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विनय सिंह बैस की कलम से…बच्चा

रायबरेली। वैसे तो बचपन जीवन का सबसे सुनहरा दौर होता है। न कोई फिक्र, न कोई डर। खाना, खेलना, सो जाना – बस यही तो दिनचर्या थी। कोई अच्छी चीज घर में आती तो सबसे पहले हमें मिलती। कोई पकवान या स्वादिष्ट भोजन बनता तो सबसे पहले और ज्यादा मिलता और अगर ज़िद करो तो बार-बार भी मिलता था। घर से लेकर बाहर तक सबका दुलार मिलता, रिश्तेदारों का भी खूब प्यार मिलता। वह आते तो गोदी में उठा लेते, प्यार से गाल खींचते और जाते-जाते दो-चार रुपये भी थमा जाते। उस समय हमारी पाँचों उंगलियां सचमुच घी में रहती थीं।

हाँ, एक कष्ट जरूर था- अम्मा की कभी-कभार की मार। लेकिन यह भी आधा ही कष्ट था। जैसे ही अम्मा की डांट या पिटाई बढ़ती, कोई न कोई बीच-बचाव में आ ही जाता था। फिर मैं अपनी ‘अदाकारी’ शुरू करता- खूब हाथ-पैर पटकता, पंचम सुर में चिल्लाता और जैसे ही आंसू गिरते, अम्मा की गोदी फिर खुल जाती। पिटाई के बाद मनुहार, गाली के बाद गुड़- बचपन का यह संतुलन अद्भुत था।

लेकिन एक पूरा दर्द था जिसकी कोई दवा नहीं थी। वह दर्द था- हमारा छोटा होना। छोटे होने के कारण कोई हमें उस तरह से भाव नहीं देता था, जैसा हम चाहते थे। सब लोग हमें बिल्कुल हल्के में लेते थे। कुछ भी करने को कहो तो बस एक ही जवाब मिलता था- “अरे, तुम अभी छोटे हो!”

साइकिल चलानी हो- तुम छोटे हो।
बैलगाड़ी अकेले हाँकनी हो- तुम छोटे हो। भैंस का दूध निकालना हो- तुम छोटे हो। कुंए से पानी भरना हो- तुम छोटे हो।
जैसे “छोटा” होना कोई जुर्म हो, अपराध हो! उस समय मुझे लगता कि क्या छोटे बच्चे बिल्कुल नकारा ही होते हैं, किसी भी काम के नहीं होते?

पर साल में एक वक्त ऐसा आता था जब यही ‘छोटापन’ हमारे लिए अभिशाप से वरदान बन जाता। बैसवारा के बरी गांव में हमारे घर के पीछे दो छप्पर और दो ‘बंगला’ थे। बताते चलूँ कि छप्पर वो हैं जिनका ऊपरी सिरा घर की दीवार पर टिका होता है और निचला सिरा बल्लियों के सहारे जमीन से कुछ ऊपर टिका होता है।

‘बंगला’ को घर की दीवारों के सहारे की जरूरत नहीं होती है, यह स्वतंत्र होता है, अपने सहारे टिका होता है। शायद इसीलिए इसे छपरी नाम ‘छपरा’ न देकर सम्मानित नाम ‘बंगला’ दिया जाता है। हालांकि यह शहरों वाले बंगले से बिल्कुल भिन्न और साधारण होता है। गांव के ‘बंगले’ के छप्पर के दोनों सिरे बल्ली के सहारे टिके होते हैं। यह बीच में किसी मोटी लकड़ी (बांस, सफेदा) के सहारे दो ऊंचे खम्बों पर टिका होता है जबकि दोनों निचले किनारे बल्ली या मिट्टी या ईंट की कम ऊंचाई वाली दीवार के सहारे टिके होते हैं।

खैर, बंगला से बाहर निकलते हैं और मुद्दे पर आते हैं। मुद्दा यह कि बरसात शुरू होने से पूर्व ही, छप्पर और बंगलों के नीचे गोबर मिली मिट्टी में लौकी (घिया), तरोई, कुम्हड़ा (कद्दू ) आदि बो दिए जाते। जैसे ही ये कुछ बड़े होते, इन पौधों की लता को किसी लकड़ी या डंडी के सहारे छप्पर और बंगलों पर चढ़ा दिया जाता। बरसात शुरू होते ही इन पौधों की हरी पत्तियों में सफेद-पीले फूल निकलने लगते।

कुछ ही दिनों में लौकी, कद्दू और तरोई की बेलें पूरे छप्पर और बंगलों पर फैल जाती थी। कुछ दिन बाद बतिया निकल आती। तब हमें उनकी ओर उंगली करने की मनाही होती थी क्योंकि लक्ष्मण जी सदियों पहले चेता गए हैं- “इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं, जे तर्जनी देखि मरि जाहीं।” दूर से दिखने वाली बतियों को बुआ काले कपड़ो से ढक दिया करती थी ताकि किसी की नजर इन पर न लगे। फिर यह बतिया धीरे-धीरे बड़ी होती। इनमें लंबी और गोल दो तरह की हल्के हरे रंग की लौकी फरती और कुछ गहरे हरे रंग की तरोई और कद्दू भी निकलने लगते।

यही वह समय होता था, जब घरवालों को हमारी वैल्यू पता चलती थी। यही वह वक्त होता जब मुझे अहसास होता कि हम भी किसी काम के हैं। क्योंकि छप्पर और बंगले के नीचे लटकने वाली तरोई, लौकी और कद्दू तो कोई भी तोड़ लेता था पर छप्पर, बंगले के ऊपर, ऊंचाई पर फलने वाली इन सब्जियों को तोड़ने के लिए मुन्ना सिंह बैस यानि मुझे याद किया जाता।

चाचा मुझे गोदी में लेकर छप्पर, बंगले पर बैठा देते। जब कोई बड़ा पुरुष घर में न रहता तो फिर अजिया सीढ़ी लगाकर मुझे छप्पर, बंगले के ऊपर चढ़ा देती और तब हम कुछ भाव खाते हुए, घरवालों को यह बताते हुए कि देखो हम कितने काम के हैं, अपने छोटे-छोटे हाथों के सहारे दबे पांव, आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए लौकी, तोरई, कुम्हड़ा तोड़ते जाते और उन्हें नीचे खड़े चाचा, अजिया को पकड़ाते जाते। कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम देने के बाद सीढ़ी से या फिर चाचा की गोदी में सावधानीपूर्वक उतर आते।

फिर मैं नीचे आकर गर्व से थोड़ी देर टेढ़ा-टेढ़ा चलता था।

(विनय सिंह बैस)
जो बचपन से ही बड़े काम के आदमी थे

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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