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उत्तर प्रदेश के लोकचित्रों को पहचान अवश्य मिलनी चाहिए – कुमुद सिंह

कला के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश को एक बेहतर कल के लिए तैयार करना है – नेहा सिंह
नई पीढ़ी में कलात्मक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा बेहद जरुरी है – डॉ. ऋतु सिंह

लखनऊ। लोककलाएं हमारी आदिम संस्कृति की निरंतरता का प्रमाण हैं और प्रासंगिकता एक नया नारा है। प्रासंगिकता के साथ ही प्रतिबद्धता का प्रश्न भी कला और साहित्य के साथ बराबर उठाया जाता रहा है। लोक कलाएं जीवन का अंग हैं। यह जीवन को बाहर से नहीं देखती, बल्कि जीवन से ओतप्रोत होती हैं। आज जब जीवन से कलाओं की एकात्मकता और जुड़ाव लुप्त होता जा रहा है तब आज के तथाकथित प्रासंगिकता के पैमाने पर लोककलाएं पूरी तरह फिट हैं यह मानना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।

लोक संस्कृति के प्रति एक और दृष्टि चिंता का विषय है कि प्रायः केवल नृत्य संगीत को ही लोक संस्कृति का अंग माना जा रहा इसके अन्य रूपों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रदेश की लोकचित्रों को विशेष महत्व देने की जरूरत है। कोहबर,चौक पूरना, पीड़िया, गोदन पूजा आदि प्रदेश की लोक कलाएं हैं। जिन्हें उनके प्रतीकों के माध्यम से ही समझा जा सकता है। उन प्रतीकों को समझने के लिए उन कलाओं के नजदीक जाना जरूरी है। हमारी लोक कलाओं में सांस्कृतिक चेतना का रस मिलता है।

उक्त बातें मंगलवार को बाराबंकी स्थित लखनऊ पब्लिक स्कूल में कोहबर कार्यशाला के शुभारम्भ के दौरान वरिष्ठ चित्रकार कुमुद सिंह ने कहा। ज्ञातव्य हो की पांच दिवसीय उत्तर प्रदेश की लोकचित्र कला में कोहबर कला कार्यशाला का आयोजन फ्लोरेसेंस आर्ट गैलेरी और लखनऊ पब्लिक स्कूल के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। जिसमे विशेषज्ञ के रूप में कुमुद सिंह हैं।

लखनऊ पब्लिक स्कूल्स एंड कॉलेजेस और फ़्लोरेसेंस आर्ट गैलरी के बीच सहयोगात्मक प्रयास उत्तर प्रदेश के लिए एक कलात्मक रूप से जागरूक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भविष्य के निर्माण की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पेशेवर कलाकारों, शिक्षकों और छात्रों को एक साझा रचनात्मक मंच पर लाकर, यह पहल न केवल परंपरा का संरक्षण कर रही है, बल्कि प्रतिभा को भी पोषित कर रही है।
जैसा कि नेहा सिंह ने कहा है कि “कल के कलाकार आज हमारी कक्षाओं में बैठे हैं। यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें विरासत में निहित उपकरण और कल्पना से प्रेरित पंख प्रदान करें।” कोहबर कला कार्यशाला इस बात का एक सशक्त उदाहरण है कि संस्कृति में निहित शैक्षिक नवाचार क्या हासिल कर सकता है। जैसे-जैसे ब्रश कागज़ पर चलते हैं और जीवंत रूपांकन जीवंत होते हैं, छात्र न केवल कला सीख रहे हैं – वे विरासत का अनुभव भी कर रहे हैं, एक-एक स्ट्रोक।

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प्रधानाचार्या डॉ. ऋतु सिंह ने कार्यशाला के दौरान अपना दृष्टिकोण साझा किया। प्रधानाचार्या डॉ. ऋतु सिंह ने संबोधित करते हुए नई पीढ़ी में कलात्मक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने स्कूलों के शैक्षणिक ढांचे के भीतर ऐसी कार्यशालाओं के आयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। “कला केवल एक विषय नहीं है – यह एक जीवन कौशल है जो अवलोकन, सहानुभूति और अभिव्यक्ति को बढ़ाता है।

इस कोहबर कला कार्यशाला के साथ, हम अपने छात्रों के लिए एक मूल्यवान सांस्कृतिक परंपरा को पुनर्जीवित और पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा मानना है कि युवा मन को लोक कला रूपों से परिचित कराकर, हम उन्हें सांस्कृतिक रूप से निहित, सामाजिक रूप से जागरूक व्यक्तियों के रूप में ढालते हैं,” उन्होंने छात्रों को तकनीकी कौशल से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और उनसे उस कला के गहरे प्रतीकात्मक अर्थों और पारंपरिक संदर्भों को समझने का आग्रह किया जो वे सीख रहे हैं।

गैलरी के क्यूरेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि भोजपुरी कलाओं की सक्षम हस्ताक्षर हैं डॉ कुमुद सिंह। वर्तमान में संप्रति स्नातकोत्तर महाविद्यालय साकेत अयोध्या में कला संकाय की अध्यक्ष पद से सेवानिवृत हैं। वह एक लोककला चित्रकार भी हैं और उनके चित्रों का मूल स्रोत लोक कलायें हैं। उनके व्यक्तित्व और कर्म में आज के समय में मेरी मान्यता के अनुसार भोजपुरी चित्रकला हेतु सभी आवश्यक पक्ष – कलाकार, व्याख्याता और प्रस्तोता या कुछ सीमा तक विश्लेषक – एक हद तक पूर्णता पाती है।

आज भोजपुरी कला की पहचान और प्रसार के लिए उपरोक्त तीनों पक्षों की आवश्यकता है । कार्यशाला के प्रारम्भ में डॉ कुमुद सिंह ने प्रदेश की कोहबर लोकचित्रों की बारीकियों से उपस्थित छात्रों और छात्रों के अभिभावकों को अवगत कराया। और उनमें प्रयुक्त प्रतीकों और रंगों के साथ ही उन अवसरों का भी विस्तार में जानकारी दी साथ अन्य प्रदेशों की लोकचित्रों से किस प्रकार भिन्न है अपने प्रदेश की लोक चित्र क्या हैं इस बात पर भी जोर दिया।

उन्होंने कहा की उत्तर प्रदेश की लोक चित्रों को अभी तक खास महत्व नहीं दिया गया है जिसके कारण आज प्रदेश की इस कला से लोग अनजान हैं हालाँकि इन कलाओं का इस्तेमाल तीज त्योहारों पर लोग खूब करते हैं लेकिन उसके कला पक्ष के बारे में जानकारी नहीं है। इसके लिए प्रदेश के स्थापित कला शिक्षण संस्थाएं, स्थापित कलाकार और सरकार को विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।

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आज तक प्रदेश की लोकचित्रों में किसी कलाकार को कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं दिया गया जैसा कि अन्य प्रदेशों में लोकविधाओं में अनेक देश के सर्वोच्च सम्मान दिए गए है। हम और आजके युवा पीढ़ी अपने लोक चित्रों से दूर होते जा रहें हैं। शोध तो बहुत हुए हैं लेकिन उनमे स्तरीयता नहीं हैं। बस नौकरी की भावना होती है उस कला को प्रोत्साहित करने की नहीं। जिस तरह से लोक नृत्य, लोक संगीत को सम्मान और पहचान मिली है उसी प्रकार प्रदेश की लोकचित्रों को भी मिलनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश की लोक चित्रकला कोहबर चित्रकला कार्यशाला लखनऊ पब्लिक स्कूल बाराबंकी तथा फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया। कुमुद सिंह ने कहा कि विस्मृत होती लोक चित्रकला को भावी पीढ़ी को शिक्षित कर संरक्षित करने का यह प्रयास सुश्री नेहा निदेशक फ्लोरोसेंस आर्ट गैलरी तथा डॉ. पूजा जी प्रिंसिपल लखनऊ पब्लिक स्कूल बाराबंकी तथा कला विभागाध्यक्ष व क्यूरेटर राजेश कुमार, क्यूरेटर भूपेंद्र अस्थाना के प्रयासों का परिणाम है।

कला विभागाध्यक्ष राजेश कुमार ने समकालीन शिक्षा के विकसित होते परिदृश्य में, आधुनिक शैक्षणिक परिवेश के साथ-साथ पारंपरिक कला शिक्षा के समान महत्व को पहचानना अनिवार्य है। जहाँ डिजिटल उपकरणों, वैश्विक प्रभावों और समकालीन विषयों ने कला शिक्षा के क्षितिज को महत्वपूर्ण रूप से व्यापक बनाया है, वहीं पारंपरिक रूपों के माध्यम से अभिव्यक्त हमारी सांस्कृतिक जड़ें रचनात्मक अभिव्यक्तियों का आधार बनी हुई हैं।

कला केवल तकनीक के बारे में नहीं है; यह इतिहास, पहचान और सामूहिक स्मृति के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। पारंपरिक प्रथाएँ, जैसे कि विशेष रूप से कोहबर कला, छात्रों को विरासत और सामुदायिक मूल्यों के साथ एक गहरा जुड़ाव प्रदान करती हैं। आधुनिक कक्षाओं में इन प्रथाओं को शामिल करने से न केवल कलात्मक कौशल, बल्कि सांस्कृतिक साक्षरता, अनुशासन और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के प्रति सम्मान भी बढ़ता है।

इस महत्वपूर्ण आवश्यकता को समझते हुए, कोहबर कला कार्यशाला को एक गहन शिक्षण वातावरण प्रदान करने के लिए सोच-समझकर संरचित किया गया है जहाँ छात्र व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से लोक परंपराओं से जुड़ सकते हैं। यह पहल सदियों पुराने रीति-रिवाजों के लोकाचार को समकालीन शैक्षणिक विधियों के साथ जोड़ती है।

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पारंपरिक कलाकारों को मार्गदर्शक के रूप में लाकर और अंतर-पीढ़ी ज्ञान हस्तांतरण को प्रोत्साहित करके, यह कार्यशाला अतीत और वर्तमान के बीच एक सार्थक सेतु का निर्माण करती है। आगे बताया कि इस कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्रों के साथ कुछ अभिभावक भी उपस्थित हुए जिन्होंने रुचि के साथ कोहबर कला के बारे में समझा जाना और एक एक चित्र भी बनाये।

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