कोलकाता। आज जब जीवन के आँगन में एक गहरी खाली जगह महसूस होती है, तब समझ आता है कि पिता केवल एक व्यक्ति नहीं होते, वे एक संपूर्ण संसार होते हैं। मेरे पिताजी भी मेरे लिए वही संसार थे- संस्कारों का आधार, संघर्षों की प्रेरणा और जीवन का सच्चा मार्गदर्शक।
उनके स्वर्गवास के बाद समाज की परंपराएँ, रीति-रिवाज और अनेक सलाहें मेरे सामने आईं। किसी ने कहा इतना दान करो, किसी ने कहा कि इतनी वस्तुएँ दो, किसी ने लंबी-चौड़ी सूची थमा दी। एक पल को लगा कि शायद यही सब करना ही “कर्तव्य” है। लेकिन जब मैंने अपने पिताजी के जीवन को याद किया, तो एक अलग ही सत्य सामने आया।
मेरे पिताजी ने कभी दिखावे में विश्वास नहीं किया। उन्होंने हमेशा सिखाया कि “भूखे को भोजन देना, नंगे को वस्त्र देना और दुखी के आँसू पोंछना ही सबसे बड़ा धर्म है।” उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि धर्म केवल विधि-विधान में है, बल्कि उन्होंने सिखाया कि धर्म इंसानियत में बसता है।
इसी सोच के साथ मैंने यह संकल्प लिया है कि पिताजी की स्मृति में किया जाने वाला दान केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं होगा, बल्कि वह उन लोगों तक पहुँचेगा, जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है।
मैं यह मानता हूँ कि अगर किसी गरीब के घर चूल्हा जलता है, किसी अतिपिछड़े परिवार के बच्चे को कपड़ा मिलता है, किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान आती है तो वही मेरे पिताजी के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मैं यह नहीं कहता कि परंपराएँ गलत हैं। वे हमारे समाज की पहचान हैं, हमारी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। लेकिन जब परंपरा और संवेदना के बीच चुनाव करना हो, तो मैं उस रास्ते को चुनना चाहूँगा जहाँ इंसानियत जीवित रहे।
इसलिए मैंने निर्णय लिया है कि पिताजी के नाम पर दिया जाने वाला दान अब केवल किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज के उन अंतिम पंक्ति के लोगों तक पहुँचेगा, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
शायद यही वह रास्ता है, जिससे मेरे पिताजी की आत्मा को सच्ची शांति मिलेगी। क्योंकि उन्होंने मुझे यही सिखाया था कि “बेटा, धर्म वह नहीं जो लोग दिखाते हैं, धर्म वह है जो दिल से महसूस होता है।”
आज मैं उन्हें याद करते हुए यही कह सकता हूँ पिताजी, आपने जो संस्कार दिए, वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी हैं। आपके जाने के बाद भी आप मेरे हर निर्णय में, हर सोच में, हर अच्छे काम में जीवित हैं।
आपको मेरी ओर से यही सच्ची श्रद्धांजलि है कि मैं आपके बताए रास्ते पर चलकर, किसी जरूरतमंद की जिंदगी में थोड़ा उजाला ला सकूँ।
आप अमर हैं, पिताजी…
क्योंकि आपके संस्कार आज भी मेरे भीतर जीवित हैं।
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