऑफिसर के वेतनमान पर) पुनः नौकरी ज्वाइन करने का प्रावधान था। तो शर्मा जी ने फिर से नौकरी ज्वाइन कर ली। वहीं वायुसेना स्टेशन के बाहर जमीन खरीदकर घर बना लिया और हंसी-खुशी अपने बीवी बच्चों के साथ रहने लगे।
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धुरंधर पार्ट 2 (रिवेंज) के अंतिम दृश्य में जसकीरत जब तमाम उम्मीदों और भावनाओं के साथ, अपनी प्यारी बीबी, मासूम से बच्चे का फोटो जलाकर, सिगरेट को dustbin में फेंककर, शुद्ध सिख होकर अपने घर वापस लौटता है तो पाता है कि उसकी मां, बहन उसके बच्चे सब अपने जीवन में व्यस्त हैं।

वह लोग उसे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं, उसे मृत मान चुके हैं। जबकि परिवार की बेइज्जती का बदला लेने के लिए ही वह खूनी बना था। अपनी जिंदगी दांव पर लगाई थी। आज भी उसका परिवार उसके पैसों से ही अपना जीवन-यापन कर रहा था लेकिन वे लोग जसकीरत को पूरी तरह भूल चुके हैं।

कहने को तो जसकीरत ‘धुरंधर’ था, सैकड़ों लोगों पर अकेले भारी पड़ता था। दुश्मनों को उनके देश मे, उनके घर में घुसकर मारता था। लेकिन अपने ही देश मे, अपने घर मे, वह अपने ही लोगों से हार गया। उसकी किस्मत शर्मा जी से भी बुरी निकली।

(एयर वेटेरन विनय सिंह बैस)
विंग कमांडर शर्मा जी के साथी

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