सब दर्ज है ‘बाला सेक्टर’ में 90 के हिन्दू नरसंहार से शुरू कर एयर स्ट्राइक, प्रेम, और राजनीति तक

संदीप खंडेलवाल (राजस्थान) : 1990 की रात से शुरू होती है बाला सेक्टर की कहानी। उस रात क्या हुआ होगा हर वह व्यक्ति सहजता से समझ जायेगा जो उस रात वहाँ नहीं था। किस तरह की वीभत्सता को अंजाम दिया होगा कुछ आततायियों ने। उसके बाद लेखन में ऐसा सातत्य बना रहा कि कहानी कब शुरू हुई, खत्म कब हो गई, पता ही न चला। कमीना झोल भी तो नहीं आया कहानी के बीच कहीं। मेरे जैसा आलसी पाठक भी बाला सेक्टर हाथों-हाथ पढ गया। श्रीलाल शुक्ल जी माफ करें। आशीष त्रिपाठी जी से कुछ दिनों पहले ही फेसबुक पर जुडा उनके कुछ लेख ही पढ पाया जिनसे बहुत मुतासिर हुआ। आशीष त्रिपाठी गोरखपुर उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं, मैं राजस्थान से। भला हो फेसबुक का जो उनसे हमें मिलवा दिया।

मैंने मुंशी जी को पढ़ा, शुक्ल जी, परसाई जी, शरत, दिनकर इत्यादि को पढ़ा। आशीष त्रिपाठी जी को पढ़कर एक अलग ही अनुभव मिला। जिसने जब लिखा वह सामयिक लिखा। खैर उनके लेख आज भी पढ़ें जाते हैं, हम पढते भी हैं। तुलना तो बिल्कुल ही नहीं कर रहा हूं पर आशीष जी का यह सामयिक लेख बहुत मायनों में अपना अलग ही महत्व रखता है। उनकी लिखी ‘बाला सेक्टर’ बहुत से वो पहलू पटल पर रखती है जिससे हम अनभिज्ञ तो नहीं पर उसकी गूढता क्या है, यह जानते भी नहीं थे। कहने को तो श्री त्रिपाठी ने अपनी बात में कहा है कि सब कुछ काल्पनिक है पर जब आपके हाथ में पुस्तक होगी तो जान जायेंगे कि कुछ भी काल्पनिक नहीं है। इन सब किरदारों को तो हम जानते हैं बस नाम ही तो अलग है।

भारतीय इंटेलिजेंस अपनी जान हथेली पर रखकर किस तरह ‘सरफरोशी की तमन्ना’ अपने दिल में रखकर चलती है यह जानना कुछ सबूत मांगेंने वाले लोगों को अपनी फौज पर गर्व कराने पर मजबूर करता है।

आतंकवादी संगठनों की सियासत से और पाकिस्तानी आर्मी से सांठ-गांठ कितनी गहन है यह बताने में लेखक की कलम कहीं नहीं रुकती। बेहद संवेदनशील विषय पर लिखते हुए रह-रह कर आशीष भाई ने इतने बेहतरीन हास्य की भूमिकाएं बांधी हैं कि बरबस ही एकदम से दबी हुई हंसी निकल ही आती है। अपने उच्च स्तरीय राजनयिकों का कोई जिक्र नहीं हुआ यह थोडा अखरा कि कहानी के हिसाब से उन्हें भी शामिल करना चाहिए था। खैर इस बात से हटते हैं वापस पुस्तक पर आते हैं।

“नौलखिया का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम” बहुत से दिलों को कुरेद कर रख देगा पर कुछ सत्यता भी सामने रख देगा “एक मुजाहिद रॉ की पकड़ में आने पर कहता है हम जैसे मुजाहिद तो हजारों मिल जायेंगे पर उन जैसा गद्दार बहुत कम होते हैं” से पता चलता है कि नसीर जैसे प्रोफेसर मुजाहिदों से भी ज्यादा खतरनाक है और भी बहुत से छुये अनुछुये पहलू हैं जो आपको चमत्कृत कर देंगे।

किसी रेल की भांति गुजर गई बाला सेक्टर आंखों के आगे से। पटरियों सा कांपता रह गया मैं। ऐसा प्रतीत हुआ पढते हुए कि लेखक खुद हर जगह मौजूद थे वरना इतनी बारीकी से लिखना बहुत मुश्किल था।

“मुझे डर था कि मेरे कोकीन लेने की बात पता चलते ही वो लोग मुझे फौज से निकाल देंगे” दूसरा अधिकारी हंसा- बकवास! पाकिस्तानी फौज के न जाने कितने अफसर ड्रग्स का धंधा भी करते हैं और ड्रग्स लेते भी हैं, अगर इस वजह से फौज की छंटनी करने लगे तो आधी फौज बेदखल हो जायेगी। चल सच बता! यह प्रसंग साफ साफ बताता है कि हमारे देश में ड्रग्स मुख्यत: पाकिस्तान बॉर्डर से ही आती है और वहां के फौजियों की सांठ-गांठ के बिना यह मुश्किल कार्य लगता है। कुल मिलाकर हर परिदृश्य एक हकीकत बयां करता है, आप वह बखूबी समझेंगे।

बहुत कुछ था लिखने को पर आपसे आपके पढ़ने का सुख नहीं छीन सकता। पाठकों की नजरों में पापी हो जाऊंगा। फिर आशीष भाई कहेंगे “पूरी किताब ही लिख देते” लेखन सातत्य ऐसा कि दूध गैस पर रख दो उबल कर छलक जायेगा पर निगाहें बाला सेक्टर पर जमीं होंगी। शुरुआत में कुछ अपरिचित पात्रों से परिचय होगा पर लेखक ने ऐसा समां बांधा की सब कड़ियां जुडती जाती हैं। बस धैर्य रखकर पढना है। जिस उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी गई है पूर्ण विश्वास है वह अपना स्थान पा लेगी।

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