जैसे प्यार और बेवफाई,
जैसे मिलन और तन्हाई।
जैसे जेल और रिहाई,
जैसे रुई और दियासलाई।
जैसे स्कूटी और गियर,
जैसे सर्दी और बियर।
जैसे जंगल और बस्ती,
जैसे टाइटेनिक और कश्ती।
जैसे डायबिटीज और मिठाई,
जैसे मर्द और खटाई।
जैसे समझ और रटाई,
जैसे विनय और चतुराई।

सिक्के के विपरीत भाग हैं,
पानी और आग हैं।
वैसे ही महामूर्ख को राय,
इस तपती गर्मी में चाय।
बेतुके और बेमेल हैं,
आग और तेल हैं।
लेकिन जिससे हो जाए प्यार,
उसके जुलम भी करम लगते हैं।
आंखों देखी और कानों सुनी भी,
धोखा और भरम लगते हैं।
अच्छी है, बुरी है, जैसी भी है;
चाय तब भी मेरी थी, अब भी मेरी है।
तुम मुझे न भुलाना, हम तुम्हें न भूलेंगे,
मरते दम तक तेरा साथ न छोड़ेंगे।
#InternationalTeaDay
(विनय सिंह बैस)
चाय प्रेमी
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