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विनय सिंह बैस की कलम से – अगहन आ गया है!!

रायबरेली। ठंड दिन में गुलाबी और रात को रजाई वाली हो चली है। खेतों में धान के पौधों के तने और पत्तियां तो हरी हैं लेकिन उनकी मोटी और हवा के साथ लहराती बालियां पककर सोने की रंगत ले चुकी हैं। दूर से देखने पर ऐसे लगेगा मानो किसी हरी साड़ी वाली गोरी ने गले में सोने का बड़ा सा हार पहन लिया हो।

दिन की चटक, तेज धूप अब जाने को है। बड़े वाले बक्से में रखे-रखे रजाई और ऊनी कपड़ों से एक अलग तरह की गंध आने लगी है। इसलिए चतुर महिलाएं बची-खुची धूप का फायदा उठाने के लिए सारे रजाई-गद्दे धूप में डाल चुकी हैं।

क्योंकि अगहन आते ही सुबह-शाम ठंड बढ़ जाती है, तब मोटे चद्दर यहां तक कि लोई से भी काम नहीं चलता है। अगहन की ठंड तो ‘रुई या दुई’ (रजाई या साथ में किसी और के होने) से ही जाती है।

कातिक जाते-जाते बाबा धान काटने वालों मजूरों की गिनती कर आए थे क्योंकि पहले मजूर धान काटेंगे, फिर एक-आध हफ्ता उनको खेत में सूखने में लगेगा। उसके बाद धान की फसल के बोझ बांधकर आफर (खलिहान) लाये जाएंगे। इससे पहले कि आंधी-पानी आए, कोई काज-परोजन पड़े, उसके पहले फसल घर आ जानी चाहिए।

बारिश में ऊबड़-खाबड़ हुआ खलिहान फरुआ (फावड़े) से बराबर किया जा रहा है। जिस दिन धान के बोझ खलिहान आएंगे उसके एक दिन पहले चार-छह छीटा गोबर और 10-12 बाल्टी पानी खलिहान में पहुंचा दी जाएगी। फिर पूरा खलिहान गोबर से लीपा जाएगा।

लिपाई सूख जाने के बाद खलिहान के बीचोबीच तखत, सरावनि या लकड़ी का कोई बड़ा कुंदा (टुकड़ा) रख दिया जाएगा, जिस पर मजूर धान पीट सकेंगे। वह लोग धान पीटने के बाद पैरा (पुआल) एक तरफ फेंकते जाएंगे और धान एक जगह इकट्ठा करके उसकी कूरी (ढेर) बनाई जाएगी।

पूरा धान पीटने और धान एक तरफ और पुआल दूसरी तरफ करने से पहले घर के किसी सदस्य का खलिहान में वैसे तो कोई काम नहीं है। लेकिन त्योहारों के कारण सूरज के स्कूल में लंबी छुट्टी है। मतलब पढ़ाई का कोई बोझ नहीं है।

इसलिए वह भी गांव आया हुआ है। अब सूरज कभी मजूरों को पानी पूछने के बहाने, कभी बैलों को धूप में बांधने के बहाने खलिहान की तरफ कनखियों से निहारता जाता है। वह यह देखकर खुश है कि रूपा भी धान पीटने आई हुई है।

राम जाने यह अगहन की गुलाबी ठंड का कमाल है या लंबे अंतराल के बाद मिलने का असर, रूपा अब पहले से ज्यादा युवा, सुंदर और मोहक लग रही है। उसका रंग भी पहले से कुछ अधिक साफ हो गया है। आषाढ़ में जब धान रोपने आई थी, तब कितनी चिलचिलाती गर्मी थी। शायद इसीलिए उसका रंग सांवला हो गया था। अब उसका रंग गेहुंवा-गुलाबी हो चला है।

रूपा को भी सूरज की उपस्थिति का भान हो चुका है। पहले वह सीधे सूरज को बुला लिया करती थी, सबके सामने उससे खुलकर बात भी कर लिया करती थी। लेकिन अब शायद वह सयानी हो गई है इसलिए अपनी अम्मा की नजर बचाकर सूरज की तरफ देखकर मुस्करा भर देती है और झट से नजर फेर लेती है।

डर यह की कहीं सूरज और रूपा की आँखें चार होने से पहले उसकी अम्मा की आँखें लाल न हो जाएं इसीलिए रूपा नजर मिलते ही, नजरे नीची कर वापस धनपिटनी में लग जाती है।

आज पूरा धान पीटा जा चुका है। पुआल बाहर की तरफ और धान का ढेर खलिहान के बीचो-बीच लग चुका है। अब बाबा आएंगे। वह 12 डलिया धान अपनी तरफ रखेंगे और एक डलिया धान रूपा की अम्मा की बोरी या पुरानी लेकिन मजबूत धोती या चद्दर में डाल देंगे। रूपा की अम्मा एक डलिया धान में कभी नहीं मानी इसलिए बाबा को चौथाई डलिया धान और देना ही पड़ता है।

एक बार जब बड़े बाबा बीमार हो गए थे और छोटे बाबा ने चौथाई डलिया धान अलग से नहीं डाला था तो अगले साल रूपा की अम्मा पूरे 5 दिन बाद धान काटने आई थी। बिना कुछ कहे वह सब कुछ कह गई थी। तबसे कोई भी बाबा रुपा की अम्मा से पंगा नहीं लेते।

अब शाम होने को है। रूपा, रूपा की अम्मा और उनके संगी साथी मजूरी लेकर हंसी-खुशी अपने घर जा रहे हैं। उनकी हफ्तों की मेहनत का आज पारिश्रमिक मिला है, इसलिए वह लोग खुश हैं। आज रात चैन की नींद सोएंगे।

पर सूरज को आज पूरी रात ठीक से नींद नहीं आएगी। उसने रूपा की सहेली अनीता को उसे छेड़ते हुए देखा है। वह मंद मंद मुस्कराते हुए शायद सूरज को सुनाते हुए कह रही थी कि जबसे कातिक शुरू हुआ है, तब से रूपा सुबह मुंह अंधेरे उठ कर नहा लेती है क्योंकि ऐसी मानता है कि ब्रह्ममुहुर्त में कातिक नहाने से कुंवारी कन्याओं को मनचाहा जीवन साथी मिलता है।

अब कातिक की पूर्णमासी को सूरज बिस्तर में लेटे हुए सोच रहा है कि रूपा किसको पाने के लिए इतने जतन कर रही है, कष्ट सह रही है? मनचाहा जीवनसाथी?? क्या सुबह कातिक नहाते हुए रूपा के मन में जीवन साथी के रूप में मेरी तस्वीर उभरती होगी?? शायद हां, शायद नहीं!!

फिर उसने अपनी कॉपी निकाली और चार उंगलियों से ‘हां’, फिर चार उंगलियों से ‘न’ करते हुए पेज के बिल्कुल नीचे तक आ गया। संयोग से और प्रयोग से अंतिम चार अंगुलियां ‘हां’ की थी। प्रयोग से इसलिए क्योंकि सूरज को ठीक से पता है कि अंतिम में ‘हां’ लाने के लिए पहले की चार अंगुलियों में क्या कहना और मानना है।

खैर, इस टोटके की सच्चाई तो राम ही जानें, लेकिन सूरज पता नहीं क्यों मन ही मन खुश हुआ जा रहा है। शरीर कुछ हल्का सा लग रहा है, सांसे महकने लगी हैं। वह सपनों की सुनहरी दुनिया की सैर कर रहा है। अब रातभर रूपा उसके सपने में आती रहेगी, मुस्कराती रहेगी और सूरज को ख्वाबों की हसीन दुनिया की सैर कराती रहेगी।

(विनय सिंह बैस)
सूरज के गांव वाले दोस्त

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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