श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। आकाश से घने काले बादल धीरे-धीरे छँटने लगे हैं। कीचड़युक्त मिट्टी की सड़ाईन सोंधी गंध भी धरती से धीरे-धीरे विदा ले चुका है। चारों तरफ हरियाली अपने चरम स्वरूप को धारण किए प्रतिपाल इठला रही है। सावन, जो किसी अज्ञानी की भाँति अपनी शक्ति के मद में चूर, चतुर्दिक तबाही और जल-प्लावन कर हर्षित हो रहा था, अब शायद अपने जल-भंडारण की कमी, या फिर ज्ञान प्राप्ति के कारण अब जल की मंद-मंद शीतल अनुकूल फुहार करते हुए मंथर गति से प्रकृति से विदा ले रहा है। कहीं उसमें प्रायश्चित के भाव जागृत हो गए हैं या फिर दो दिन बाद ही भाई-बहनों के लिए पवित्र राखी-पूर्णिमा है।
अभी भी जब-तब कुछेक स्थानों पर गरजते बादलों की गूँज, बिजली की चमक और बारिश की रिमझिम फुहार, सावन के श्रावणी स्वरूप को प्रदर्शित कर ही रहे हैं, जो यह संकेत दे रहा है कि कितना भी कमजोर हो, आखिर है, तो यह सावन ही। फिर उसके पीछे ही आ रहा भादों को भी, तो आभास होना चाहिए कि सावन अभी तुरंत ही इसी रास्ते से गया है, उसी के ये सारे पद-चिन्ह हैं।
भारतीय जनमानस के लिए सावन केवल एक माह या ऋतु भर ही नहीं माना जाता है, बल्कि यह बहुत पहले से ही उत्सवों, भक्ति और प्रेम का प्रतीक रहा है। इस सावन महीने में गाँव-गाँव, शहर-शहर में उमंग और उल्लास का वातावरण बना रहा है। घर-आँगन, गली-मुहल्ले, बाग-बगीचे, खेत-खलिहानों, राह-पगडंडियाँ, नदी-नालें, मंदिर-देवालयों आदि सब के सब सावन की रिमझिम बारिश में प्रफुल्लित हो उठे हैं।
सही भी है, सावन तो सबके लिए आया है। सिर्फ जीव-जन्तु ही नहीं, बल्कि समस्त स्थावर-जंगम सहित सम्पूर्ण प्रकृति में सावन के आगमन के साथ ही नव-सृजन, नव जोश, नई मस्ती दिखाई दे रहे हैं। बारिश की ‘टप-टप-टप’ की मधुर ध्वनि, बादलों की गड़-गड़ाहट, बिजली की चड़-चड़ाहट, पक्षियों के कलरव, मंडूकों की टर-टराहट आदि से युक्त होकर सम्पूर्ण प्रकृति ही एक अद्भुत संगीतशाला बना हुआ है, जो प्रतिपल संगीत-साधकों को नवीन धुन और काव्य-साधकों को नवीन छंद प्रदान करता रहा है।
घर-आँगन सबुज आम-पल्लवों व रंगीन कागजों से साज-धज के तैयार हो गए। नव विवाहिता के लिए ससुराल से श्रावणी तीज के लिए नई साड़ी, लहंगा, चूड़ियाँ, महेंदी, महावर, बिंदी, सिंदूर और आभूषण ‘सिंधारा’ या ‘सिंजारा’ के रूप में आए। अन्य सुहागिन स्त्रियाँ हरियाली तीज पर्व हेतु हरित परिधान पहनकर, हाथों में मेहंदी रचाकर और उनके साथ ही नव विवाहिताएँ भी अपने पति की लम्बी उम्र की कामना में हरियाली तीज के अवसर पर निर्जला उपवास व्रत भी रखीं। उसी के अनुरूप बाज़ार, मेला सुंदर-सुंदर मनभावन चूड़ियों, मेहंदी और सावनी गीतों के साथ पूरा सावन ही अपने पूरे यौवन पर रहे हैं। चतुर्दिक प्रफुल्लता में भाग-दौड़ की स्थिति बनी हुई है।
सावन आते ही घर के आँगन, गलियों और बाग-बगीचों के पेड़ों पर झूले लग गए, उन पर स्त्रियाँ भर सावन झूलती रही हैं। उनके चेहरे पर पड़ती बारिश बूंदें छितरा कर अनगिनत हिम-कणों और स्वाति-कणों में बिखर जाती रही हैं। श्रावणी फुहार में उनके रंग-बिरंगे भीगे वसन, उनके शरीर से चिपककर, शरीर का ही विशेष अंग बनकर उनके शारीरक सौन्दर्य को और भी अभिवृद्धि कर रहे हैं। पुरुष विहीन आँगन और बगिया में वे अपनी लाज-शर्म को किनारे कर श्रावणी-झूलों का भरपूर आनंद लेती रही हैं।
फिर संध्या और कुछ रात्रि की निस्तब्धता को कोयलिया, मोरनी और पपीहा जैसी सुंदर तान में गाई जा रही ‘कजरी’ तोड़ती रही है। बिरह की कजरी को सुनकर, शहर की ओर नौकरी पर जाते पैर, थमते रहे और फिर वापस अपने प्रिया की ओर लौट चले हैं। कहीं-कहीं महिलाएँ समूह में पारंपरिक विरह और मिलन के भाव को सँजोये विभिन्न गीतों को गाती और उनकी धुन पर अर्धरात्रि तक झूमती रही हैं। यही तो सावन की भावनात्मक गहराई को दर्शाते हैं।
श्यामल मेघाच्छन्न आकाश के नीचे जल से परिपूर्ण रजत वर्णी खेतों में घूँटने तक पानी में स्त्रियाँ धान के कोमल शिशु पौधों को सामूहिक गीत गाते रोपते हुए, उन खेतों के बीच-बीच फिसलन युक्त मेड़ों पर ‘बिहन’ (धान के शिशु पौधों) की पानी टपकते गठरी को अपने माथे पर लादे, अपने सधे पैरों को तेजी से बढ़ाते हुए कृषक मजदूर, कहीं-कहीं अपने माथे पर छतरी को ताने तनावग्रस्त ‘मेठ’ रोपनियों को जल्दी-जल्दी हाथ चलाने के लिए चिल्लाकर कुछ ‘अपशब्द’ कहते हुए आदेश देते हुए,
पास गड्ढों में कीचड़ में सने बच्चों का उछल-उछलकर कूदना, कुछ दूर के मैदानों में चरने में मग्न भैस और उसके पास ही बाँसुरी बजाता चरवाहा और उसके समीप में ही साँप के समान घुमावदार मार्ग से चाँदनी-सी चमकता बहता नाला आदि सब के सब विस्तृत श्यामल चित्र-फलक पर किसी अज्ञात शिल्पी के महान चित्र प्रतीत होते रहे हैं।
सावन भर गाँव की गली-मुहल्ले और जल से परिपूर्ण रजत वर्णी खेतों की कच्ची-फिसलन भरी मेड़ तथा राह-पगडंडियाँ गेरुआ वस्त्रधारी शिवभक्तों की कतारें, उनके काँवर के घुँघरुओं की रून-झुन की संगीतमय ध्वनि और उनके “बोल बम” के जयकारे से सम्पूर्ण वातावरण ही ‘शिवालय’ बना हुआ प्रतीत होता रहा है।
उसी के अनुरूप नदी-नालों के किनारे भी ‘जय माँ गंगे’ की पावन ध्वनि सम्पूर्ण वातावरण को ही पवित्रता का पाठ पढ़ाते रहे है। फिर कुछ दिन बाद ही खेतों में लहलहाती फसलें, नदियों का उफान और वातावरण की ताजगी- यह सब मिलकर सावन के अनगिनत मनमोहक दृश्य रचते हैं, जो मन को गहराई से छू जाते हैं। लेकिन सावन के हृदयग्राही सभी चित्रों को हृदय में संयोजे रखना कोई साधारण बात थोड़े ही है!
लेकिन प्राकृतिक और आध्यात्मिक परम सत्य है कि जो जन्मा है, वह एक दिन मरेगा ही। जो आया है, वह एक दिन जाएगा ही। दूसरे के लिए स्थान रिक्त करना ही होगा। तभी दूसरे का स्वागत किया जा सकता है। सावन जाएगा, तब न भादों आएगा, फिर शरद भी आएगा। इस संसार में मरने और जाने का दिन बड़ा ही दु:ख और गमगीन युक्त हुआ करता है। सभी बड़े दु:खी मन से अपनों को विदाई करते हैं। परंतु सावन के साथ एकदम विपरीत बात है।
जैसे-जैसे सावन अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ता है, उसके द्वारा सृजित और पालित प्राकृत्तिक सौन्दर्य अनुपम सौंदर्य को धारण कर भी प्रफुल्लित मन से सावन को विदा करती है। शायद प्राकृतिक सत्य भी है कि अगर जन्म हर्ष का विषय है, तो मृत्यु शोक का विषय कैसे? यदि किसी के आगमन पर हम प्रफुल्लित होते हैं, तो उसकी विदाई पर भी हमें प्रसन्नता ज्ञापन करना चाहिए, ताकि जाने वाला हर्षित मन से आगे गमन करे, न कि रोते हुए।
सावन झूम-झूमकर आता है, तो उसको झूम-झूमकर ही जाना चाहिए। सावन का जाना, केवल एक मौसम का समापन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुभव भी है। जैसे कोई प्रियजन विदा ले रहा हो, पर पीछे अनगिनत स्मृतियों की मिश्रित सुगंध छोड़ हो। सावन हमें प्रकृति के साथ जुड़ने, परंपराओं के साथ जीने और जीवन की क्षणभंगुरता को समझ कर कार्य करने का अवसर प्रदान करता है। जब तक अगले वर्ष फिर से सावन के काले-काले बादल आकाश में घिरेंगे और जमकर बरसेंगे, तब तक हम इस जाते सावन की विभिन्न सुखद यादों से ही अपने मन में उमंग, भक्ति और उल्लास की मीठी अनुभूति को सँजोये रहे।

श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक और स्वतंत्र लेखक
हावड़ा -1 (पश्चिम बंगाल)
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