नई दिल्ली। जब पहली बार यह कहावत मैंने गांव के स्कूल की दीवार पर पढ़ी थी, तो भीतर कुछ चटक सा गया था। सोचता था – जिस मिट्टी में मल्लयुद्ध जन्मा, जहाँ हर दूसरे चौपाल पर कबड्डी, दंगल, गदा और दंड-बैठक की गूंज उठती हो, वहाँ ऐसा विचार कैसे पनप गया?
शायद यह गुलामी की विरासत थी, या शायद हम खुद अपने हाथों से अपनी जड़ों को काटते चले गए। पढ़ने वाले लड़के खेल को समय की बर्बादी समझते और जो खेलते, वे भविष्य को लेकर उलझन में रहते।
गांव के युवाओं के सामने दो ही रास्ते थे – या तो किताबों से दोस्ती करो और मास्टर, क्लर्क, पटवारी बनो, या फिर शरीर के भरोसे दौड़ लगाओ और फौज या पुलिस में घुसो। बाकी, जिनसे ये दोनों न बन पाते, वह दिल्ली, लुधियाना, कलकत्ता, बम्बई जाकर कमाये या फिर गांव में रहकर खेती-पाती करे, हरहा-गोरु संभाले।
सर्दियों में कुछ समय के लिए लोग स्वर्गीय प्रभात चाचा के कारण वॉलीबॉल, क्रिकेट खेल लिया करते थे। गर्मियों की शाम में खेत खाली होने और जुताई होने के बाद झाबरि भी कुछ समय के लिए खेल ली जाती थी।
हाँ, गुड़िया (नागपंचमी) के दिन जरूर गाँव का ‘अखाड़ा’ सजता था। लंगोट कसे युवा, मिट्टी से सनी देह, तालियाँ बजाती भीड़। लेकिन वो भी महज़ एक परंपरा निभाना भर रह गया था। ऐसे समय में, जब खेल “शौक” से ज़्यादा कुछ नहीं था – भूनी बाबा ने उसे “धर्म” बना लिया।
भूनी बाबा – असली नाम मिथिलेश मिश्रा, लेकिन गांव के लिए वो सिर्फ ‘भूनी बाबा’ ही थे। उनकी एड़ी जैसे अखाड़े की मिट्टी में नहीं, गगन में निशाना बांधती थी। लंबी कूद उनके लिए प्रतियोगिता नहीं थी, प्रतिज्ञा थी। गांव, पड़ोस, आसपास के लोगों, सबने देखा था, कैसे वो उड़ते थे।
मेरुई के ऊँचे अखाड़े में जब वो दौड़ लगाते, तो सामने वालों की साँस थम जाती। कई गाँवों के कूदबाज उनके सामने पानी भरते थे। उन दिनों 51/- या 10/- रुपये की इनामी राशि मिलती थी और उसका भी भूनी बाबा लड्डू बाँट दिया करते थे – जैसे कह रहे हों, “यह जीत मेरी नहीं, गांव की है।”
पर वह सिर्फ खिलाड़ी नहीं थे – एक साधक थे। गांव से लखनऊ तक का सफ़र, कभी किसी परिचित के घर टिककर, तो कभी किसी हॉस्टल में रहकर… लेकिन अभ्यास कभी न रुका। खेल उनके लिए खेल नहीं था बल्कि ‘करियर’ था, कर्तव्य था। उनकी साधना का परिणाम यह रहा कि उन्हें पहले एम्प्लॉयमेंट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली फिर होमगार्ड और पुलिस विभाग में सेवारत रहे।
अभी कुछ वर्ष पूर्व फतेहपुर से ऑफिस सुपरिटेंडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इन बदनाम विभागों में सेवा करने के बाद भी भूनी बाबा ‘टीटोटलर’ रहे हैं। न कभी बीड़ी, न दारू। शरीर को मंदिर माना और खेल को पूजा।
अपनी युवावस्था में भूनी बाबा गांव के सभी लड़कों के रोल मॉडल हुआ करते थे। उनके जैसा स्वस्थ और गठीला शरीर सभी युवा पाना चाहते थे। गांव के हर लड़के का सपना था – भूनी बाबा जैसा बनना। उनकी तरह फुर्तीला, गठीला, कुशल।
हर अखाड़े में यही शोर – “किसकी एड़ी पहुँचेगी भूनी बाबा के आगे?” लेकिन उनकी कूद कोई आम छलांग नहीं थी। वो थी दुर्व्यसनों से ऊपर उठने की छलांग। वो थी आलस्य और शॉर्टकट को हराने की छलांग।
एक बार गांव के एक लड़के को किसी सिरफिरे ने बहका दिया कि अगर वह अखाड़े में गिल्ली (गिलहरी) को मार कर अपने हाथों से गाड़ दे तो उसकी एड़ी भूनी बाबा से आगे चली जायेगी। इस टोटके की खबर होते-होते भूनी बाबा के कानों तक जा पहुंची। उन्हें यह जानकर बड़ा दुःख हुआ। अगले ही दिन उन्होंने उस युवा को बुलाया और पूछा कि क्या गिलहरी मारकर अखाड़े में गाड़ने वाली बात सच है?
उस युवा ने सिर झुका लिया। तब भूनी बाबा बड़े गंभीर और आत्मीय स्वर में उससे बोले- “बेटा, मैं अपने अनुभव से कहता हूं कि गिलहरी गाड़ने से एड़ी नहीं बढ़ती। जो भीतर के शैतान हैं – नशा, आलस्य और जल्दी सफलता का लोभ – उन्हें गाड़ना पड़ेगा। तभी छलांग बड़ी होगी।”
(विनय सिंह बैस)
भूनी बाबा के नाती (पौत्र)
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