DP Singh

डीपी सिंह की रचना – कड़वे सच…

चाह सत्ता से है वो पाँव दबाने आए
मक्खियाँ मुँह से कोई उसके उड़ाने आए

चाह सत्ता की भी है, लोग हिलाते रहें दुम
सुब्ह-ओ-शाम उनको कोई तेल लगाने आए

वहशी कदमों के तले एक कली रौंदी गई
फिर मगरमच्छ वहाँ आँसू बहाने आए

अब अदालत की रिवायत से तो यूं लगता है
लोकशाही में शहंशाही चलाने आय

कौन भागेगा शब-ओ-रोज खबर के पीछे
पत्रकार अब तो सियासत को जमाने आए

उनका दावा था कि वो जात मिटाएंगे, मगर
वो तो इक वर्ग की ही जात मिटाने आए

बह्र, गण, छन्द, गजल, गीत, न रस से मतलब
कुछ सुखनवर तो फकत मंच सजाने आए

(जात – जाति
जात – अस्तित्त्व)

डीपी सिंह

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