कोलकाता हिन्दी न्यूज | 10 सितम्बर 2026: पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वामपंथी संगठनों की ओर से दुर्गापूजा के दौरान लगाए जाने वाले मार्क्सवादी साहित्य और पत्र-पत्रिकाओं के बुक स्टॉल को लेकर कड़ा संदेश दिया है।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म और भगवा रंग के खिलाफ टिप्पणी या विरोध करने वालों के खिलाफ भविष्य में सख्त कदम उठाए जाएंगे।
मुख्यमंत्री ने दुर्गापूजा समितियों से अपील करते हुए कहा कि यदि कम्युनिस्ट संगठनों के बुक स्टॉल पर ‘दुर्गापूजा’ की जगह केवल ‘शारदोत्सव’ लिखा जाता है, तो उन्हें स्टॉल लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद बंगाल में दुर्गापूजा की धार्मिक पहचान, ‘शारदोत्सव’ शब्द के इस्तेमाल और पूजा मंडपों के बाहर लगने वाले वामपंथी साहित्य के स्टॉल को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
‘दुर्गापूजा लिखना होगा’: पूजा समितियों से मुख्यमंत्री की अपील
विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ने कथित वामपंथी विचारधारा से जुड़े कुछ शिक्षकों और संगठनों पर सनातन धर्म को निशाना बनाने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, “एक वर्ग के कुछ प्रोफेसर खुद को तथाकथित वामपंथी बताकर सनातनियों पर हमला करते हैं। वे चुन-चुनकर भगवा को निशाना बनाते रहे हैं। मैं सभी दुर्गापूजा समितियों से अपील करूंगा कि कम्युनिस्ट जो बुक स्टॉल लगाते हैं, वहां ‘दुर्गापूजा’ न लिखकर यदि ‘शारदोत्सव’ लिखा जाता है, तो उन्हें स्टॉल लगाने की अनुमति न दें।”
मुख्यमंत्री के बयान का सार यह था कि दुर्गापूजा के दौरान पुस्तक स्टॉल लगाने वाले संगठनों को इस आयोजन की धार्मिक पहचान को स्वीकार करना चाहिए।
हालांकि, इस मुद्दे पर संबंधित वामपंथी संगठनों या दुर्गापूजा समितियों की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
‘शारदोत्सव’ बनाम ‘दुर्गापूजा’ पर क्यों छिड़ी बहस?
पश्चिम बंगाल में लंबे समय से दुर्गापूजा को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बंगाली समाज के बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में भी देखा जाता रहा है।
खबर के अनुसार, राज्य में वाम मोर्चा शासन के दौरान दुर्गापूजा को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ी और कई वामपंथी प्रकाशनों में ‘दुर्गापूजा’ के बजाय ‘शारदोत्सव’ शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा।
वाम मोर्चा के 34 वर्षों के शासनकाल के दौरान इस शब्दावली को लेकर कोई बड़ा राजनीतिक विवाद नहीं था। लेकिन राज्य में राजनीतिक परिवर्तन के बाद ‘शारदोत्सव’ शब्द के इस्तेमाल पर सत्तारूढ़ पक्ष से जुड़े कई नेताओं ने आपत्ति जताई।
पहले भी दिलीप घोष समेत कई नेताओं ने ‘शारदोत्सव’ शब्द को लेकर अपनी असहमति जताई थी। अब मुख्यमंत्री के ताजा बयान के बाद यह मुद्दा फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
मुख्यमंत्री ने वामपंथियों पर ‘दोहरा रवैया’ अपनाने का आरोप लगाया
मुख्यमंत्री ने वामपंथी संगठनों पर दुर्गापूजा की धार्मिक परंपरा को लेकर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया।
उनका कहना था कि पुस्तक बेचने या साहित्य प्रचार करने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि दुर्गापूजा के अवसर पर स्टॉल लगाया जा रहा है तो उस आयोजन की धार्मिक पृष्ठभूमि को स्वीकार किया जाना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि उनके अनुसार दुर्गापूजा को केवल एक सामान्य उत्सव के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह हिंदू समुदाय का एक प्रमुख धार्मिक आयोजन भी है।
दुर्गापूजा और वामपंथी बुक स्टॉल की पुरानी परंपरा
पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान वामपंथी और मार्क्सवादी साहित्य के बुक स्टॉल लगाने की पुरानी परंपरा रही है। खासकर बड़े पूजा मंडपों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में लाल कपड़े से सजे मार्क्सवादी साहित्य के स्टॉल कभी पूजा के मौसम का परिचित दृश्य हुआ करते थे।
बताया जाता है कि बड़े पूजा आयोजनों के बाहर इन स्टॉलों पर मार्क्सवादी साहित्य, पत्र-पत्रिकाएं और राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी किताबें बेची जाती थीं।
प्रत्यक्ष रूप से पूजा अनुष्ठान का हिस्सा बने बिना, बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने के लिए पुस्तक स्टॉल को वामपंथी संगठनों के एक माध्यम के रूप में देखा जाता रहा।
1954 में पार्क सर्कस से शुरू हुई थी परंपरा
खबर के मुताबिक, दुर्गापूजा के दौरान पुस्तक स्टॉल लगाने की इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1954 में पार्क सर्कस में मुजफ्फर अहमद की पहल से हुई थी।
इसके बाद धीरे-धीरे विभिन्न पूजा मंडपों के बाहर वामपंथी साहित्य के स्टॉल लगाए जाने लगे। पार्क सर्कस में पुस्तक स्टॉल लगाने की यह परंपरा आज भी कुछ हद तक जारी है।
इन स्टॉलों पर मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़ी किताबें, साहित्य और विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। समर्थकों के अनुसार, इनका उद्देश्य साहित्य और वैचारिक पुस्तकों को आम लोगों तक पहुंचाना है।
2011 के बाद बदली तस्वीर
राज्य में 2011 के बाद राजनीतिक परिस्थितियों के साथ दुर्गापूजा के दौरान वामपंथी बुक स्टॉल की तस्वीर भी बदली है।
खबर के अनुसार, पहले जहां कई बड़े पूजा मंडपों के बाहर ऐसे स्टॉल आसानी से दिखाई देते थे, वहीं अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है। वर्तमान में कुछ चुनिंदा स्थानों पर ही इस तरह के मार्क्सवादी साहित्य के स्टॉल लगाए जाते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के साथ सार्वजनिक स्थानों पर राजनीतिक और वैचारिक संगठनों की मौजूदगी के स्वरूप में भी बदलाव आया है।
मुख्यमंत्री का संदेश
मुख्यमंत्री के बयान से यह स्पष्ट है कि उनका मुख्य मुद्दा पुस्तक या साहित्य की बिक्री नहीं, बल्कि दुर्गापूजा की पहचान और ‘शारदोत्सव’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर है।
उनके अनुसार, यदि कोई संगठन दुर्गापूजा के दौरान पूजा परिसर या उसके आसपास पुस्तक स्टॉल लगाता है, तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वह एक धार्मिक आयोजन के अवसर पर अपनी गतिविधि चला रहा है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्यमंत्री की अपील के बाद दुर्गापूजा समितियां क्या रुख अपनाती हैं और वामपंथी संगठन इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। आने वाले दिनों में ‘दुर्गापूजा’ और ‘शारदोत्सव’ शब्दों को लेकर यह बहस बंगाल की राजनीति और पूजा संस्कृति में और तेज हो सकती है।
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