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देश की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिक भी नागरिकता की कसौटी पर, SIR सुनवाई ने खड़े किए सवाल

खड़गपुर। देश की सेवा में अपना जीवन खपा देने वाले पूर्व सैनिकों को आज अपनी ही नागरिकता साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। पश्चिम मेदिनीपुर जिले के दांतन नंबर–2 ब्लॉक से लेकर नंदीग्राम तक सामने आए मामले यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या वर्दी पहनकर देश की रक्षा करने वालों को भी अब पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?

दांतन–2 ब्लॉक के तलदा पंचायत अंतर्गत नारायण चौक निवासी 70 वर्षीय अमियरंजन दत्ता इसका ताजा उदाहरण हैं। अमियरंजन दत्ता वर्ष 1972 में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में भर्ती हुए थे और 2010 में सेवानिवृत्त हुए।

चार दशकों से अधिक समय तक देश की सुरक्षा में तैनात रहने वाले इस पूर्व जवान को हाल ही में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की सुनवाई में उपस्थित होने का नोटिस मिला। कारण बताया गया कि 2002 की मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज नहीं था।

अमियरंजन दत्ता का कहना है कि सेवा काल के दौरान उन्होंने विभिन्न स्थानों पर पोस्टल बैलेट के जरिए मतदान किया और सेवानिवृत्ति के बाद 2011 से अपने बूथ पर नियमित रूप से वोट डालते आ रहे हैं। सुनवाई के दिन वे बीडीओ कार्यालय पहुंचे और पेंशन दस्तावेज, वोटर कार्ड, आधार कार्ड समेत सभी जरूरी कागजात जमा किए।

उनके बेटे ज्योतिर्मय दत्ता ने बताया कि अधिकारियों ने सहयोग किया है और अब किसी समस्या की उम्मीद नहीं है। दांतन- 2 के बीडीओ अभिरूप भट्टाचार्य ने भी पुष्टि की कि दस्तावेजों की जांच पूरी हो चुकी है और अब उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।

हालांकि यह मामला अकेला नहीं है। नंदीग्राम के बूथ नंबर 79 से भी दो पूर्व सुरक्षाकर्मी प्रदीप प्रधान और प्रदीप जाना के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से कटने की खबर सामने आई है। दोनों पूर्व जवानों ने SIR सुनवाई के लिए बुलाए जाने पर गहरी नाराजगी जताई है। खास बात यह है कि यही वह बूथ है जहां नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी मतदान करते हैं।

इन घटनाओं ने एक बार फिर चुनावी राजनीति और राष्ट्रवाद के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तृणमूल कांग्रेस के दांतन–2 ब्लॉक अध्यक्ष इफ्तेखार अली ने आरोप लगाया कि SIR के नाम पर आम लोगों, खासकर बुजुर्गों और पूर्व सैनिकों को परेशान किया जा रहा है।

वहीं भाजपा नेता रामप्रसाद गिरी ने कहा कि पुराने समय की त्रुटियों को ठीक करने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है और चुनाव आयोग वास्तविक नागरिकों के नाम सम्मान के साथ मतदाता सूची में शामिल कर रहा है।

लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि जिन लोगों ने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, उन्हें आज भी सुनवाई में खड़े होकर अपनी पहचान साबित करने की पीड़ा झेलनी पड़ रही है। यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था, बल्कि समाज की संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

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