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विनय सिंह बैस की कलम से – व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के दिन आ गए हैं

“बरषा बिगत सरद रितु आई।
लछमन देखहु परम सुहाई॥
फूले कास सकल महि छाई।
जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥”

यानी इंद्रदेव ने विश्राम लेने की घोषणा कर दी है। बारिश बीत चुकी है। अब कुआर (आश्विन) आ गया है!!

नई दिल्ली। ओस सुबह-सवेरे घास पर मोतियों सी बिखरने लगी है। बारिश के बाद दोपहर की धूप जरूर कुछ अधिक तीखी हो गई है लेकिन सुबह-शाम का मौसम सुहावना हो गया है। अर्थात अब हल्की गुलाबी ठंडक दस्तक देने लगी है। सर्दी की सुगबुगाहट हौले हौले आने लगी है।

कुआर आने का मतलब व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के दिन आ गए हैं। पितृ पक्ष के दौरान पुरखों को पूजने, उनका श्राध्द करने के पश्चात त्यौहारों का मौसम शुरू हो गया है। अभी नवरात्र चल रहा है। इसके बाद दशहरा, दीपावली की धूम मचने वाली है फिर छठ, कार्तिक पूर्णिमा का उल्लास आने वाला है। चौमासा बीतते ही लग्न, पाणिग्रहण के पवित्र दिन भी आने वाले हैं।

कुआर में बैसवारा के बरी जैसा उसरहा गांव भी पूरा हरा भरा हो गया है। जहां तक नज़र जाती है, वहां तक हरियाली फैली है। मानो कोई नई नवेली दुल्हन सोलहो सिंगार करके अपने पिया की राह तक रही हो। धान के पौधों से निकली बालियां अब पुष्ट होने लगी हैं। जैसे कोई किशोरी अब तरुणाई की ओर बढ़ चली हो। बालियों का हरा रंग भी अब धीरे-धीरे सुनहरा होने लगा है। बयार चलने पर ये बालियां यूँ झूमती हैं मानो धानी कपड़े पहने और गालों में हल्दी लगाए हुए कोई अल्हड़ गोरी किसी परदेशी के प्यार में अलमस्त झूम रही हो, नाच रही हो, गा रही हो।

बाबा कल ही मामा लोगों को गरियाते हुए कह रहे थे -” ये ससुर पूरबिया जेठ- बैसाख के महीने में बरदेखी करने तब आते हैं, जब यह गांव उजाड़, बियाबान, रेगिस्तान सा दिखता है। कुवार-कातिक में आएं तो पता चले की बरी गांव कितना खुशहाल गांव है। इससे सुंदर और समृद्ध गांव शायद ही कोई आसपास हो। वह ताना दे रहे थे कि हम अपने गांव में मोटिया से लेकर महीन तक, साठा से लेकर बासमती, बिलासपुरी, मंसूरी तक जितनी किस्में धान की उगाते हैं, उतने तो पुरबियों ने नाम भी नहीं सुने होंगे।”

अजिया बता रही थी कि भले ही अभी दोपहर की धूप इतनी मारक हो कि दक्षिण टोला के लोग इस तेज़ धूप में चमड़ा सुखाते हों पर अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिवर्ष भगवान स्वयं पृथ्वी पर आते हैं और एक लोटा में जल भरकर धरती पर रख जाते हैं। इसी कुल्हड़ का जल जब कुवार के सूरज की तेज़ धूप से दिन में वाष्पित होता है, तब भाप बनती है और सुबह-शाम कुहासा छा जाता है। जैसे-जैसे इस कुल्हड़ का जल रीता होता जाता है, धरती पर गिरता जाता है; वैसे-वैसे धरती माँ शीतल होती जाती हैं, ठंड बढ़ती जाती है।

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फौजी भैया को कल ही अम्मा फोन करके कह रही थी कि-” मुन्ना, इस बार कुआर में घर जरूर आना। अपनी श्यामा वाली गइया बियाने को है। बताओ पूरा मोहल्ला गुड़ मिली खोजरी खायेगा और जिसकी गइया है, जिसने उसे बछिया से लेकर बड़े होने तक पाल पोसकर बड़ा किया है, उसी को खोजरी और दूध नसीब नहीं है। यह भी हिदायत दे रही थी कि दिन में ज्यादा खेत खलिहान न जाना इस बार। कहने को भले ही कुवार का महीना हो लेकिन इस बखत का घाम जेठ से भी अधिक चोटाता है। रंग करिया हो जाता है हमरे बच्चा का। ”

बाबूजी कह रहे थे कि-” मुन्ना इस बार समय से छुट्टी आ जाओ तो धान पीटने के बाद खलिहान से सीधे एफसीआई में बेच देंगे। लाला को बिल्कुल भी नहीं देंगे। पिछली बार उसने सरकारी रेट से पूरे 4 रुपये किलो कम में धान खरीदे थे। धान में अभी भी दूध है, कच्चा है, गीला है जैसे तमाम बहाने बताकर हमें ठग लिया था। इस बार घर में खाने भर का महीन धान ही रखेंगे। सारा मोटिया धान तुरंत बेच देंगे। इस बार तो तुरत दान, महाकल्याण।

त्यौरस (पिछले से पिछले साल) रेट बढ़ने के इंतजार में जिस डहरी और कोठरी में धान रखे थे, उसे तो आधा मूस ही खा गए थे। पूरी देवार में बड़े-बड़े छेद कर दिए थे सो अलग। काफी धान बरखा में सड़ गया था। जब तक पूरा घर पक्का नहीं होता, धान रखने के लिए स्टील वाली डहरी नहीं आ जाती, तब तक धान स्टोर करने में फायदा कम और नुकसान ज्यादा है। ”

बाबूजी वह यह भी कह रहे थे कि-” इस बार पैरा की खरही भी तुरंत ही लगा देंगे। पिछली बार 10- 15 दिन पैरा ऐसे ही पड़ा रह गया तो आधे तो मोहल्ले वाले दो- दो, चार- चार पूरा करके उठा ले गए थे। सामने वाली बुआ तो जाड़े के मौसम में चौपार में बिछाने के लिए तमाम पैरा उठा ले गई थी। अब सब लोग जान पहचान के हैं, पड़ोसी हैं तो दो- चार पूरा के लिए किसी को मना करते भी तो नहीं बनता है। ”

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सबसे बाद में भउजी अपने कमरे में जाकर पलंग में लेटे हुए और गाल पर अनायास आ गए बालों को हटाते हुए फौजी भइया से बड़े प्यार से कह रही थी कि-” इस बार करवा चौथ में छुट्टी लेकर घर जरूर आ जाना। पिछली बार तुमने जो गुलाबी रंग वाली महंगी बनारसी साड़ी और तीन तोला वाला दिल के आकार का मंगलसूत्र दिलवाया था, जिसमें दिल के अंदर तुम्हारा और मेरा नाम भी लिखा हुआ था, वही पहन कर करवा देवी की पूजा करूंगी और अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान मांगूगी। फिर तुम्हारे पैर छूकर आशीर्वाद लूंगी।”

बाद में भौजी गालों से ओंठ तक पहुंच चुके बालों को बड़ी स्टाइल से एक तरफ फूंकते हुए झूंठ मूठ वाली धमकी भी दे रही थी कि इस बार नहीं आए तो अगले साल से करवा चौथ का व्रत नहीं रखूंगी। छुट्टी-पट्टी का बहाना हर साल नहीं चलेगा। मैं कब तक तुम्हारी फ़ोटो को चलनी से देखती रहूंगी। तीज-त्यौहार को आदमी घर न आ पाए, ऐसी नौकरी भला किस काम की?

हालांकि कुछ ही देर में सारा बनावटी गुस्सा भुलाकर भउजी लजाते हुए धीरे से यह भी कह रही थी कि-” कुवार संधिकाल है, बरखा और सर्दी के मिलन का माह है। ऋतुएं मिलें औऱ हम दूर -दूर रहें, प्रकृति संयोग का संदेश दे और हम वियोग में जियें, ऐसा सोचना ही कितना निष्ठुर है। देखो न, दिन निकलते ही, सूरज महाराज के आकाश चढ़ते ही कास के सफेद फूल कैसे चांदी से चमकने लगते हैं। निर्मल, स्वच्छ, बादलविहीन आकाश में चंदा भी रात को खूब चमकने लगा है। दिन-रात आठों पहर सब तरफ उजाला ही उजाला है। बस मेरे मन में ही अंधेरा बचा हुआ है। चंदा से चांदनी मिले, हमारे प्रेम का दीप जले तो यह विरह का अंधियारा छंटे।

वैसे भी इस बार से तुम्हें 10 -11 बजे रात तक दरवाजे वाले छप्पर के नीचे लेटने और बाद में रात को चुपके से मेरे कमरे में आने की जरूरत नहीं है। अम्मा कल ही हमसे कह रही थी कि मुन्ना को इस बार कमरे में ही लेटने को बोलना। अब कोई इतना शर्माता नहीं है, जमाना बदल गया है। अब तो गांव में भी सब जोड़े अपने-अपने कमरे में सोते हैं। कोई लिहाज नहीं करता तो तुम क्यों करो? वैसे भी पिछली बार बच्चा बाहर लेटता था, इसलिए उसे सर्दी लग गई थी।”

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(विनय सिंह बैस)
बैसवारा के बरी गांव वाले

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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