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विनय सिंह बैस की कलम से : बाते धुरंधर फिल्म की

नई दिल्ली। ‘धुरंधर’ फिल्म की पिछले कुछ दिनों से इतनी चर्चा सुन चुका था कि ऐसा लग रहा था कि अगर यह फिल्म ठाकुर विनय सिंह बैस ने न देखी तो यह समाज उन्हें स्वीकार ही नहीं करेगा, उनकी मान्यता ही रद्द कर देगा। इसलिए कल समय और बटुवा निकालकर बहुचर्चित फिल्म ‘धुरंधर’ देख ही ली।

📍इस फिल्म में मुझे अच्छा यह लगा कि…
📌 साढे तीन घंटे की फिल्म कब खत्म हुई, पता ही नहीं चला। फिल्म बहुत कसी हुई है, तेजी से भागती है। सिनेमा हॉल में इधर-उधर करने का, सिर हिलाने का भी मौका नहीं देती है। पड़ोस में कौन बैठा था, यह भी फ़िल्म समाप्त होने के बाद, लाइट जलने के बाद ही मैं जान पाया।

📌 फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है। इसे देखकर कंधार विमान हाईजैक, पार्लियामेंट अटैक और 26/11 हमले के पुराने घाव ताजा हो गए। यह तीनों घटनाएं हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों और तत्कालीन सरकार की नाकामी के क्लासिक उदाहरण हैं।

📌रणवीर सिंह की पैंट में हाथ डालकर… पठान गैंग के गुर्गे का सूंघना, रहमान डकैत का अपने दुश्मन पठान को 10 किलो के बांट से कुचल कर मारना और फिर उसके एक गुर्गे को बड़े से खौलते कड़ाह में डालकर ऊपर से ढक्कन बंद कर देना, भारतीय जासूस को आईएसआई के मेजर इकबाल द्वारा अमानवीय सजा देना बिल्कुल वीभत्स, जुगुप्सायुक्त पर एकदम नए, लीक से हटकर दृश्य थे।

📌 अक्षय खन्ना का अपने पुत्र की लाश देखकर नाक, मुंह, होंठ, भौं सिकोड़कर दु:ख प्रकट करना तथा 26/11 हमले के दौरान अजमल कसाब के हाथ में अपने ही हाथों से दी हुई AK-47 राइफल देखकर रणवीर सिंह का रिएक्शन सचमुच अत्यंत प्रभावी लगे, इससे बेहतर अदाकारी मैंने तो कम ही देखी है।

📌 अक्षय कुमार (रहमान डकैत), रणवीर सिंह (हमजा अली) और आर. माधवन (अजय सान्याल) की एक्टिंग की तारीफ तो सचमुच करने लायक है। पर सत्ता के लिए किसी का न होकर, सबका सगा होने की एक्टिंग करते नेता के रूप में राकेश बेदी (जमील जमाली) की अदाकारी ने भी मुझे बड़ा प्रभावित किया।

📌 संजय दत्त (एसपी चौधरी) ने ओवरएक्टिंग नहीं की, इसलिए ठीक लगे। सारा अर्जुन (यालिना जमाली) ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है। अर्जुन रामपाल ने मेंजर इकबाल का किरदार बखूबी निभाया है।

📌 मेरी देखी हुई फिल्मों में शोले के बाद शायद यह पहली फिल्म है जिसमें हीरो से अधिक विलेन की चर्चा हो रही है। बिना अधिक बोले हुए कैसे कालजयी एक्टिंग की जाती है, कैसे स्क्रीन प्रेजेंस दमदारी से दर्शाई जाती है, यह अक्षय खन्ना ने बखूबी करके दिखाया है।

📌 “ज़े-हाले-मिस्कीन मकुन ब-रंजिश;
ब-हाले-हिज्रां बेचारा दिल है।”
की तरह इस फ़िल्म के गाने के ये बोल- “याखी दूस दूस, इंदी खोस फस्ला”
समझ तो नहीं आते पर जुबान में पहली बार में ही चढ़ जाते है।

📌 पुराने गानों का बहुत ही अच्छे ढंग से इस्तेमाल किया गया है और इसके लिए संगीतकार बधाई के पात्र हैं।

📌 “हिन्दुस्तानियों का सबसे बड़ा दुश्मन हिंदुस्तानी ही है। पाकिस्तान तो दूसरे नंबर पर आता है।”
📌 “मुंह तोड़ने के लिए मुट्ठी बंद करना जरूरी है”
और
📌 “रहमान डकैत की दी हुई मौत बड़ी कसाई नुमा होती है।
मुझे यह तीन सबसे दमदार डायलॉग लगे।

📍कुछ बातें जो मुझे अखरी, वे हैं…

📌 फिल्म में मारधाड़ के दृश्य विशेष कर अक्षय खन्ना और संजय दत्त (रहमान डकैत- डीएसपी) तथा रणवीर सिंह और रहमान डकैत के गुर्गे वाले दृश्य टिपिकल बॉलीवुड टाइप थे।

📌 कराची शहर के सांसद और प्रभावशाली नेता को उसके ही शहर में उसकी लड़कीं को कोई गैर व्यक्ति का घुमाता रहा और उसे भनक भी न लगी, यह कुछ हजम नहीं हुआ।

📌 रणवीर सिंह (हमजा) अपने को बलोच बताता है। रहमान डकैत जो खुद भी बलोच है, वह भी बिना कोई अधिक पड़ताल किए, उसकी भाषा-बोली समझे अपने गैंग में शामिल कर लेता है।

📌 हफ्तों से रहमान डकैत के रूप में अक्षय खन्ना की बलूचिस्तान के क्षेत्र में एंट्री को सोशल मीडिया में ऐसे दिखाया जा रहा था जैसे कि यह फिल्म में उसकी पहली एपीरियंस हो। लेकिन फ़िल्म देखने से पता चला कि यह तो बहुत बाद का सीन है।

📌 जिस माहौल को लेकर फिल्म चली है, उसमें गाली गलौज, सिगरेट, शराब का सेवन जस्टिफाईड लगता है। लेकिन मुझे लगता है कहीं-कहीं अनावश्यक गालियां भर दी गई हैं।

📌 ऐसा लगा कि 3:30 घंटे तो सिर्फ फिल्म की प्रस्तावना बताई गई है मुख्य फिल्म की शुरुआत होनी अभी बाकी है।

यह तो रही फिल्म की बात। लेकिन एक पूर्व सैनिक के रूप में और देश के नागरिक के रूप में भी उस समय केंद्र सरकार के एक केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री का देश विरोधी शक्तियों, आतंकवादियों की सीधे मदद करते देखना, एकदम दिल तोड़ने वाला, गहरे सदमे जैसा है।

मुझे इस फ़िल्म में पाकिस्तान का कड़वा सच तो दिखता है लेकिन इस्लाम के विरुद्ध कोई बात जान बूझकर की गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। अब पाकिस्तान इस्लामिक देश है तो है, उसे बौद्ध या हिन्दू देश तो दिखा नहीं सकते हैं।

खैर, कुल मिलाकर ‘धुरंधर’ एकदम raw, हाई ऑक्टेन एक्शन ड्रामा, काफ़ी हद तक ऑनेस्ट और पूरी तरह से मर्दाना फिल्म है। मेरी तरफ से फ़िल्म को 5 में से 4.5 स्टार।

(विनय सिंह बैस)
आज फ़िल्म समीक्षक बने हैं

Vinay Singh
विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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