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अशोक वर्मा “हमदर्द” की शिक्षाप्रद कहानी- दौलत के नशे में अहंकार का अंत

अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। भोर की पहली किरण जैसे ही आकाश पर फैली, गांव की गलियों में एक सूनी सी खामोशी पसर गई। हवा में पुराने पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट और दूर मंदिर की घंटियों की आवाज गूंज रही थी। उस खामोशी को आज भी लोग महसूस करते थे, जब भी कोई शेखर की हवेली के सामने से गुजरता। कभी जो हवेली रौनक का गढ़ थी, आज वीरानी की मिसाल बन चुकी थी।

शेखर गांव का सबसे अमीर आदमी था। बचपन से ही उसके पिता ने करोड़ों की संपत्ति छोड़ी थी। खेतों, कारखानों, हवेलियों और शहरों में बने आलीशान बंगलों की कोई गिनती न थी। दौलत का ऐसा नशा था कि शेखर को दुनिया की हर चीज अपनी मुट्ठी में लगती। वह सोचता था, पैसा है तो सब है- इज्जत, रिश्ते और ताकत।

गांव में कोई त्योहार होता, तो शेखर सैकड़ों लोगों को दावत देता। लेकिन यह दावत महज दिखावा थी, ताकि लोग उसके दबदबे और शानो-शौकत की चर्चा करें। वह अपनी बहन की शादी में भी अपनी शानो-शौकत का प्रदर्शन करता रहा, मगर बहन की आंखों में छिपे दर्द को कभी न पढ़ सका। क्योंकि उसे तो बस अपनी पहचान, अपनी हैसियत दिखानी थी। बहन मायके की दहलीज से विदा होकर हमेशा के लिए दूर हो गई, मगर शेखर को परवाह न थी।

शेखर की बूढ़ी मां अक्सर कहा करती, “बेटा, ये दौलत कुछ नहीं, अपना स्वभाव, अपनी विनम्रता ही इंसान का सबसे बड़ा गहना है।” मगर शेखर अपनी मां की बातों को हवा में उड़ा देता। उसे लगता, बूढ़ी मां पुराने जमाने की बातें करती हैं। अब तो पैसा ही सब कुछ है। धीरे-धीरे मां की आंखें इंतजार में थक गईं। मां की बीमारी बढ़ती रही, मगर शेखर उसके पास बैठकर कभी उसका हाल तक न पूछता। मां अकेलेपन में घुट-घुट कर चल बसी। शेखर ने मां की मौत पर भी दिखावे का शोक रखा- शानदार तेरहवीं, सैकड़ों लोगों का भोज। मगर उसके आंगन की दीवारों ने उस दिन उसके भीतर के सूनेपन को देख लिया था।

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समय बीतता गया। शेखर की एकमात्र संतान, उसका बेटा विक्रम, धीरे-धीरे अपने पिता से दूर होता गया। विक्रम को अपने पिता का घमंड, लोगों से रूखा व्यवहार, और रिश्तों की तिजारत पसंद नहीं थी। एक दिन विक्रम अपने पिता से कह बैठा, “पिताजी, इस दौलत ने आपको इंसान नहीं, पत्थर बना दिया है। आपके पास सब कुछ है, मगर दिल का सुकून नहीं।”

शेखर ने बेटे की बातों पर ध्यान देने के बजाय उसे घर से निकाल दिया। विक्रम अपने छोटे से परिवार के साथ शहर चला गया। शेखर ने सोचा, “जाए जहां जाना है। मैं कौन सा उसके सहारे जी रहा हूं। दौलत है मेरे पास, मैं किसी का मोहताज नहीं।”

वक्त का पहिया घूमा। शेखर की उम्र ढलने लगी। अब उसके कारखाने घाटे में जाने लगे। खेतों में उपज कम होने लगी। नौकर-चाकर एक-एक कर उसे छोड़ने लगे। जिन रिश्तेदारों को शेखर कभी पैसे से खरीदता रहा, वे सब मुंह फेरने लगे। जो लोग कभी उसके चरण छूते थे, वे अब उसके नाम से कतराने लगे। शेखर की हवेली वीरान होने लगी।

वह खुद को अब अकेला महसूस करने लगा। उसकी बड़ी-बड़ी कोठियों की दीवारें अब उसे जेल की दीवारें लगने लगीं। जहां कभी महफिलें सजा करती थीं, वहां अब सन्नाटा था। जो बेटे की हंसी की गूंज को घमंड में दबा चुका था, वही अब उसके आंगन में गूंजती उस हंसी को तरस रहा था।

शेखर अब बीमार रहने लगा। बीमारी ने उसके शरीर को तोड़ दिया, मगर उससे भी बड़ा बोझ था उसकी आत्मा पर चढ़ा हुआ अहंकार, जो अब पिघलने लगा था। बिस्तर पर पड़ा शेखर रोज दरवाजे की ओर देखता, शायद विक्रम आए। मगर दरवाजा कभी न खुला।

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पड़ोसी लोग कभी-कभी उसे देखने आते, मगर अब उनके भीतर वो सम्मान नहीं था जो कभी शेखर पैसों से खरीदता था। लोग दया दृष्टि से देखते, मगर अब शेखर के पास दया पाने की भी पात्रता न बची थी।

एक रात जब हवेली में बस एक दिया टिमटिमा रहा था, शेखर की आंखों से आंसू बहने लगे। उसे अपनी मां के शब्द याद आए—“स्वभाव और अपनापन ही इंसान को अमर बनाते हैं।” शेखर ने अपनी अंतिम सांस में बस यही सोचा—“काश, दौलत के नशे में मैं इतना अंधा न होता। काश, मैंने अपनों को अपना समझा होता…”

सुबह गांव के लोगों ने देखा कि शेखर की सांसें थम चुकी थीं। हवेली के दरवाजे पर कोई न रोया, कोई न पछताया। उसकी अर्थी को कांधा देने वाला भी कोई न था। गांव के कुछ गरीब मजदूरों ने चंदा जुटाकर उसका अंतिम संस्कार किया।

शेखर की हवेली आज भी खड़ी है, मगर वो हवेली अब लोगों के लिए एक मिसाल है। बच्चे अपने बड़ों से सुनते हैं- “ये वही हवेली है जहां शेखर रहा करता था। दौलत का नशा, घमंड और अहंकार ने उसे क्या से क्या कर दिया। दौलत किरायेदार है, वो घर बदलती रहती है। पर स्वभाव, मुस्कुराहट, अपनापन और चरित्र, ये ही ऐसे धन हैं जो इंसान को हमेशा जीवित रखते हैं।”

गांव की गलियों से गुजरने वाली हवा आज भी शेखर की कहानी कहती है। और हर कोई अपने बच्चों को सिखाता है कि अहंकार इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। घमंड किस बात का, जब सब कुछ यहीं रह जाना है? अहंकार मनुष्य को इस तरह खा जाता है जैसे कपड़े को कीड़ा,जो देखने में तो नजर नहीं आता मगर अंदर से वो सब कुछ खत्म कर दिया होता है।

अशोक वर्मा “हमदर्द”, लेखक

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