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‘धोक’ – जन्मशती वर्ष की शुरुआत पर श्रद्धा निवेदन, राजस्थानी के प्रसिद्ध कथाकार – विजयदान देथा

कोलकाता : 1 सितंबर 1926-10 नवंबर, 2013 -‘लोककथाओं के ‘बीज’ से अनंत कहानियाँ ‘उगाई’ जा सकती हैं।’ विजयदान देथा, जिन्हें स्नेह से ‘बिज्जी’ के नाम से जाना जाता है, राजस्थानी साहित्य के एक प्रमुख स्तंभ थे। उनका जन्म 1 सितंबर 1926 को ब्रिटिश भारत के जोधपुर रियासत के बोरुंदा गाँव में हुआ था। वे आम-जन की पीड़ाओं को अपनी रचनाओं में जीवंत रूप से चित्रित करते थे। वे सायर कंवर से विवाहित थे और उनके पाँच संतानें थीं। देथा ने राजस्थानी भाषा में लेखन करने का दृढ़ संकल्प लिया था।

विजयदान देथा की शिक्षा और प्रारंभिक जीवन बोरुंदा गाँव में बीता, जहाँ उन्होंने लोकपरंपराओं से निकटता प्राप्त की। युवावस्था में वे जोधपुर चले गए, जहाँ उन्होंने साहित्यिक गतिविधियों में भाग लिया। 1950 के दशक में कोमल कोठारी से उनकी मित्रता हुई, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी, 1960 में कोमल कोठारी के साथ मिलकर उन्होंने रूपायन संस्थान की स्थापना की, जो धीरे-धीरे राजस्थानी लोककथाओं, कला एवं संगीत के दस्तावेजीकरण का प्रमुख केंद्र बन गया। रूपायन संस्थान के माध्यम से उन्होंने लोकगीतों, लोककथाओं और लोककलाओं का संकलन किया, जो आज भी शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।

देथा की रचनाएँ बोलचाल की राजस्थानी बोलियों, विशेषकर मारवाड़ी, पर आधारित हैं। उन्होंने लोककथाओं को ‘बीज’ माना, जिनसे अनंत कहानियाँ ‘उगाई’ जा सकती हैं। उनके लेखन में व्यंग्य का उपयोग प्रमुख है, जो ‘लोक’ के संघर्ष को उजागर करता है। देथा को पद्म श्री (2007) और साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974) – यह राजस्थानी/मारवाड़ी रचना के लिए पहला था – एक ऐसी कहानियों के संग्रह के लिए जो ‘अजीब और बेधड़क’ थीं, जैसे सम्मानों से नवाजा गया।

इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार भी प्रदान किए गए। 2011 में, इस 85 साल के प्रतिभाशाली राजस्थानी लोककथाकार को साहित्य के प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था, इससे इस लेखक पर वैश्विक ध्यान आया, जो ऐसी भाषा- राजस्थानी – में लिखते थे जो भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 मान्यता प्राप्त आधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं थी- तब भी नहीं थी, आज तक भी नहीं है।

देथा का जीवन राजस्थानी लोकसंस्कृति के संरक्षण और प्रचार से गहराई से जुड़ा हुआ था। उन्होंने लगभग 800 से अधिक लघुकथाएँ लिखीं, जो मुख्यतः राजस्थान की मौखिक परंपराओं पर आधारित थीं। उनका लेखन समाजवाद, सामंतवाद-विरोध और नारीवाद जैसे विषयों पर केंद्रित था। देथा की रचनाएँ न केवल लोककथाओं का संग्रह हैं, बल्कि वे सामाजिक परिवर्तन के औजार भी हैं। उन्होंने कभी भी राजस्थानी के अलावा किसी अन्य भाषा में लेखन नहीं किया, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था- “आज तक मैंने किसी अन्य भाषा में नहीं लिखा।” देथा का जीवन ग्रामीण राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने में समर्पित रहा।

उन्होंने ‘ज्वाला’ साप्ताहिक में कॉलम लिखे, जो सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित थे। उनकी लेखन प्रक्रिया सरल थी- वे लोककथाओं को सुनते, उन्हें नोट करते और फिर साहित्यिक रूप देते। उनके पुत्र कैलाश कबीर ने उनकी अधिकांश रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया, जिससे वे व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचीं। देथा का योगदान केवल लेखन तक सीमित नहीं था; उन्होंने गणेशी लाल व्यास की पूर्ण रचनाओं का संपादन किया और राजस्थानी-हिंदी कहावत कोश का निर्माण किया। उनका जीवन एक समर्पित लोक साहित्यकार का उदाहरण है, जो हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज बना।

राजस्थान की रंग-रंगीली लोक-संस्कृति को आधुनिक प्रगतिशील कलेवर में पेश करने वाले, लोककथाओं के अनूठे चितेरे विजयदान देथा यानी ‘बिज्जी अपने पैतृक गांव में ही रहते थे, राजस्थानी में ही लिखते थे और हिंदी-जगत फिर भी उन्हें हाथोंहाथ लेता था। चार साल की उम्र में पिता को खो देने वाले श्री देथा ने न कभी अपना गांव छोड़ा, न अपनी भाषा। ता-उम्र राजस्थानी में लिखते रहे और लिखने के सिवा कोई और काम नहीं किया। बने बनाए साँचों को तोड़ने वाले विजयदान देथा ने कहानी सुनाने की राजस्थान की समृद्ध परंपरा से अपनी शैली का तालमेल किया।

चतुर गड़ेरियों, मूर्ख राजाओं, चालाक भूतों और समझदार राजकुमारियों की जुबानी विजयदान देथा ने जो कहानियां बुनी उनमें उनके शब्द धड़कने लगे, जीवंत हो उठे। राजस्थान की लोककथाओं को मौजूदा समाज, राजनीति और बदलाव के औजारों से लैस कर उन्होंने कथाओं की ऐसी फुलवारी रची जिसकी सुगंध दूर-दूर तक महसूस की जा सकती है। अपने ढंग के अकेले ऐसे कथाकार, जिन्होंने लोक साहित्य और आधुनिक साहित्य के बीच मजबूत पुल बनाया। उन्होंने राजस्थान की विलुप्त होती समृद्ध लोक गाथाओं की पुनर्प्रतिष्ठा की, जो अन्य किसी के लिए असंभव-सी थी। उनकी नज़र आवरण को भेद कर मर्म का दर्शन कर लेती। वे एक जादुई कथाकार थे।

सही मायनों में वे राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने उस अनथक भाषा में आधुनिक गद्य और समकालीन चेतना की नींव डाली। अपने लेखन के बारे में उनका कहना था- “हवाई शब्द-जाल व विदेशी लेखकों के अपच का वमन करने में मुझे कोई सार नजर नहीं आता। आकाशगंगा से कोई अजूबा खोजने की बजाय मुझे पाँवों के नीचे की धरती से कुछ कण बटोरना ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है, अन्यथा इन कहानियों को गढ़ने वाले लेखक की कहानी तो अनकही रह जाएगी।”

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विजयदान देथा की कहानियाँ पढ़कर एफटीआईआई में महान फिल्मकार ऋत्विक घटक के छात्र रहे विख्यात फिल्मकार मणि कौल इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने तत्काल उन्हें लिखा- ‘तुम तो छुपे हुए ही ठीक हो। …तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गयीं तो वे कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ेंगे। …गिद्ध हैं नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल से ढँक रखा है।‘

हुआ भी यही, अपनी ही एक कहानी के दलित पात्र की तरह- जिसने जब देखा कि उसके द्वारा उपजाए खीरे में बीज की जगह ‘कंकड़-पत्थर’ भरे हैं तो उसने उन्हें घर के एक कोने में फेंक दिया, किंतु बाद में एक जौहरी की निगाह उन पर पड़ी तो उसकी आँखें चौंधिया गयीं, क्योंकि वे कंकड़-पत्थर नहीं, कीमती हीरे थे। विजयदान देथा के साथ भी यही हुआ। उनकी कहानियाँ अनूदित होकर जब हिंदी में आयीं तो हिंदी-संसार की आँखें चौंधिया गयीं।

विजयदान देथा एक ‘मैक्सिको के कवि’ की कहानी सुनाना पसंद करते थे- ‘एक मैक्सिकन लेखक अर्जेंटीना के दूरदराज गांव में था और वहां उसने कुछ मछुआरों को समुद्र में जाल फेंकते देखा। मछुआरे एक गीत गा रहे थे। उसने आश्चर्य से पूछा, “क्या तुम जानते हो यह किसका गीत है? क्या तुम पाब्लो नेरुदा को जानते हो?” अनपढ़ मछुआरों ने जवाब दिया, “नेरुदा कौन? हमें तो सिर्फ यह गीत पता है।” अपने आंसू पोंछते हुए मैक्सिकन लेखक ने कहा, “कितना महान कवि था, जिससे अनजान रहकर भी उसके गीत दूसरे देशों के मछुआरे गाते हैं!” यह किस्सा देथा की रचनाओं का मूल है, उन्होंने अपनी कहानियां चाची, पड़ोसी कुम्हारों, किसानों, दरबारी नौकरों और चोरों तक से सुनी थीं।

ये उनकी कहानियां थीं जब वे सुनाते थे, और अब उनकी कहानियां जब वे लिखते हैं। वास्तव में, देथा की कहानियां भी दुनिया भर में सुनाई जाती हैं, लेकिन कम लोग जानते हैं कि लेखक कौन है। उदाहरण लीजिए बॉलीवुड फिल्म ‘पहेली’ (शाहरुख खान अभिनीत और अमोल पालेकर निर्देशित) या थिएटर गुरु हबीब तनवीर का सदाबहार नाटक ‘चरनदास चोर’- बहुत से लोग इन प्रोडक्शंस को जानते हैं या देख चुके हैं, लेकिन कम लोग जानते हैं कि ये बिज्जी की कहानियों ‘दुविधा’ और ‘खंटीलो चोर’ पर आधारित थे। लोककथा अमर है; कहानीकार हमेशा नहीं।

विजयदान देथा की रचनाएँ राजस्थानी लोककथाओं का खजाना हैं। उन्होंने 14 खंडों वाली ‘बाताँ री फुलवारी’ (1960-1975) लिखी, जो लोककथाओं का संग्रह है। यह राजस्थान की बोलियों पर आधारित है और इसमें 800 से अधिक कहानियाँ शामिल हैं। इसका हिंदी अनुवाद ‘बातों की बगिया’ (2019) के नाम से उपलब्ध है। अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं- ‘प्रेरणा’ (1953, कोमल कोठारी के साथ), ‘सोरठा’ (1956-1958), ‘राजस्थानी लोकगीत’ (1958, छह खंड), ‘टिडो राव’ (1965, पहली पॉकेट बुक), ‘उलझन’ (1984, उपन्यास), ‘अलेखुं हिटलर’ (1984, लघुकथाएँ), ‘रूंख’ (1987), ‘कबू रानी’ (1989, बालकथाएँ)।

अपनी मातृ भाषा राजस्थानी के समादर के लिए ‘बिज्जी’ ने कभी अन्य किसी भाषा में नहीं लिखा, उनका अधिकतर कार्य उनके एक पुत्र कैलाश कबीर ने हिन्दी में अनुवादित किया – ‘उषा’ (1946, कविता), ‘बापू के तीन हत्यारे’ (1948, आलोचना), ‘अनोखा पेड़’ (1968, बालकथाएँ), ‘महामिलन’ (1998, उपन्यास), ‘अंतराल’ (1997), ‘सपन प्रिया’ (1997), ‘प्रिया मृणाल’ (1998), ‘चौधराइन की चतुराई’ (1996)…।

कुछ प्रमुख कहानियों के सारांश और थीम्स का विश्लेषण करें। ‘दुविधा’ कहानी एक नवविवाहित स्त्री की दुविधा पर आधारित है। प्रेम, इच्छा, सामाजिक बंधन और नारी की दुविधा के थीम की यह कहानी नारी सशक्तिकरण को दर्शाती है, जहाँ स्त्री अपनी इच्छाओं का चयन करती है। कथा सारांश है कि एक युवती लछमी का विवाह किशन से होता है, लेकिन किशन व्यापार के लिए चला जाता है। एक भूत किशन का रूप धारण कर लछमी से प्रेम करता है। असली किशन के लौटने पर दुविधा उत्पन्न होती है। बेजोड़ कथा पितृसत्ता की चुनौती और वैकल्पिक संबंधों का अन्वेषण करती है।

‘खंटीलो चोर’ पर आधारित है ‘चरनदास चोर’। एक चोर गुरु को वचन देता है कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, लेकिन चोरी जारी रखेगा। सत्य, नैतिकता, व्यंग्य से भरा थीम। सारांश है कि ‘चरनदास चोर गुरु को चार वचन देता है – कभी राजा नहीं बनेगा, कभी हाथी पर नहीं चढ़ेगा, कभी राजकुमारी से विवाह नहीं करेगा और कभी झूठ नहीं बोलेगा। लेकिन परिस्थितियाँ उससे इन वचनों की परीक्षा लेती हैं। यह कहानी सामाजिक व्यंग्य है, जो सत्ता और नैतिकता पर बड़े प्रश्न उठाती है।

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‘दोहरी जिंदगी’ की कहानी दो मित्रों की लड़कियों की है जो धोखे से विवाहित हो जाती हैं। समलैंगिकता, नारीवाद, सामाजिक मानदंड का विस्फोटक थीम। यह कहानी लिंग समानता और वैकल्पिक यौनिकता पर केंद्रित है। देथा यहां पितृसत्ता को चट्टानी चुनौती देते हैं। ‘अलेखुं हिटलर’ की कहानियों में प्रत्येक व्यक्ति में हिटलर की उपस्थिति का अन्वेषण। फासीवाद, सामाजिक अन्याय, व्यंग्य से भरा दुरूह थीम। सारांश है कि कहानियाँ दैनिक जीवन में छिपे अत्याचारों को उजागर करती हैं। देथा यहां सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लोककथाओं के माध्यम से उठाते हैं। फासीवाद की आलोचना है।

‘उलझन’ एक उपन्यास जो पारिवारिक और सामाजिक उलझनों पर आधारित है। परिवार, संघर्ष, समाजवाद है थीम। सारांश है कि नायक की जीवन यात्रा में सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष। देथा की यह रचना अधिक गहन है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक संघर्ष को दर्शाती है। ‘कबू रानी’ की बालकथाएँ नैतिक शिक्षा देती हैं। नैतिकता, बुद्धिमत्ता, लोकज्ञान के थीम पर।

सारांश है कि विभिन्न लोककथाएँ जो बच्चों को जीवन के सबक सिखाती हैं, जैसे समझदारी और ईमानदारी। ‘रूंख’ एक वृक्ष की कहानी है जो पर्यावरण और जीवन के संबंध को दर्शाती है। प्रकृति, मानवता का थीम। एक वृक्ष की जीवन गाथा जो मानवीय भावनाओं से जुड़ी है। ‘परिणति’ कहानी में मां-बाप सेठ के साथ अपने इकलौते पुत्र को धन कमाने के लिए परदेश भेज देते हैं और धीरे-धीरे धन के लालच के विभत्स चक्र में फंसकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं।

कहानियों में देथा लोककथाओं को वास्तविक संदर्भ देते हैं, जैसे होमोफोबिया, असहिष्णुता और वैवाहिक बलात्कार, नारी की इच्छा और समाज की अपेक्षाओं के बीच संघर्ष आदि। देथा की रचनाएँ समाज की जटिलताओं को उजागर करती हैं। वे लोककथाओं को उनका वास्तविक रूप देते हैं, लोक-परंपराओं को राजनीतिक पटल से जोड़ते हैं। और यह महत्वपूर्ण है। विजयदान देथा का रचना शिल्प लोककथाओं की मौखिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा है। उनकी शैली सरल, बोलचाल की है, जो मारवाड़ी बोली का उपयोग करती है।

वे कहानियों को ‘चौगास’ (चौगुनी संरचना) में बुनते हैं, जो कथा को बहु-आयामी बनाती है। यह तकनीक कथा में कथा की परतें जोड़ती है, जैसे ‘चौबोली’ में। देथा की रचनाएँ व्यंग्यपूर्ण हैं, जो सामाजिक अन्याय को उजागर करती हैं। उनके पात्र बोलते जानवर या कमज़ोर मनुष्य होते हैं, जो शक्तिशालियों को हराते हैं। मूल थीम्स हैं समाजवाद, सामंतवाद-विरोध, नारीवाद। देथा नारी सशक्तिकरण पर जोर देते हैं, जहाँ स्त्रियाँ पितृसत्ता को चुनौती देती हैं। समलैंगिक संबंध का मुद्दा भी है।

उनकी कहानियाँ कल्पना से भरपूर हैं, जो आधुनिकता और नैतिकता को चुनौती देती हैं। कहीं-कहीं देथा की शैली आत्मकथात्मक हो जाती है, जहाँ पाठक को भागीदार बनाया जाता है। उनकी कथाएँ सार्वभौमिक हैं, जो क्षेत्रीयता से परे जाती हैं। देथा का शिल्प कथा तकनीकों में नवीन है। वे चरित्रों को बहु-आयामी बनाते हैं, उनकी रचनाएँ नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, झूठी धार्मिकता पर व्यंग्य हैं, कहानियाँ मृत्यु-जीवन और पारलौकिकता को पार करती हैं। उनका शिल्प पोस्टमॉडर्न नहीं है, बल्कि लोकपरंपराओं का संयोजन है। देथा की कथाएँ फोल्कटेल और शॉर्ट स्टोरी के बीच पुल हैं, जो मनोविज्ञान और आंतरिकता पर जोर देती हैं।

नाटकों के लिए देथा की कहानियों का इतना ज्यादा उपयोग हुआ, उसका कोई हिसाब ही नहीं। देथा की कहानियों पर दो दर्जन से अधिक फिल्में बनी हैं, जिनमें कुछ मुख्य फीचर फिल्में और कुछ लघु फिल्में शामिल हैं। मुख्य फीचर फिल्मों में प्रमुख हैं-‘दुविधा’ (1973, मणि कौल), ‘ चरणदास चोर’ (1975, शाम बेनेगल), ‘परिणति’ (1986, प्रकाश झा), ‘पहेली’ (2005, अमोल पालेकर), ‘द ऑनर कीपर’ (2014, पुष्पेंद्र सिंह), ‘लाजवंती’ (2014, पुष्पेंद्र सिंह), ‘कांचली लाइफ इन ए स्लॉफ’ (2020, देदिप्या जोशी), ‘लैला और सत्त गीत’ (2020, पुष्पेंद्र सिंह)।

राजस्थान में परंपरागत मौखिक रूप से चली आ रही ऐसी अनेकों लोककथाओं के वास्तविक मर्म का दर्शन विजयदान देथा ने किया, जिन्हें ढक कर रखना परंपरावादी राजनीतिक वर्चस्व के लिए जरूरी था, लेकिन देथा ने वो आवरण हटाकर सत्य को उद्घाटित कर दिया। खरी लोक स्मृति से धूल-गर्द छांटकर उनमें प्राण फूंक दिए। स्मृति को नष्ट होने या विद्रूप के लिए नहीं छोड़ दिया बल्कि स्मृति-श्रुति परंपरा से जीवित रही लोककथाओं के माध्यम से लोक-चेतना का सूर्योदय कर दिया। ऋत्विक घटक ने जो काम अपनी फिल्मों के जरिये किया, विजयदान देथा ने वही काम अपनी कलम के जरिये किया- लोक स्मृति में नूतन प्राणों का संचार, श्रुति परंपरा से जीवित रही स्मृतियों के वास्तविक भावों का अंकन।

देथा ने राजस्थानी भाषा में लेखन करने का दृढ़ संकल्प शाह गोवर्धन लाल काबरा से प्रेरित होकर लिया। देथा के अनुसार, जब उन्होंने राजस्थानी में लिखने की इच्छा व्यक्त की, तो काबरा ने प्रारंभ में कहा, “बेटा, किन्हैं पढ़ण रौ सौक? कुण पढ़ैला? बिरथा वाद मत कर।” (बेटा, किसे पढ़ने का शौक? कौन पढ़ेगा? व्यर्थ बात मत करो।) किंतु देथा के हठ पर काबरा ने सलाह दी कि जोधपुर छोड़कर अपने गांव बोरुंदा जाएं, वहां की लोककथाओं को सुनें तथा उन्हें अपनी कहानी-कला से सजाएं। काबरा ने देथा को आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया, जिससे देथा ने गांव में प्रेस स्थापित की तथा अपनी प्रमुख रचना ‘बातां री फुलवाड़ी’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस प्रकार, शाह गोवर्धन लाल काबरा ने देथा को राजस्थानी साहित्य की दिशा में प्रेरित तथा समर्थित किया, जो राजस्थानी भाषा के संरक्षण एवं प्रचार में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

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विजयदान देथा की विरासत राजस्थानी लोक साहित्य को वैश्विक बनाने में है। उनकी रचनाएँ आज भी थिएटर और सिनेमा के लिए प्रेरणा हैं। वे हाशिए के लोगों की आवाज बने। देथा का योगदान अमर है। देथा खुद अपने योगदान के बारे में बहुत विनम्र थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘मेरा राजस्थान कहानियों से भरा है, जो मैंने लिखा है वह सागर की सिर्फ एक बूंद है।‘ 87 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन रविवार 10 नवंबर, 2013 को राजस्थान के जोधपुर जिले के बोरुंदा गाँव में ही हुआ।उनका निधन राजस्थानी और वैश्विक साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति था, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी जीवंत हैं।

‘ऐसे लेखक बिरले होते हैं जो अपनी आधुनिकता/प्रगतिशीलता को सही विकल्प मानने के बावजूद उस अहंकार को जीत पाते हैं जो आधुनिकता और प्रगतिशीलता में कहीं बद्धमूल है। बिज्जी ऐसे बिरले लेखक थे। वे पूर्व-आधुनिक से उसकी वाणी नहीं छीनते, उसका ‘प्रतिनिधि’ बनने की, उसे अपने अधीन लाने की साम्राज्यवादी और इस तरह अपने को श्रेष्ठतर जताने की औपनिवेशिक कोशिश नहीं करते। बिज्जी के कथा-लोक में उनकी ‘बातां री फुलवाड़ी’ में, जो उनके लेखन का सबसे सटीक रूपक भी है और उनका मैग्नम ओपस भी, पूर्व-आधुनिक भी ‘कूल’ हैं, ‘पिछड़े’, ‘गँवार’ नहीं।‘- बिज्जी पहाड़पर तनकर खड़े देवदार सदृश्य हैं।

ओह बिज्जी! इतने तरल, इतने सरल! इतने मजबूत, इतने विशाल! हिंदी में बिज्जी पर चर्चित प्रसंशित ‘बोरुंदा डायरी, अप्रतिम बिज्जी का विदा गीत’ के रचनाकार कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने उनके निधन पर लिखा था कि ‘दो -भाषाएं मौन हो गई। मानो सूरज टूटकर धरती पर गिर पड़ा।‘ बिज्जी की रचनाओं से गुजरते हुए मन मुग्ध होने लगता है। जन्मशती वर्ष की शुरुआत में श्रद्धावनत आपको हम कृतज्ञ राजस्थानियों का धोक, प्रणाम, नमन।

केशव भट्टड़
लेखक

केशव कुमार भट्टड़, महासचिव, ‘कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद
’ कोलकाता
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