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अशोक वर्मा “हमदर्द” की शिक्षाप्रद कहानी : कर्म का दर्पण

अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। गांव के उस छोर पर एक पुराना सा घर था। समय की मार और मौसम की थपेड़ों ने उसके रंग-रूप को बदल दिया था। कभी यह घर रौनक से भरा रहता था, लेकिन आज वहाँ वीरानी का डेरा था। उसी घर में रहता था भानु- एक ऐसा व्यक्ति, जिसके जीवन में न तो प्रेम था और न ही अपनापन। भानु के चेहरे पर कठोरता की झलक थी, उसकी आँखों में दूसरों के प्रति अविश्वास और दिल में तिरस्कार भरा पड़ा था। वह किसी से मीठा बोलना तो दूर, अपने परिवार तक को अपनापन नहीं दे पाया। गाँव के लोग उससे कतराते थे और परिवार वाले उसकी कठोरता के कारण हमेशा मन मसोस कर रह जाते थे।

भानु की पत्नी निर्मला एक सहनशील और सीधी-सादी औरत थी। वह पति की कठोरता को भाग्य मानकर चुपचाप सब सहती रही। उनके इकलौते बेटे राघव को भी पिता के कठोर स्वभाव का सामना करना पड़ा। राघव बचपन से ही पिता के प्रेम और दुलार से वंचित रहा। भानु का यह मानना था कि प्यार और अपनापन दिखाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। वह हर वक्त बेटे को डांटता-फटकारता और उसके हर काम में कमी निकालता।

समय अपनी गति से बढ़ता रहा। राघव बड़ा हुआ और पढ़ाई में जुट गया। माँ की ममता और थोड़ी बहुत गांव वालों की सहानुभूति से उसका दिल इंसानियत से भरा रहा। पर पिता का साया उसके जीवन पर हमेशा एक बोझ की तरह बना रहा।

इधर भानु के जीवन में एक अजीब बदलाव आने लगा। जब राघव ने स्कूल की पढ़ाई पूरी की और कॉलेज जाने की तैयारी करने लगा, तब भानु के मन में अपने बेटे को ऊँचाई पर देखने की लालसा जाग उठी। पर यह लालसा भी उसके प्रेम से उपजी नहीं थी, बल्कि उसके अहम और प्रतिष्ठा की भूख का परिणाम थी। उसे अब यह चिंता सताने लगी कि लोग उसके बेटे को क्या कहेंगे। उसका बेटा सफल होगा तभी लोग उसे सम्मान की दृष्टि से देखेंगे। इस उद्देश्य से वह रात-दिन पूजा-पाठ में लग गया।

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गांव के मंदिरों में, पंडितों के पास, बाबाओं की कुटिया में, तीर्थ स्थलों की परिक्रमा में – भानु का दिन-रात अब वहीं बीतने लगा। उसने जगह-जगह यज्ञ करवाए, दान-दक्षिणा दी, लंबी यात्राओं पर निकला। लेकिन इन सब के बावजूद उसके दिल में वह मैल, वह घमंड, वह तिरस्कार का भाव जस का तस बना रहा। वह न तो अपने बेटे के साथ अपनापन दिखा पाया, न ही परिवार के अन्य लोगों से प्रेम कर सका।

राघव ने अपने सामर्थ्य भर प्रयास किए। उसने पढ़ाई की, मेहनत की, लेकिन पिता की कठोरता और घर के बोझिल वातावरण ने उसके आत्मविश्वास को धीरे-धीरे तोड़ डाला। उसकी कोशिशें नाकाम होने लगीं। नौकरी के अच्छे अवसर उसके हाथ से निकलते गए। भानु यह सब देखकर बौखला गया। उसका विश्वास था कि उसकी तपस्या, उसकी पूजा-पाठ, और तीर्थाटन से भगवान प्रसन्न होकर उसके बेटे को सफलता का ताज पहनाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ।

आखिर एक दिन भानु ने हताश होकर भगवान से भी मुँह मोड़ लिया। उसने पूजा-पाठ छोड़ दिया। अब वह और अधिक क्रोधी और कटु हो गया। उसे हर किसी में दोष दिखने लगे। वह अपने भाग्य को कोसने लगा। लेकिन उसने एक बार भी अपने आचरण को नहीं टटोला। उसने कभी यह नहीं सोचा कि प्रेम, अपनापन और सच्चे कर्म के बिना केवल पूजा-पाठ से भगवान प्रसन्न नहीं होते।

राघव यह सब देखता रहा। उसने पिता की असलियत को अब पूरी तरह समझ लिया। उसका दिल पिता के प्रति पूरी तरह से विरक्त हो गया। राघव ने जीवन में एक साथी चुना, विवाह किया और अपनी पत्नी के साथ पिता के घर को छोड़ कर चला गया। उसने अपने पिता की परछाईं से भी दूर जाने का निर्णय कर लिया। वह जान चुका था कि जहां प्रेम नहीं, वहां जीवन नहीं।

भानु अब अकेला रह गया। घर की दीवारें सूनी हो गईं। वह अपने किए का फल भोगने को विवश था। उसकी रातें जागते बीतने लगीं। उसने सोचा था कि उसका बेटा उसका सहारा बनेगा, लेकिन बेटे ने भी उसका साथ छोड़ दिया। वह जिन लोगों को जीवन भर तिरस्कृत करता रहा, वे सब उससे दूर हो चुके थे।

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एक दिन गांव के चौपाल पर बैठा भानु अपने जीवन की गलतियों पर विचार कर रहा था। उसे याद आया कि कैसे उसने अपने बेटे को कभी गले नहीं लगाया, कैसे उसने अपनी पत्नी की ममता का मान नहीं रखा, कैसे उसने पड़ोसियों और संबंधियों से केवल कटुता दिखाई।

उसकी आँखें भर आई। उसने पहली बार जाना कि पूजा-पाठ, तीर्थाटन और यज्ञ का कोई अर्थ नहीं अगर इंसान अपने कर्मों को शुद्ध न करे। उसने अब जाना कि सच्चा धर्म तो अपने कर्म में, अपने व्यवहार में, अपने प्रेम और अपने आचरण में होता है।

पर अब बहुत देर हो चुकी थी। राघव दूर शहर में अपनी नई दुनिया में व्यस्त था। गांव वाले उसकी दशा देखकर बस अफसोस ही कर सकते थे। भानु ने कई बार अपने बेटे से मिलने की कोशिश की, लेकिन राघव का दिल अब पिता के लिए पत्थर हो चुका था। भानु का अंतिम समय निःसंगता और अकेलेपन में बीता।

आखिर एक दिन भानु का शरीर भी इस दुनिया से विदा हो गया। उसकी चिता की आग से उठता धुआँ जैसे उसके जीवन की सारी भूलों और पछतावे को आकाश में समेटे चला गया। परिवार और गांव वालों ने जिसका वो तिरस्कार करता था उन्होंने हीं उसके अंतिम यात्रा को पूरा किया, पर उस यात्रा में न उसका बेटा था और न ही वह अपनापन जिसके लिए हर इंसान जीवन भर तरसता है।

कहते हैं कि मनुष्य का जीवन उसके कर्मों का दर्पण होता है। जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। भानु का जीवन इसी सच्चाई का प्रतीक बन कर रह गया। नर में नारायण के दर्शन की बात उसने जीवन भर अनदेखी की, और उसी अनदेखी का परिणाम उसे अंत में भोगना पड़ा।

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अशोक वर्मा “हमदर्द”, लेखक

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