सुप्रीम कोर्ट की फटकार संविधान नहीं मानते तो भारत छोड़कर जाइए – अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026
अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। व्हाट्सऐप द्वारा वर्ष 2021 में लाई गई टेक इट ऑर लीव इट प्राइवेसी पॉलिसी पर प्रश्न उठा? क्या वैश्विक टेक कंपनियाँ भारतीय संविधान के दायरे में काम करने को तैयार हैं या नहीं? डीपीडीपी अधिनियम 2023 का मूल उद्देश्य केवल डेटा चोरी रोकना नहीं है, बल्कि नागरिकों को अधिकार देता है कि उनका डिजिटल अस्तित्व भी उतना ही संरक्षित हो जितना उनका भौतिक अस्तित्व।
वैश्विक स्तर पर भारत इक्कीसवीं सदी में केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं रहा, बल्कि वह अब डिजिटल लोकतंत्र, डेटा संप्रभुता और नागरिक निजता के वैश्विक विमर्श का केंद्र बन चुका है। करोड़ों भारतीय नागरिकों का डिजिटल जीवन, उनकी बातचीत स्वास्थ्य जानकारी, आर्थिक लेन-देन, सामाजिक व्यवहार और वैचारिक झुकाव अब तकनीकी प्लेटफॉर्मों के सर्वरों में दर्ज हो रहा है।

ऐसे समय में यह प्रश्न केवल तकनीकी या व्यावसायिक नहीं रह जाता, बल्कि सीधे-सीधे संविधान, मानवाधिकार और राज्य की संप्रभु जिम्मेदारी से जुड़ जाता है। डिजिटल पर्सनल डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी एक्ट), 2023 इसी ऐतिहासिक जरूरत की उपज है, जो यह स्पष्ट करता है कि भारत में किसी भी नागरिक का डेटा अब अनियंत्रित कॉर्पोरेट शक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
मैं खुद भी यह मानता हूं कि डीपीडीपी अधिनियम 2023 का मूल उद्देश्य केवल डेटा चोरी रोकना नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को यह अधिकार देता है कि उनका डिजिटल अस्तित्व भी उतना ही संरक्षित हो, जितना उनका भौतिक अस्तित्व। यह कानून स्पष्ट करता है कि डेटा किस उद्देश्य से,कितनी सीमा तक और कितनी अवधि के लिए प्रोसेस किया जा सकता है।
यह अधिनियम सूचित सहमति को केंद्रीय तत्व बनाता है, ताकि कोई भी कंपनी चाहे वह भारत की हो या विदेशी, यूजर को मानो या छोड़ो जैसी शर्तों में फँसाकर उसकी निजता का सौदा न कर सके। इस दृष्टि से भारत पहली बार डेटा को केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करता दिखता है।
इसी पृष्ठभूमि में व्हाट्सऐप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा का मामला केवल एक कंपनी की प्राइवेसी पॉलिसी तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह प्रश्न बन जाता है कि क्या वैश्विक टेक कंपनियाँ भारतीय संविधान के दायरे में काम करने को तैयार हैं या नहीं।
वर्ष 2021 में व्हाट्सऐप द्वारा लाई गई टेक इट ऑर लीव इट प्राइवेसी पॉलिसी ने भारतीय यूजर्स को दो ही विकल्प दिए, या तो नई शर्तें स्वीकार करें या सेवा छोड़ दें। यह नीति न केवल असमान शक्ति-संतुलन का उदाहरण थी, बल्कि इसने नागरिकों की वास्तविक सहमति की अवधारणा को भी खोखला कर दिया। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (एनसीएलएटी) ने नवंबर 2024 में इस नीति को प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन मानते हुए मेटा पर 213.14 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया।
आयोग का स्पष्ट मत था कि व्हाट्सऐप ने अपनी डॉमिनेंट पोज़िशन का दुरुपयोग करते हुए यूजर्स को ऐसी शर्तें मानने के लिए मजबूर किया, जिनका व्यावसायिक लाभ सीधे मेटा के विज्ञापन मॉडल को जाता था। यह जुर्माना केवल आर्थिक दंड नहीं था, बल्कि यह एक नियामकीय संदेश था कि भारत में डिजिटल बाजार अब फ्री-फॉर-ऑल नहीं रहेगा।
हालाँकि, जनवरी 2025 में एनसीएलएटी ने एक विरोधाभासी रुख अपनाया। उसने डॉमिनेंस के दुरुपयोग वाले निष्कर्ष को हटाते हुए भी जुर्माने को बरकरार रखा। यह निर्णय कानूनी दृष्टि से जटिल था, क्योंकि यदि डॉमिनेंस का दुरुपयोग नहीं हुआ, तो फिर जुर्माने का आधार क्या है यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। इसी कानूनी असंगति को चुनौती देते हुए मेटा सुप्रीम कोर्ट पहुँची, लेकिन शायद उसे यह अनुमान नहीं था कि यह मामला केवल प्रतिस्पर्धा कानून तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधे भारतीय संविधान की आत्मा से टकराएगा।
मंगलवार, 3 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इस विवाद को ऐतिहासिक मोड़ दे दिया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस कठोरता और स्पष्टता से व्हाट्सऐप-मेटा की प्राइवेसी प्रैक्टिस पर सवाल उठाए, उसने यह संकेत दे दिया कि अब अदालत इस मामले को केवल कॉर्पोरेट नीति के रूप में नहीं देख रही।
साथियों बात अगर हम 3 फरवरी 2026 को हुई सुनाई को गहराई से समझने की करें तो केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर ने जब यह तर्क रखा कि व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी शोषणकारी है और यूजर्स के डेटा का व्यावसायिक उपयोग करती है, तब अदालत की प्रतिक्रिया असाधारण रूप से सख़्त थी।
मुख्य न्यायाधीश का कथन अगर हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते तो भारत छोड़कर जाइए किसी भी वैश्विक टेक कंपनी के लिए अब तक की सबसे तीखी न्यायिक चेतावनी मानी जा सकती है। यह कथन केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि यह भारत की डिजिटल संप्रभुता की स्पष्ट घोषणा थी।
अदालत ने यह रेखांकित किया कि कोई भी सेवा प्रदाता भारत में व्यापार तभी कर सकता है, जब वह भारतीय संविधान, मौलिक अधिकारों और नागरिकों की गरिमा का सम्मान करे। अदालत ने यह भी कहा कि व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी इतनी चालाकी से तैयार की गई है कि एक आम नागरिक चाहे वह गरीब बुज़ुर्ग महिला हो, सड़क किनारे वेंडर हो या केवल तमिल बोलने वाली ग्रामीण महिला उसके निहितार्थ कभी समझ ही नहीं सकती।
यह टिप्पणी भारत की सामाजिक-आर्थिक विविधता को केंद्र में रखती है और यह स्वीकार करती है कि सूचित सहमति केवल अंग्रेज़ी में लिखे लंबे दस्तावेज से नहीं आती सहमति तभी वास्तविक मानी जाएगी, जब यूजर को पूरी तरह यह समझ हो कि उसका डेटा कैसे, क्यों और किसके साथ साझा किया जा रहा है।
साथियों बात अगर हम इस सुनवाई को और गहराई से समझने की करें तो सुनवाई के दौरान पीठ के अन्य माननीय जस्टिस ने बहस को और गहराई देते हुए कहा कि डीपीडीपी एक्ट भले ही प्राइवेसी की बात करता हो, लेकिन असली चिंता यूजर्स की बिहेवियरल टेंडेंसीज को लेकर है।
उन्होंने स्पष्ट रूप से यह प्रश्न उठाया कि जब डिजिटल फुटप्रिंट का उपयोग ऑनलाइन विज्ञापन और माइक्रो-टार्गेटिंग के लिए किया जा रहा है, तब यह केवल प्राइवेसी का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि यह मानव व्यवहार के व्यावसायिक दोहन का मामला बन जाता है। यह टिप्पणी वैश्विक स्तर पर फेसबुक- कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसे घोटालों की याद दिलाती है, जहाँ डेटा का उपयोग लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने तक में किया गया।
मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं का उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे ही कोई डॉक्टर व्हाट्सऐप पर दवाइयों के नाम भेजता है, कुछ ही मिनटों में उन्हीं दवाओं के विज्ञापन दिखने लगते हैं। यह उदाहरण इस बात की ओर इशारा करता है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के दावों के बावजूद, मेटाडेटा और व्यवहारिक संकेतों का उपयोग किस हद तक व्यावसायिक प्रोफाइलिंग में किया जा रहा है। यह सवाल केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी भी है।
मेटा के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सीमित डेटा शेयरिंग की अनुमति है और कंपनी की नीतियाँ अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी अगर आपको डेटा का कोई भी हिस्सा बेचने लायक लगेगा, तो आप उसे बेच देंगे? कॉर्पोरेट मंशा पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती है? अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय उपभोक्ताओं की चुप्पी को उनकी सहमति नहीं माना जा सकता।
साथियों बात अगर हम यह पूरा विवाद वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने की करें तो यह और भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यूरोप का जीडीपीआर, अमेरिका में राज्य-स्तरीय डेटा कानून और अब भारत का डीपीडीपी एक्ट ये सभी संकेत देते हैं कि दुनिया अब डेटा फ्री मार्केट से डेटा गवर्नेंस की ओर बढ़ रही है। भारत, अपने विशाल यूजर बेस और लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण, इस परिवर्तन में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख़्त भूमिका यह संदेश देती है कि भारत केवल कानून बनाकर नहीं, बल्कि उन्हें लागू कराकर भी डिजिटल अधिकारों की रक्षा करेगा।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि अब यह मामला केवल व्हाट्सऐप या मेटा का नहीं है। यह सवाल है कि डिजिटल युग में नागरिक की गरिमा, निजता और स्वायत्तता को कौन परिभाषित करेगा कॉर्पोरेट एल्गोरिद्म या लोकतांत्रिक संविधान। 9 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई और तीन- जजों की बेंच का निर्णय भारत के डिजिटल भविष्य की दिशा तय कर सकता है। यदि अदालत नागरिकों के पक्ष में सख़्त मानक तय करती है, तो यह न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नया डेटा-न्याय मॉडल प्रस्तुत करेगा। यह संघर्ष दरअसल डेटा साम्राज्यवाद और संवैधानिक संप्रभुता के बीच है। और इस बार, संकेत स्पष्ट हैं भारतीय संविधान पीछे हटने के मूड में नहीं है।
(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)
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