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विनय सिंह बैस की कलम से : डिजिटल चालान और शर्मा जी

विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। धन्नासेठों और धनकुबेरों की तो मैं नहीं कहता लेकिन मेरे जैसे साधारण मनुष्यों जिनके बच्चे स्कूल में, वह भी प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं; उनके लिए अप्रैल का महीना बड़ा कठिन गुजरता है। जिन पेरेंट्स की ऊंची पहुंच हो या जिनके पास मोटी मैनेजमेंट फीस भरने की कूव्वत हो, उनका काम तो शायद आसानी से हो जाए लेकिन आम आदमी के लिए दिल्ली जैसे मेट्रोपोलिटन शहर में किसी भी ठीकठाक सरकारी या प्राइवेट स्कूल में बच्चों को एडमिशन आसानी से नहीं मिलता नहीं है। अच्छा, एक बार किस्मत से एडमिशन मिल भी गया तो चालाक स्कूल वाले पेरेंट्स को निचोड़ने के लिए हर साल बच्चों का रि-एडमिशन करते हैं। रही सही कसर डेवलपमेंट फीस, एक्टिविटी फीस, अपनी तय दुकानों से कॉपी किताब और यूनिफॉर्म खरीदवा करके पूरी कर देते हैं।

खैर, हुआ यूं कि एक नामी गिरामी प्राइवेट स्कूल में दोनों बच्चों की भारी-भरकम फीस जमा करने के बाद शर्मा जी मन ही मन कुछ गुणा भाग करते हुए स्कूटी से ऑफिस आ रहे थे। आईआईटी वाले रास्ते मे शर्मा जी के बगल में एक सुंदर मोहतरमा स्कूटी से जा रही थी। उस सुंदरी को देखते ही मोटी फीस भरने का बिल्कुल ताज़ा गम कुछ समय के लिए शर्मा जी भुलाकर कोई रूमानी सा गीत गुनगुनाने लगे। रास्ता अचानक से खुशनुमा हो गया, दिल्ली की 35 डिग्री की तेज धूप अचानक सर्दियों की गुलाबी धूप में बदल गई। शर्मा जी को ऐसी शिमला टाइप फीलिंग आई कि उन्होंने प्रदूषण से बचने के लिए जो हेलमेट का वाइजर चिपका रखा था, उसे भी बाएं हाथ से ऊपर उठा दिया।

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कुछ देर तक शर्मा जी, मंत्रमुग्ध होकर मोहतरमा के पीछे यूं ही चलते रहे कि अचानक जेएनयू चौराहा पार करने से पहले ही रेड लाइट हो गई। मोहतरमा तो 5-4-3-2–1 की उल्टी गिनती पूरी होने तक स्टॉप लाइन से कुछ पीछे रुक गई लेकिन शर्मा जी का ध्यान चूंकि रेड लाइट की तरफ कम और उन मोहतरमा की तरफ ज्यादा था, अतः दोनो हाथों से इमरजेंसी ब्रेक मारते-मारते भी शर्मा जी ज़ेबरा क्रॉसिंग पार कर ही गए। हालांकि शर्मा जी ने गलती भांपते हुए तुरत ही स्कूटी बैक करने की कोशिश की लेकिन तब तक उनके पीछे गाड़ियों की लंबी कतार लग चुकी थी। अब कुछ नहीं हो सकता था।

रेड लाइट पर ट्रैफिक पुलिस वाला होता तो शर्मा जी अपने प्रतिष्ठित ऑफिस का आईडी कार्ड दिखाकर रौब झाड़ देते या रिक्वेस्ट कर लेते। लेकिन नाश जाए डिजिटल इंडिया का और चूल्हे में जाएं चौराहों पर लगे तमाम सीसीटीवी कैमरे। जिन्होंने झट से शर्मा जी की स्कूटी की नम्बर सहित फोटो खींची और फट से उनका 2000/ रुपये का चालान बना दिया।

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अच्छा यहां तक तो फिर भी ठीक था। विद्वानों ने कहा है कि पैसा हाथ का मैल होता है, उसके नुकसान पर ज्यादा शोक नहीं करना चाहिए। शर्मा जी ने यही सोचकर संतोष कर लिया होता लेकिन असल क्लेश तो तब हुआ जब इन नासपीटे डिजिटल ट्रैफिक वालों ने नम्बर प्लेट के आधार पर नाम और पता निकालकर फोटो सहित चालान शर्मा जी के घर भेज दिया।

शर्मा जी का बैड लक इतना बैड था कि चालान जब घर पर डिलीवर हुआ तो शरमाईन भाभी ने उसे रिसीव किया। शरमाइन भाभी वैसे तो गांव की हैं, हिंदी मीडियम स्कूल से बारहवीं तक शादी होने के लिए पढ़ी हैं। इसलिए उन्हें चालान की भाषा और पेनाल्टी की राशि तो कुछ खास समझ नहीं आई लेकिन चालान के साथ लगी हुई, हेलमेट का वाइजर उठाकर खूबसूरत मोहतरमा की तरफ घूरते हुए शर्मा जी की फ़ोटो, उन्हें खूब समझ आई। बल्कि कुछ ज्यादा ही समझ आई।

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परिणाम यह हुआ कि अभी कल ही शर्मा जी ने नवरात्र के व्रत का उद्यापन किया था लेकिन आज से बिना किसी पर्व त्यौहार के उनका पुनः उपवास शुरू हो गया है।

हरि बोल

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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