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अनुराधा वर्मा “अनु” की कलम से : “रसोई की खिड़की”

अनुराधा वर्मा “अनु”, कानपुर। जिस दिन मैं ससुराल आई, दिल में हजारों डर थे। नई जगह, नए लोग…सबसे बड़ा डर था मेरी सास को लेकर। सोच रही थी, अब सुबह 5 बजे उठना होगा, रोटियाँ बेलनी होंगी, गलती हुई तो डाँट पड़ेगी।

शादी के अगले दिन सुनीता जी ने प्यार से मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “चलो, रसोई दिखा दूं।”
मैं थोड़ा सहम गई…लेकिन जैसे ही हम रसोई में पहुँचे, उन्होंने गैस जलाने के बजाय रसोई की खिड़की खोल दी। ताज़ी हवा का झोंका आया और फिर उन्होंने जो कहा, वो मैं कभी नहीं भूल सकती।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “अनु, खाना तो तुझे धीरे-धीरे आ ही जाएगा। लेकिन इस घर में परफेक्शन नहीं, प्यार चाहिए। रोटियाँ गोल ना भी बनें तो चलेगा, पर रिश्ते दिल से बनने चाहिए।”

मैं उन्हें देखती रह गई…उन्होंने आगे कहा, “हर नई बहू से गलतियाँ होती हैं, तुमसे भी होंगी। लेकिन हम दोनों अगर एक-दूसरे को समझें, तो ये घर भी एक परिवार बन जाएगा।”

मेरी आँखें भर आईं…डर एकदम खत्म हो गया।
फिर वो बोलीं, “आज मैं चाय बना रही हूँ, तू बस बैठ कर पी ले…कल से धीरे-धीरे सीख जाना। लेकिन हमेशा ध्यान रखना- खाना चाहे जैसा भी बने, दिल साफ होना चाहिए।”

उस दिन मैंने जाना, सास अगर माँ जैसी हो, तो ससुराल कभी पराया घर नहीं लगता।

ससुराल की पहली सुबह : अनु की आंखें नींद से भरी थीं, लेकिन दिल अनगिनत भावनाओं से भरा हुआ। शादी को अभी चंद घंटे ही तो हुए थे। नए रिश्तों की बुनियाद पर रखा गया पहला कदम, वो भी इतने भारी जज़्बातों के साथ। कमरे की खामोशी में केवल पायल की धीमी रुनझुन थी और मन की धड़कनों का कोलाहल।

घड़ी ने सुबह के पाँच बजने का इशारा दिया। अनु ने धीरे से रजाई हटाई, जैसे खुद को समेटते हुए किसी नए जीवन के लिए तैयार कर रही हो। उसने एक झलक आइने में खुद को देखा – मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, और आंखों में थमी घबराहट।

दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई।
“अनु, उठ गई क्या?”
ये आवाज थी सुनीता जी की – घर की बड़ी और अब उसकी सास।

अनु ने जल्दी से दुपट्टा ओढ़ा और दरवाजा खोला।
“जी मम्मीजी…उठ गई।”
सुनीता जी ने मुस्कुरा कर उसका हाथ थामा, “चलो रसोई दिखा देती हूँ।”

अनु का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। मन में वही पुराने खयाल- अब रोज सुबह जल्दी उठकर रोटियाँ बेलनी होंगी, कोई गलती हुई तो डाँट पड़ेगी। यही सब तो सुना था अब तक, यही देखा था टीवी धारावाहिकों में।
रसोई में पहुँच कर अनु ने अनुमान लगाया कि अब गैस जलाने की बारी होगी…लेकिन सुनीता जी ने गैस की तरफ न जाकर, खिड़की की कुंडी खोली। खिड़की खुलते ही ठंडी ताजा हवा का झोंका कमरे में फैल गया। बाहर नीला आसमान धीरे-धीरे हलका नारंगी होने लगा था।

सुनीता जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “जानती है अनु, इस खिड़की से सुबह की हवा सबसे अच्छी लगती है।”
अनु चुपचाप खड़ी रही। वो सोच नहीं पा रही थी कि इस संवाद का जवाब कैसे दे।
“तुझे खाना बनाना आता है?” सुनीता जी ने पूछा।
“थोड़ा-थोड़ा…”अनु ने सिर झुका लिया।
“तो बस उतना काफ़ी है,” उन्होंने कहा।
फिर उनके शब्दों ने अनु के मन में जमे सारे डर पिघला दिए-
“अनु, खाना तो तुझे धीरे-धीरे आ ही जाएगा। पर इस घर में परफेक्शन नहीं, प्यार चाहिए। रोटियाँ गोल ना भी बनें, तो चलेगा। पर रिश्ते दिल से बनने चाहिए।”

अनु की आंखें भर आईं। कुछ जवाब नहीं दे सकी। सिर्फ सुनीता जी की आंखों में देखा, जो अनजाने ही माँ जैसी लगने लगी थीं।
अगले कुछ दिनों में अनु ने घर के तौर-तरीके सीखने शुरू किए। उसे ये कभी नहीं कहा गया कि “ये तेरी ज़िम्मेदारी है” या “ऐसे नहीं करते।”

सुनीता जी हर बात ऐसे कहतीं जैसे कोई पुरानी दोस्त सुझाव दे रही हो।
“प्याज पहले काट, फिर टमाटर डाल…और हाँ, नमक से ज़्यादा मीठा बोलना इस घर में।”

एक बार रोटियाँ कुछ कड़ी बन गईं। अनु का दिल बैठ गया। पर जब थाली में परोसी तो सुनीता जी ने मज़ाक में कहा,
“अरे वाह! आज तो पंजाबी रोटियाँ मिल रही हैं, crunchy!”
हँसी का वो पल अनु के लिए सबसे बड़ी राहत बन गया।
माँ जैसी सास का अहसास अनु को होने लगा और धीरे-धीरे रिश्ता गहराने लगा। अनु को अब रसोई में काम करने से डर नहीं लगता था। बल्कि वह सुबह की शुरुआत उसी खिड़की को खोलकर करती—जिससे ताज़ी हवा और सुनीता जी की बातें दोनों भीतर आती थीं।

एक दिन अनु ने अपनी मायके की याद में आँसू बहा दिए। सुनीता जी ने देखा और कुछ नहीं कहा। बस रसोई में जाकर खीर बना लाईं। चम्मच में भरकर अनु के मुँह में डाला और बोलीं- “जब मैं नई-नई बहू बनी थी, तब मेरी सास ने मुझे यही खीर बनाकर खिलाई थी…आज मैं तुझे दे रही हूँ।”

अनु ने महसूस किया कि ये कोई खीर नहीं, बल्कि प्यार की विरासत थी।
ठंड बढ़ रही थी और एक दिन सुनीता जी को जोर का बुखार आ गया। अनु ने पूरे घर का काम संभाल लिया। दवा देना, टाइम पर खाना बनाना, और उनका माथा सहलाना… सब कुछ जैसे किसी बेटी ने किया हो। रात में सुनीता जी की आँख खुली तो देखा अनु उनके पैरों की ओर बैठी नींद में झपक रही थी।

उन्होंने धीमे से उसका हाथ पकड़ा, “सो जा बेटा… मैं ठीक हूँ।” अनु ने बस इतना कहा, “आप ठीक रहें… यही काफी है।” वक़्त बीतने लगा। अनु अब परिवार की आत्मा बन चुकी थी।

एक दिन अनु ऑफिस इंटरव्यू के लिए तैयार हो रही थी। सुनीता जी ने देखा, मुस्कराईं, लेकिन कुछ कहा नहीं। अनु उनके पास गई, “आप कुछ कहेंगी नहीं?”

सुनीता जी ने धीमे से सिर पर हाथ फेरा, “बेटी, जब तू हँसती है ना, तो लगता है मेरे आँगन में सूरज निकला है। तू जहाँ भी जाएगी, उजाला साथ ले जाएगी।”

अनु की आंखें नम हो गईं। वो इंटरव्यू पर गई, लेकिन मन घर में ही अटका रहा। शाम को लौटी, तो देखा कि सुनीता जी रसोई की खिड़की के पास बैठी हैं। चुपचाप। शायद दिनभर अनु का इंतज़ार करती रहीं। अनु ने उनका हाथ पकड़ा, “मैं नौकरी बाद में कर लूंगी… अभी तो बस आपके साथ खिड़की से सुबह देखनी है।”

समय का पहिया कभी नहीं रुकता। एक दिन डॉक्टर ने बताया कि सुनीता जी की तबीयत अब ज़्यादा समय का साथ नहीं देगी। एक पुरानी बीमारी फिर से उभर आई थी। अनु ने ऑफिस छोड़ दिया। दिन-रात उनके साथ रहने लगी। अस्पताल में भी वही देखभाल, वही बातें, वही अपनापन… एक दिन जब सुनीता जी की आंखें अधखुली थीं, उन्होंने धीमे से कहा— “रसोई की खिड़की…बंद मत करना…”

अनु रो पड़ी, “नहीं मम्मीजी, वो हमेशा खुली रहेगी।”
कहते है न सेवा सुख जिसे नसीब हो और घर में शांति हो तो वह हर जंग जीत सकता है। सुनीता जी अनु के सेवा और स्नेह से बिल्कुल तंदुरुस्त हो गई।

समय के साथ हमें कानपुर से गुरुग्राम आना पड़ा,क्योंकि मेरी सासु माँ ने कहा- बेटा अब तुझे प्रत्यूष के साथ रहना होगा, इन बातों ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था, कारण कि मुझे अब तक अपने सासु मां से बहुत लगाव हो गया था मैं हतप्रभ रह गई,और मैं परिवार के आज्ञा से गुरुग्राम आ गई,आज मेरी सासु जी मेरे साथ नहीं रहती उन्हें भी मेरे ससुर जी की सेवा के लिए कानपुर रहना पड़ता है। पर उनका प्यार, उनकी सीख, और उनकी उपस्थिति अब भी घर के हर कोने में मिलती है।

रसोई की खिड़की अब हर सुबह अनु ही खोलती है। बाहर ताजी हवा आती है। भीतर चूल्हा जलता है, पर उससे पहले एक गुनगुनी याद रसोई में फैल जाती है। कभी-कभी अनु धीमे से मुस्कराकर कहती है-
“मम्मीजी, रोटियाँ आज भी गोल नहीं बनीं… लेकिन दिल आज भी गोल-गोल मुस्कुरा रहा है।”
कौन कहता है सासु मां नहीं बन सकती, बहु अगर अनु जैसी मिले और सासु मां सुनीता जी जैसा तो घर स्वर्ग बन जाता है।
I love you मम्मी जी, आज आप की बहुत याद आ रही है। आप स्वस्थ रहिए खुश रहिए। मैं आपके धरोहर (बेटा) को सम्भाल कर रखूंगी।

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