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महाभारत के काल निर्णय और कूटनीति पर हुआ मंथन राष्ट्रीय व्याख्यान संगोष्ठी में

घटनाओं, साक्ष्यों और ग्रहीय स्थिति के आधार पर सम्भव है महाभारत की काल गणना – पूर्व संभागायुक्त डॉ. मोहन गुप्त
सार्वभौमिक और सार्वकालिक है महाभारत का सन्देश – प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा

उज्जैन। राष्ट्रीय स्तर पर महाभारत पर आधारित राष्ट्रीय व्याख्यान संगोष्ठी का आयोजन सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला, ललित कला अध्ययनशाला द्वारा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चरखारी, महोबा तथा चातुर्वेद संस्कृत प्रचार संस्थानम्, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि पूर्व संभागायुक्त एवं कुलपति डॉ मोहन गुप्त ने महाभारत काल विमर्श पर व्याख्यान दिया। अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने की। आयोजन में प्राचार्य डॉ. धर्मेन्द्र कुमार गुप्त, श्रावस्ती ने कणिक कूटनीति विमर्श विषय पर व्याख्यान दिया।

पूर्व संभागायुक्त एवं कुलपति डॉ. मोहन गुप्त ने अपने व्याख्यान में महाभारत काल विमर्श करते हुए कहा कि अनेक घटनाएं, ग्रहीय स्थिति और साक्ष्य हैं जिनके आधार पर महाभारत की काल गणना की जा सकती है।

रामायण और महाभारत को लेकर लोक में अनेक भ्रामक अवधारणा प्रचलित हैं हमें इनसे बचना चाहिए। जब हम कोई निष्कर्ष निकालें तो तर्क के आधार पर निकालें, तभी हमारा चिंतन सार्थक दिशा में गतिमान होगा।

कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि महाभारत का सन्देश सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। यह भारतीय संस्कृति और परम्परा के अमूल्य रत्नों का विलक्षण भण्डार है।

महाभारत के समय और समाज जीवन को लेकर अनेक अंतः साक्ष्यों के अलावा पुरातात्विक और लोक साक्ष्य उपलब्ध हैं। यह महाकाव्य विशाल ज्ञान निधि है, जिसे हम मानव सभ्यता का जीवंत इतिहास कह सकते हैं। इसकी विशालता इसकी विषयवस्तु के विश्वकोशीय स्वभाव और इसके सन्देश की सार्वकालिकता से पूरी तरह मेल खाती है।

प्राचार्य डॉ. धर्मेंद्र कुमार गुप्त, श्रावस्ती ने अपने उद्बोधन में कणिक कूटनीति पर चर्चा करते हुए कहा कि अगर हमारे वैदेशिक संबंध अच्छे नहीं है तो हमारे राष्ट्र का निष्पादन अच्छी गति से नहीं हो सकता।

यह कूटनीति हमें सिखाती है कि हमारे संबंध दूसरे राष्ट्रों से भी अच्छे होने चाहिए ताकि जब हम संकट में हों तो उनसे सहायता ली जा सके। साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोग करके हमें सफलता प्राप्त करनी चाहिए।

किसी राजा को अपनी दुर्बलता को किसी को नहीं दिखाना चाहिए, बल्कि उसे पहचान कर उसको दूर करना चाहिए। शासक को कछुए के समान अपने अंगों की रक्षा करनी चाहिए और उसके अंग है उसकी सेना, राजकोष, मंत्री, गुप्तचर आदि।

प्रास्ताविकी और स्वागत भाषण समन्वयक प्रो. जगदीश चन्द्र शर्मा ने दिया। उन्होंने हिंदी साहित्य में महाभारत विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण ये तीन महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

श्रीमद्भागवत पुराण भारतीय संस्कृति, कला रूपों आदि का विश्व कोश है। इसमें वह सब मिलता है, जिसकी जिज्ञासा हमें होती है। हिंदी साहित्य में ऐसी कई रचनाएं हैं जिन्हें महाभारत को आधार पर लिखा गया है।

कार्यक्रम में मुद्राशास्त्री डॉ. रामचंद्र ठाकुर, पुरातत्वविद डॉ. रमण सोलंकी, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन के संगठन महामंत्री डॉ. प्रभु चौधरी आदि सहित देश के विभिन्न भागों के विद्वान सहभागी थे।

कार्यक्रम में मंगलाचरण डॉ. अनन्या श्रीवास्तव ने किया। राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन संयोजक डॉ. चंद्रकांत दत्त शुक्ल, मऊ उत्तर प्रदेश ने किया और आभार प्रदर्शन सह समन्वयक प्रो. उमाशंकर त्रिपाठी, महोबा ने माना।

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