विनय सिंह बैस, रायबरेली। गंभीर स्वभाव, बड़ी सी बड़ी विपत्ति में शांत-चित्त बने रहना, अपना कार्य अत्यंत खामोशी से करना और कई बार गलत न होते हुए भी अपने से बड़ों, यहां तक कि छोटों की भी खरी- खोटी सुन लेना पापा का सहज स्वभाव था। पापा के इन दुर्लभ मानवीय गुणों का हम भाई-बहनों को तो बहुत फायदा हुआ, क्योंकि कई बार अक्षम्य गलती, बदमाशी करने पर भी पापा ने बस डांट कर छोड़ दिया।
लेकिन इसका नुकसान शायद उनकी तमाम बहनों को झेलना पड़ा। पापा की कोई सगी बहन नहीं थी, इसलिए वृहद परिवार की सभी बहनें रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने पापा के पास पहुंच जाती थी। पापा चप्पल-जूते उतारकर, हाथ पैर धोने के बाद एक पीढ़ा के ऊपर सिर पर तौलिया या रुमाल डालकर बैठ जाते। फिर बारी-बारी से बहने आती जाती, उन्हें टीका करती, मिठाई खिलाती और प्यार से राखी बांधती।
कुछ ही देर में पापा के लालिमायुक्त गोरे माथे पर रोली-अक्षत का बड़ा सा टीका लग जाता। जो उनके सुदर्शन चेहरे को और भी निखार देता। साथ ही उनके दाहिने हाथ पर तमाम रंग बिरंगी राखियां सज जाया करती थी। कुछ सादे धागे वाली, कुछ भगवान के फोटो वाली, कुछ सोख्ते से बनी मोटी-ऊंची कई मंजिलों वाली फुलरे वाली राखियां। उस पुण्य दिन पापा की कलाई से कोहनी तक राखियां ही राखियां सजी होती थी।

पापा इंटर कॉलेज में अध्यापक थे, ठीक-ठाक कमाते थे। लेकिन मैंने पापा की किसी भी बहन को चाहे वह उनसे उम्र में छोटी हों या बड़ी, रक्षाबंधन के दिन मजाक या दुलार में भी कभी पैसे- रुपए मांगते नहीं देखा। कोई और चीज या गिफ्ट दिलाने की जिद करते हुए भी नहीं देखा।
तब मुझे तब इस पर बड़ा आश्चर्य होता कि एक मेरी बहन है जो राखी बांधने से पहले ही पूछ लेती है कि भैया गिफ्ट क्या दोगे और एक पापा की बहनें हैं जो राखी बांधने के बाद भी कुछ नहीं मांगती हैं!!! क्या बड़ी होने के बाद सब बहनें ऐसी हो जाती हैं? या फिर पापा का व्यक्तित्व ही कुछ विशेष है?
उस समय तो मुझे कुछ ज्यादा समझ नहीं आया लेकिन अब मुझे लगता है कि पापा की सभी बहनों को पापा के व्यक्तित्व में ‘भाई’ की कम और ‘पिता’ की छवि ज्यादा दिखती थी। सभी बुआ को विश्वास था कि जो भाई अपनी सामर्थ्य से अधिक देने को सदैव ही तैयार है, बिन मांगे मोती लुटा रहा है; उससे कुछ मांग कर इस पवित्र रिश्ते और इस पुण्य दिवस की गरिमा को कम क्यों करना?
मेरी बहन मुझसे कुछ ही वर्ष छोटी है। बचपन की बात दूसरी है जब वह मुझसे खुलकर गिफ्ट की बात कर लिया करती थी। चॉकलेट, गिफ्ट पैक जैसी चीजें उस समय चलन में नहीं थी। इसलिए तब मैं पापा से लेकर उसे दो-पांच-दस रुपये रक्षाबंधन के दिन दे दिया करता था। लेकिन जब मैं नौकरी करने लगा तब तो उसे जिद करके, अधिकार पूर्वक रक्षाबंधन के दिन मुझसे कुछ अधिक पैसे या कुछ बड़ा गिफ्ट मांगना चाहिए था।
लेकिन पता नहीं उस पर पापा के स्वभाव का प्रभाव था या बुआओं ने कुछ सीख दी थी या बड़े होने के बाद उसका स्वभाव सचमुच ही बदल गया था: कारण जो भी हो उसने मुझसे कुछ भी मांगना बंद कर दिया था। मैं कुछ पूछता भी तो वह चट से कह देती कि भैया आप हो तो मुझे कुछ और क्या चाहिए!!
अब मुझे धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि पापा के जाने के बाद वह मुझमे ‘बड़े भाई’ की नहीं अपितु ‘पापा की ही छवि’ देखती है।
और एक ‘बेटी’ भला अपने ‘पिता’ से क्या ही मांग सकती है!!

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