नई दिल्ली। न्याय, समानता और नागरिक के भरोसे की परीक्षा। लश्कर भी तुम्हारा है, सरदार भी तुम्हारा है, तुम झूठ को सच लिख दो, अखबार तुम्हारा है। इस दौर के फरियादी जाएँ तो कहाँ जाएँ,
कानून तुम्हारा है, दरबार तुम्हारा है। ये पंक्तियाँ आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि तब होती है जब एक आम नागरिक न्याय की उम्मीद लेकर व्यवस्था के दरवाजे पर पहुँचता है। सबसे बड़ा सवाल उस गरीब किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार, छात्र और मध्यम वर्गीय नागरिक का है, जिसके पास न राजनीतिक पहुँच है, न प्रभाव और न ही बार-बार व्यवस्था के दरवाजे खटखटाने की ताकत। यदि पीड़ित की बात सुनने और शिकायत दर्ज कराने के लिए भी संघर्ष करना पड़े, तो वह न्याय की उम्मीद लेकर आखिर जाए कहाँ?
देश में हजारों ईमानदार अधिकार पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाते हैं। इसलिए सवाल किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने का है जो हर नागरिक को समान सम्मान, सुरक्षा और न्याय का भरोसा दे। हमारा संविधान हम भारत के लोग से शुरू होता है। अनुच्छेद 14 से 21 समानता, स्वतंत्रता, जीवन और गरिमा जैसे मूल अधिकारों का संवैधानिक संरक्षण देते हैं। फिर सवाल सीधा है जब अधिकार सबके लिए समान हैं, तो न्याय तक पहुँच भी सबकी समान क्यों न हो?
न्याय केवल अदालत के अंतिम फैसले का नाम नहीं है। न्याय की पहली सीढ़ी है पीड़ित की बात सुनी जाए, शिकायत दर्ज हो, निष्पक्ष जाँच हो और उसके साथ सम्मान का व्यवहार हो। कानून का भय अपराधी को होना चाहिए, नागरिक को नहीं। व्यवस्था का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, विश्वास पैदा करना होना चाहिए। क्योंकि जिस दिन आम नागरिक को लगे कि न्याय पाने के लिए पहचान, पैसा या प्रभाव जरूरी है, उस दिन चोट केवल एक व्यक्ति को नहीं, लोकतंत्र के भरोसे को लगती है।
इसलिए जरूरत किसी व्यक्ति के खिलाफ खड़े होने की नहीं, बल्कि अन्याय, भेदभाव, भ्रष्टाचार और भय की संस्कृति के खिलाफ संवैधानिक आवाज उठाने की है। इतना मत डराओ कि डरना छोड़ दे। यह इंकलाब हिंसा का नहीं, संवैधानिक चेतना का इंकलाब होना चाहिए।
हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ थाने का दरवाजा हर नागरिक के लिए समान रूप से खुला हो जहाँ शिकायतकर्ता की पहचान से ज्यादा उसकी शिकायत महत्वपूर्ण हो जहाँ कमजोर को न्याय के लिए ताकतवर का सहारा न लेना पड़े। लोकतंत्र केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह नागरिक की भी जिम्मेदारी है। अधिकारों के साथ कर्तव्य, सवाल के साथ समाधान और विरोध के साथ संवैधानिक मर्यादा यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
व्यवस्था बदले संविधान के रास्ते। समाज बदले इंसानियत के साथ।आवाज उठे किसी को गिराने के लिए नहीं, किसी को उठाने के लिए। क्योंकि असली क्रांति तब होगी जब डर कम होगा और भरोसा बढ़ेगा, जब पहचान छोटी और इंसानियत बड़ी होगी और जब न्याय किसी की पहुँच नहीं, हर नागरिक का अधिकार होगा। तब लोकतंत्र केवल किताबों में लिखा संविधान नहीं रहेगा, बल्कि हर नागरिक के जीवन में महसूस होने वाला विश्वास बनेगा। मैं अकेला नहीं हूँ, मेरे साथ मेरा संविधान है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
चिंतक / मेंटर /एक्टिविस्ट/दिल्ली विश्वविद्यालय
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