कोलकाता हिन्दी न्यूज | 09 सितम्बर 2026: दुर्गापूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर छिड़ी बहस के बीच पश्चिम बंगाल के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री दिलीप घोष ने मांसाहार के पक्ष में अपनी स्पष्ट राय रखी है।
न्यूटाउन स्थित इको पार्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिलीप घोष ने कहा कि खाने-पीने को लेकर किसी तरह की बाध्यता नहीं होनी चाहिए और हर व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार भोजन करने की स्वतंत्रता है।
यह विवाद उस समय तेज हुआ, जब मध्य प्रदेश के कथावाचक और संत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर बाबा के नाम से भी जाना जाता है, ने दुर्गापूजा के दौरान मांसाहार करने वाले लोगों को लेकर टिप्पणी की। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई।
‘जिसे जो खाना है, वह खाए’
मंगलवार सुबह इको पार्क में प्रातःभ्रमण के बाद पत्रकारों ने दिलीप घोष से दुर्गापूजा के दौरान मांसाहार और शाकाहार को लेकर चल रहे विवाद पर सवाल किया। जवाब में उन्होंने कहा कि भोजन को लेकर विवाद की कोई आवश्यकता नहीं है।
दिलीप घोष ने कहा, “मैं तो मछली के अलावा कुछ खाता ही नहीं। यह बड़ी बात नहीं है। जिसे जो पसंद है, वह वही खाए। इसमें विवाद की कोई जगह नहीं है।”
उन्होंने पश्चिम बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में दुर्गापूजा और अन्य धार्मिक आयोजनों के दौरान बलि की परंपरा भी रही है। ऐसे में पूजा के बाद मांसाहारी प्रसाद ग्रहण करने को लेकर विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।
‘बंगाल में पांठा बलि की परंपरा रही है’
दिलीप घोष ने कहा कि पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान कई स्थानों पर पांठा यानी बकरे की बलि की परंपरा रही है और उसके मांस को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। उन्होंने कहा कि मां काली सहित विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा परंपराओं में भी बलि की प्रथा का उल्लेख मिलता है।
उनके मुताबिक, कुछ साधु-संत स्वास्थ्य की दृष्टि से शाकाहारी भोजन की सलाह दे सकते हैं, लेकिन इसे धार्मिक बाध्यता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “कोई-कोई साधु-संत कहते हैं कि शाकाहारी भोजन करना अच्छा है, लेकिन इसकी कोई बाध्यता नहीं है।”
बागेश्वर बाबा की टिप्पणी पर दिलीप घोष का पलटवार
बागेश्वर बाबा की टिप्पणी का जिक्र करते हुए पत्रकारों ने दिलीप घोष से पूछा कि अगर पूजा के दौरान मांसाहार करने वालों को ‘पाखंडी’ या अधार्मिक कहा जाता है, तो क्या वह इस टिप्पणी को स्वीकार करेंगे।
इस पर दिलीप घोष ने पलटकर सवाल किया कि बागेश्वर बाबा के पास आने वाले सभी श्रद्धालुओं के बारे में क्या यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उनमें से कोई भी मछली या मांस नहीं खाता।
उन्होंने कहा, “उनके पास जो भक्त जाते हैं, क्या वे हलफ लेकर कह सकते हैं कि उनमें से एक भी मछली-मांस नहीं खाता?”
दिलीप घोष ने कहा कि साधु-संत अपने दृष्टिकोण से बातें करते हैं और शाकाहार को स्वास्थ्य के लिए बेहतर मान सकते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग है।
‘हम यहां मां काली के भक्त हैं’
दिलीप घोष ने पश्चिम बंगाल की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि यहां मां काली की भक्ति और उनसे जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है।
उन्होंने स्वामी विवेकानंद से जुड़ी एक प्रसिद्ध उक्ति का भी उल्लेख किया और कहा कि बंगाल की धार्मिक संस्कृति को केवल शाकाहार या मांसाहार के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
उनके बयान का मूल संदेश यही रहा कि व्यक्ति को अपनी पसंद और परंपरा के अनुसार भोजन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तथा किसी एक खान-पान की आदत को सभी पर थोपना उचित नहीं है।
बीजेपी के शमीक भट्टाचार्य भी रख चुके हैं ऐसी राय
मांसाहार को लेकर यह रुख केवल दिलीप घोष तक सीमित नहीं है। खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य की ओर से भी इसी तरह की टिप्पणी सामने आ चुकी है।
हालांकि, इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से कोई स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
दुर्गापूजा में भोजन को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पूजा-पद्धति, प्रसाद और खान-पान की परंपराओं में काफी विविधता देखने को मिलती है।
इसी वजह से दुर्गापूजा के दौरान शाकाहार और मांसाहार को लेकर अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं।
हालिया विवाद में एक ओर जहां कुछ संतों ने पूजा के दौरान शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देने की बात कही, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के नेताओं ने राज्य की स्थानीय परंपराओं और खान-पान की संस्कृति का हवाला दिया है।
दिलीप घोष के बयान ने इसी बहस को एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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