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अमिताभ अमित की कलम से : सच मे जमाना बदल गया है!

अमिताभ अमित, पटना। सच मे जमाना बदल गया है! ये नब्बे परसैंट से कम नंबर लेकर आने वाले बच्चो के शर्मिंदा होने के दिन है! एक हम लोगो का वक्त था जब लडके के साठ फ़ीसदी लेकर फस्ट डिविजन आने पर बाप निहाल हो जाता था! मैया मोहल्ले मे मिठाईयाँ बाँटने निकल पड़ती थी! दादा-दादी रास्ता चलते लोगो को रोक रोक कर पोते का रिजल्ट बताते थे और लड़का नई साईकल पाने का हकदार मान लिया जाता था! ऐसे खुशनुमा माहौल में मोहल्ले वाले अपनी गलती सुधारने के लिये मजबूर हो जाते थे कि हम लोग अब तक अमितबा को नाहक ही नालायक मानते रहे, ये तो ताँतीजी का नाम रोशन कर देने वाला चिराग निकला!

सब के साठ फीसदी तो आते नही थे पचपन के आसपास बने रहने वालो को भी शाबाश-शाबाश टाईप इज्जत की निगाह से देखा जाता था और चालीस-पैतालीस लाकर अगली क्लॉस मे कूद जाने वालो की भी इतनी बेइज़्जती नही होती थी कि लड़का बर्दाश्त ना कर पाये! यह तो फिर भी ठीक है एकाध सबजेक्ट मे लुढ़क जाने वालो की वकालत करने की ज़िम्मेदारी उनकी अम्माँये उठा ही लेती थी!

अब क्या बताये भौजी! तुम तो जानती ही हो! पप्पू परीक्षा के आठ दिन पहले तक तो टाईफाईड मे पड़े रहे! बस गणित मे दो नंबर की कसर रह गयी वरना अव्वल आते क्लॉस मे! अब बडी बहन की शादी मे लगी रह गई छोटी मुन्नी, वरना इत्ती पढ गई हमे तो सप्लीमैट्री का नाम तक पता नही था!

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फेल हो जाने वाले बच्चे और उनके माँ बाप भी इस खबर को सर्दी ज़ुकाम से ज्यादा तवज्जो देते नही थे! फेल होने की दर्जनों वजहें हमेशा मौजूद होती थी! बडकी की जचकी थी! खेत मे गेहूँ काटने मे लगा रहा! बीमार मां को और क़ौन देखता! गणित वाला मास्टर बेवजह नाराज था! हिस्ट्री वाले गुरूजी तो सनकी है ही! जैसी बाते की जाती थी ऐसे मौको पर और सब मान भी लेते थे !

रामराज था चारों तरफ! बच्चे खेलते-कूदते पास-फेल होते रहते थे! बाप को पता ही नही रहता था कि उसकी आधा दर्जन औलादो मे से कौन-किस क्लॉस मे है; और कितनी दफा फेल हो चुका है!
पास हो जाना भर काफी होता था तब! ग्यारहवी पास होने वाले लडके बस इस बात भर से खुश हो जाते थे कि अब स्कूल की मनहूस यूनिफार्म से छुटकारा मिल जायेगा और कॉलेज मे लडकियाँ भी साथ पढ़ेगी! वैसे तो लडकियाँ तब भी फेल होती नही थी पर भूले भटके कोई लडकी फेल हो भी जाये तो वो दुखी हो जाये ऐसा भी नही था! लडके वाले देखने आने लगते थे उन दिनो ये बात खु़श रहने की अपने आप मे बडी वजह थी!
उन दिनो भी एकाध लड़की सत्तर पार कर जाने जैसी हरकत कर बैठती थी! और उसके ऐसा करते ही फौरन मान लिया जाता था कि इस लडकी की नियत लड़कों के मुँह पर थूकने की थी! लोग बिना देखे मान लेते थे कि जरूर ये लडकी चश्मा लगाती होगी! इतने ज्यादा नंबर लाकर या तो अब ये कलेक्टर बनेगी या पूरी जिंदगी अपने बाप की छाती पर मूँग दलेगी! पूरी जिंदगी इसलिये क्योकि इसकी बराबरी का लड़का होगा तब तो मिलेगा इसके बाप को!

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ये वो अच्छे दिन थे जब साठ-सत्तर प्रतिशत लाने वालो के बारे मे घर के लोग यह यह मानते थे कि ये भगवान के बनाये स्पेशल बच्चे है और उनके बारे मे अडौसी-पड़ौसियों की यह धारणा होती थी कि ये निहायत सिरफिरा,असामाजिक ,घरघुस्सु ,और झोल छौरा है !
आज अपने बाप को शुक्रिया कहने का जी चाहता है! उन्होने हमे उस बेहतरीन वक्त में पैदा किया! यदि ये काम उन्होने इस जमाने मे किया होता तो आज हम कहीं मुँह छुपाने की जगह तलाश कर रहे होते!!

अमिताभ अमित – mango people

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