बाल मुख में जग समाहित,
छवि जसोमति मति हरै।
तेज पुञ्ज प्रचण्ड मन के,
भाव विस्मृत सब करै।।
कोटिशः आकाशगंगा
चन्द्र तारक को गनै।
दृग अचम्भित, दृष्टि अपलक,
रूप बरनत नहिं बनै।।
ले बलैया मातु कबहुँक,
सीस चरननि पर धरै।
भाव विह्वल रोम पुलकित,
नैन सो निर्झर झरै।

“सिंह” आनन्दित मुदित मन,
गात डगमग डग भरै।
रुद्ध रसना छवि अलौकिक,
काहु विधि वर्णन करै।।
जय श्री कृष्ण
सपरिवार आपको
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई!!
डी.पी. सिंह

कवि
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