Culture dance

‘देवता बनाम विकास’ : दार्जिलिंग के पहाड़ों में जंगल, सड़क और लोक-विश्वासों का संघर्ष

कोलकाता हिंदी न्यूज़ | स्पेशल रिपोर्ट :  दार्जिलिंग की हरी-भरी पहाड़ियों में एक अनोखा संघर्ष चलता रहा है – ‘देवता बनाम विकास’। जहां, सड़क विस्तार, टूरिज्म प्रोजेक्ट्स और हाइड्रो-पावर प्लांट्स के खिलाफ स्थानीय समुदाय लोक-देवताओं और प्रकृति पूजा की कथाओं को हथियार बनाते रहे हैं।

लेप्चा और गोरखा समुदायों के विश्वास में जंगल, नदियां और पहाड़ जीवंत देवता हैं, जिन्हें छेड़ने से ‘नाराजगी’ और प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। यह विरोध सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक भी है।

लेप्चा विश्वास: मायेल ल्यांग की रक्षा

लेप्चा समुदाय, जो दार्जिलिंग-कलिम्पोंग और सिक्किम के मूल निवासी हैं, अपनी पवित्र भूमि ‘मायेल ल्यांग’ (छिपा हुआ स्वर्ग) को बचाने के लिए सबसे आगे हैं। लेप्चा मानते हैं कि कंचनजंगा और तीस्ता नदी उनके देवता हैं।

2000 के दशक में तीस्ता पर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स (जैसे तीस्ता स्टेज III और IV) के खिलाफ लेप्चा युवाओं ने ‘एफेक्टेड सिटिजंस ऑफ तीस्ता’ (ACT) आंदोलन चलाया। वे कहते थे, “डैम बनने से देवता नाराज होंगे, लेप्चा संस्कृति खत्म हो जाएगी।”

Vaishnavi Varadarajan Mayal Lyang Lepcha Protest against Teesta Stage IV hydropower project
Lepcha protest against Teesta hydro project – sacred land protection.

Dzongu (सिक्किम) में लेप्चा रिजर्व एरिया को पवित्र मानकर डैम का विरोध हुआ। लेप्चा रिचुअल्स में प्रकृति पूजा केंद्रीय है – पवित्र जंगल (देवीथान) में प्रवेश वर्जित है। विरोध में लेप्चा युवाओं ने अनशन किया, और कई प्रोजेक्ट्स रुके या कैंसल हुए।

कलिम्पोंग से ऊपर की ओर जाती संकरी पहाड़ी सड़क पर एक छोटा-सा पत्थर रखा है। उस पर लाल धागा बँधा है, कुछ फूल रखे हैं और पास ही धूप की जली हुई तीखी गंध है। यह कोई मंदिर नहीं है। लेकिन इस पत्थर के बिना यहाँ सड़क नहीं कटती।

पास खड़े स्थानीय युवक ने कहा— “पहले देवता को बताते हैं, फिर मशीन आती है।”

दार्जिलिंग–कलिम्पोंग के पहाड़ों में विकास की भाषा यही है। यहाँ सड़क, बाँध और टूरिज़्म प्रोजेक्ट सिर्फ़ तकनीकी फ़ैसले नहीं— आस्था, डर और अनुभव से जुड़ी कहानी हैं।

गोरखा समुदाय और प्रकृति पूजा

गोरखा (नेपाली भाषी) समुदाय में भी देवीथान और लोक देवताओं की पूजा आम है। सड़क विस्तार और हाई-राइज बिल्डिंग्स के खिलाफ वे कहते हैं, “पहाड़ देवता हैं, उन्हें काटने से भूस्खलन और आपदाएं आएंगी।”

हाल के वर्षों में टाइगर हिल (सेनचल वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी) पर अनियोजित निर्माण और रोड वाइडनिंग के खिलाफ विरोध हुआ। NGT ने नोटिस जारी किए।

2025 में जोशीमठ जैसी आपदाओं का हवाला देकर स्थानीय लोग कहते हैं, “दार्जिलिंग अगला जोशीमठ न बने।” गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और अन्य ग्रुप्स पर्यावरण को राजनीतिक मुद्दा बनाते हैं।

Caet a 1793295 f0001 oc
Protectors of the land and water: citizenship, territory and vulnerability among the Lepcha in Sikkim and West Benga

इस इलाके में रहने वाले लेप्चा और गोरखा समुदायों के लिए पहाड़ प्राकृतिक संसाधन नहीं, जीवित सत्ता हैं।

पिछले 15–20 सालों में, जब भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट आया— हाइड्रोपावर, चौड़ी सड़क, नया रिसॉर्ट— तो किसी न किसी मोड़ पर यह वाक्य सुनाई दिया: “देवता मान्दैनन्।” सरकारी काग़ज़ों में इसे अंधविश्वास कहा जाता है। लेकिन ज़मीन पर यह वाक्य—

  • काम रोक देता है
  • लोगों को एकजुट करता है
  • विरोध को वैध बना देता है

दार्जिलिंग ज़िले में काम कर चुके एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (नाम न छापने की शर्त पर) कहते हैं— “आप कोर्ट का आदेश ला सकते हैं, लेकिन जब पूरा गाँव कह दे कि देवता नाराज़ हैं, तो मशीन चलाना आसान नहीं होता।”

'Gods versus Development'

राजनीतिक उपयोग और NGO का रोल

‘देवता नाराज हैं’ की कथा का राजनीतिक इस्तेमाल होता है। Gorkhaland आंदोलन में पर्यावरण को हथियार बनाया जाता है – “विकास बंगाल सरकार की साजिश है, पहाड़ों को खत्म करने की।”

NGO जैसे Affected Citizens of Teesta (ACT) लेप्चा संस्कृति को बचाने का दावा करते हैं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि वे विरोध को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।

राजनीतिक इकोलॉजी के नजरिए से यह संघर्ष विकास vs संरक्षण का नहीं, बल्कि स्थानीय पहचान vs राज्य नियंत्रण का है। लेप्चा अपनी ऑटोक्थोनस (मूल निवासी) पहचान बचाते हैं, गोरखा अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता।

लेप्चा समुदाय और तीस्ता

तीस्ता नदी पर प्रस्तावित और बने हाइड्रो-प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ लेप्चा विरोध सिर्फ़ पर्यावरणीय नहीं था— वह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक था। लेप्चा समुदाय तीस्ता को पवित्र धारा मानता है। उनके लिए बाँध का मतलब पानी का रुकना नहीं, जीवन-चक्र का टूटना है।

Protest in hills against development threatening sacred sites.
Protest in hills against development threatening sacred sites.

यही वजह है कि विरोध के दौरान— उपवास हुए, नदी किनारे पूजा हुई और ‘विकास विरोधी’ पोस्टरों से ज़्यादा अनुष्ठान दिखे।

तीस्ता घाटी के पास रहने वाले लेप्चा बुज़ुर्ग ताशी लेप्चा बताते हैं— नदी को हम रास्ता नहीं मानते, वह हमारे पूर्वजों की साँस है। जब उस पर बाँध बनता है, तो हमें लगता है जैसे शरीर पर पत्थर रख दिया गया हो।”

पर्यावरणीय वास्तविकता

दार्जिलिंग में अनियोजित सड़कें, हाई-राइज और टूरिज्म से भूस्खलन बढ़े हैं। सेनचल सैंक्चुअरी (दार्जिलिंग का पानी का स्रोत) खतरे में है। लेप्चा और गोरखा विश्वास सांस्कृतिक औजार बनकर पर्यावरण संरक्षण कर रहे हैं – पवित्र जंगल कटने से बच रहे हैं।

चुनौती: संतुलित विकास

दार्जिलिंग में टूरिज्म और सड़कें जरूरी हैं, लेकिन अनियोजित विकास से भूस्खलन और जल स्रोत खतरे में हैं। लोक-विश्वास सांस्कृतिक औजार बनकर जंगलों की रक्षा कर रहे हैं। क्या लोक-आस्था और आधुनिक विकास साथ चल सकते हैं? यह सवाल दार्जिलिंग की पहाड़ियां पूछ रही हैं। इस संघर्ष पर आपकी राय क्या है? कमेंट में बताएं – विकास या संरक्षण पहले?

'Gods versus Development'
Local ritual in Darjeeling sacred forest.

(स्रोत: Teesta River Protests documentation; Lepcha community statements; academic papers on Sacred Landscapes)

आपकी राय!

बताइए, इस खबर का कौन‑सा पहलू आपको सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।?
इस स्टोरी को आप कैसे देखते हैं—अपनी राय  जरूर 👇 कमेंट करें!

✍️ लेखक: विनय कुमार | 📅 18 दिसंबर 2025 | 📍 कोलकाता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

19 − nineteen =