उज्जैन । राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के संचेतना समाचार पत्र संत शिरोमणि कबीर दास जी विशेषांक का लोकार्पण कर्नाटक के माननीय राज्यपाल डॉ. थावरचंद गहलोत के द्वारा संपन्न हुआ। संत कबीर दास जी ने विद्रोह एवं सामाजिक चेतना के माध्यम से देश को दिशा निर्देश दिया श्री गहलोत ने कहा कि भारत की अछोर कवि माला के अद्वितीय सन्त कवि कबीर इस संकट से भली भांति परिचित थे, इसीलिए वे व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन में सहज होने की पुकार लगाते हैं। उनका व्यक्तित्व और कर्तृत्व अत्यंत सहज है, किन्तु जब वे देखते हैं कि संसारी जीव इस मार्ग से बहुत दूर चले आए हैं, तब वे क्रांतिकारी चेतना से सम्पन्न हो आमूलचूल परिवर्तन के लिए तत्परता दिखाते हैं।

आज के असहजता से भरे विश्व में उनकी प्रासंगिकता और अधिक बढ़ती जा रही है। वे हर प्रकार के विभेद और असमानता के विरुद्ध हैं। उनका संकेत साफ है कि जब एक ही तत्त्व सब में परिव्याप्त है तो फिर परस्पर भेदभाव कैसा कथनी और करनी की एकता कबीर की शक्ति है। इसीलिए जब वे देखते हैं कि संसार में इन दोनों के बीच फाँक बनी हुई है, तब वे यह कहने को मजबूर होते हैं कि जो मनुष्य कहनी के अनुरूप आचरण नहीं करता है, वह पशुतुल्य है। जैसा कहे वैसा ही आचार रखें तो परब्रह्म का नैकट्य सहज सम्भव है।

संत कबीर ने सामाजिक जड़ता को अंतर्बाह्य क्रान्ति और विद्रोह के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया। उनका विद्रोही व्यक्तित्व तर्क और ज्ञान आधारित समाज के विस्तार के साथ आगे बढ़ते आधुनिक दौर में विशेष प्रभावित करता है। उन्होंने अपने समय में निर्भीकतापूर्वक सामाजिक परिवर्तन का जो प्रयास किया, वह तो अद्वितीय है ही, वर्तमान में और अधिक काम्य हो गया है। वर्तमान युग के तथाकथित समाज सुधारक और उपदेशक भी ऐसा साहस नहीं दिखा सकते जो कबीर ने धार्मिक उन्माद से ग्रस्त तत्कालीन युग में दिखाया था। एक सच्चे युग-पुरोधा के भांति उन्होंने परस्पर विद्वेष, अंधविश्वास, रूढ़ियों, अनीति-अनाचारों एवं जड़ता पर प्रबल प्रहार करते हुए समाज को सही दिशा दी।

प्रश्न यह है कि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावादी दुनिया में उनकी विलक्षणता और सार्वभौमिक सन्देश से हम नई पीढ़ी को किस तरह जोड़ें, जो उनके लिए जीवन की गुत्थियों को सुलझाकर सहज मार्ग सुझा सकती है। वस्तुतः वही व्यक्ति किसी भी दौर में रास्ता दिखा सकता है जो स्वयं युग प्रवाह को जानने के साथ उसे सही दिशा में मोड़ने का साहस करता है। कबीर ऐसे ही रचनाकार थे, अपने युग के प्रति पूर्ण जागरूक और उसके प्रतिपक्ष को रचने के लिए तत्पर। कबीर जैसा निर्भय व्यक्तित्व पूरी परंपरा में दूसरा दिखाई नहीं देता है। वे तो घर फूंककर तमाशा देखने वालों में थे।

उपर्युक्त सारगर्भित उद्बोधन कर्नाटक राज्य के महामहिम राज्यपाल थावरचन्द गेहलोत ने राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के संत श्री कबीरदास जी विशेषांक संचेतना समाचार पत्र के लोकार्पण के अवसर पर आपके निवास भवन में आयोजित समारोह में व्यक्त किए । संचेतना समाचार के संपादक डॉ. प्रभु चौधरी ने संस्था के बारे में बताया इस अवसर पर पूर्व विधायक नागदा लालसिंह राणावत, आलोट के जितेन्द्र गेहलोत आगर मालवा के लाल जी मालवीय सुसनेर के मुरलीधर पाटीदार वरिष्ठ अभिभाषक खाचरौद विजय सेठी, बड़नगर के संतोष पाटीदार, सोयलकला के दुर्गालाल शर्मा पत्रकार एवं दिलीप कारपेन्टर आदि की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।

संचेतना समाचार का विमोचन श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति इन्दौर में समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. विकास दवे, प्रधान संपादक हरेराम वाजपेयी, संपादक डॉ. प्रभु चौधरी, विश्व कवि सत्यनारायण सत्तन, मणिमाला शर्मा, निरूपमा त्रिवेदी, संतोष मोहन्ती, डॉ. ज्योती जैन, डॉ. जी.डी. अग्रवाल आदि के द्वारा किया गया। उज्जैन में संचेतना समाचार का विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अखिलेश पाण्डेय, कलॉ संकाय अध्यक्ष एवं कुलानुशासक डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के अध्यक्ष बृजकिशोर शर्मा, डॉ. अम्बेडकर पीठ के अध्यक्ष डॉ. सत्येन्द्रकुमार शर्मा एवं संपादक, महासचिव डॉ. प्रभु चौधरी आदि की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

Shrestha Sharad Samman Awards

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

15 + 5 =