।।नवरात्र की साधना।।
अशोक वर्मा “हमदर्द”
रात के अंधकार में
दीये की लौ जैसी
तेरी ज्योति उतरती है,
और मन के भीतर छिपे
सभी भय
एक-एक कर विलीन हो जाते हैं।
हे माँ,
तेरे नौ रूपों की यात्रा
नवरात्रि के नौ दिन नहीं,
बल्कि साधक के जीवन का मार्ग है।
शैलपुत्री
धरती की दृढ़ता,
जिसके चरणों में पहला प्रणाम
जड़ को जगाता है।
ब्रह्मचारिणी
संयम की अग्नि,
जहाँ हर तपस्या
अनंत शक्ति में बदल जाती है।
चंद्रघंटा
शांति का वह नाद
जो भीतर के तूफ़ानों को थाम लेता है।
कूष्माण्डा
सृष्टि की पहली किरण,
जो अंधकार से बाहर
प्रकाश का द्वार खोल देती है।
स्कन्दमाता
ममता का विस्तृत आकाश,
जहाँ करुणा ही शस्त्र बन जाती है।
कात्यायनी
अन्याय पर प्रहार की ज्वाला,
जिसमें हर स्त्री
अपना स्वर पहचान लेती है।
कालरात्रि
भय का अंत,
जहाँ मृत्यु भी
तेरे चरणों में आश्रय पाती है।
महागौरी
निर्मलता का आलोक,
जिसमें तप और त्याग
फूल की तरह खिल उठते हैं।
सिद्धिदात्री
पूर्णता का वह क्षण
जब साधक
स्वयं को तुझमें
और तुझको स्वयं में पा लेता है।
हे माँ,
तेरे बिना यह साधना अधूरी है,
तेरे बिना शक्ति का कोई अर्थ नहीं।
तू केवल मंदिरों की मूर्ति नहीं,
तू तो उस हर क्षण में है
जब कोई स्त्री
अपनी अस्मिता के लिए खड़ी होती है,
जब कोई पुरुष
सत्य की राह चुनता है,
जब कोई बालक
प्रेम और करुणा से
दुनिया को नया आकार देता है।
नवरात्रि का व्रत
केवल उपवास नहीं,
यह आत्मा की परीक्षा है,
जहाँ हम भीतर के असुरों को
एक-एक कर हराते हैं,
और अंततः
तेरी गोद में शरण पाते हैं।
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