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COP30 रिपोर्ट: अवास्तविक योजनाओं से नहीं बचेगा जलवायु संकट

Climate कहानी, कोलकाता | 18 नवंबर 2025 : COP30 जलवायु सम्मेलन में पेश की गई नई रिपोर्ट ने दुनिया के सामने एक सख्त चेतावनी रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई देशों के जलवायु वादे ज़मीन पर टिके नहीं हैं

वे उत्सर्जन घटाने के लिए फॉसिल फ्यूल्स को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने और मौजूदा जंगलों की रक्षा करने की बजाय अवास्तविक भूमि-आधारित कार्बन रिमूवल योजनाओं पर निर्भर हैं।

📊 रिपोर्ट की मुख्य बातें

  • Land Gap 2025 रिपोर्ट (यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न और वैश्विक विशेषज्ञों द्वारा) ने बताया कि देश बड़े पैमाने पर ट्री-प्लांटेशन और भूमि-आधारित योजनाओं पर भरोसा कर रहे हैं।
  • मौजूदा जंगलों की रक्षा और वनों की कटाई रोकने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।
  • इससे नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को हासिल करना और कठिन हो जाएगा।
  • रिपोर्ट ने चेताया कि यह रणनीति प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकती है और स्थानीय समुदायों को नुकसान पहुँचा सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक़मौजूदा जलवायु प्लान्स को अगर सच में लागू करना है तो दुनियाभर को अरब हेक्टेयर ज़मीन यानी ऑस्ट्रेलिया से बड़ी ज़मीन चाहिए होगी. मगर इतनी ज़मीन कहाँ से आएगी?

इस सवाल का जवाब रिपोर्ट साफ़ देती हैयह ज़मीन सबसे पहले आदिवासियोंछोटे किसानों और स्थानीय समुदायों की रोज़ी पर चोट करेगी.

🗣️ स्पीकरों के उद्धरण

  • ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने कहा: “यह समय आधे-अधूरे उपायों का नहीं है। हमें 1.5°C लक्ष्य को बचाने के लिए तेज़ कार्रवाई करनी होगी।”
  • UN क्लाइमेट चीफ़ साइमन स्टील ने कहा: “वादों पर बहस छोड़कर अब उन्हें ज़मीन पर उतारने का समय है।”

रिपोर्ट दो बड़ी कमियों की बात करती है: एक “लैंड गैप” और दूसरी “फॉरेस्ट गैप”. पहली कमी ये कि देश ज़मीन के ज़रिए जितना कार्बन सोखने की योजना बना रहे हैंवो हक़ीक़त में संभव नहीं है. दूसरी कमी ये कि जो वादे COP28 दुबई में जंगल बचाने के लिए किए गए थेवे अब योजनाओं से गायब हैं.

अगर मौजूदा pledges ऐसे ही रहे तो 2030 तक हर साल मिलियन हेक्टेयर जंगल खत्म होंगेऔर 16 मिलियन हेक्टेयर की ज़मीन बर्बाद होगीयानि कुल 20 मिलियन हेक्टेयर का “फॉरेस्ट गैप”.

🇮🇳 भारत का रुख

  • भारत ने घोषणा की है कि वह अपना 2035 का नया NDC (Nationally Determined Contribution) दिसंबर तक पेश करेगा।
  • पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत ने पहले ही अपने कई लक्ष्यों को समय से पहले हासिल कर लिया है और अब सौर ऊर्जा व बायोफ्यूल एलायंस जैसे कदमों से वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दे रहा है।

कैमरून इसका जिंदा उदाहरण है. IMF के दबाव में वहाँ लकड़ीकोको और कपास उत्पादन बढ़ाने की शर्तों ने बीस साल में बड़े पैमाने पर जंगल खत्म कर दिए. रिपोर्ट कहती है कि अगर debt-relief reforms तेज़ी से लाए जाएँ तो देश अपने जंगलों को सांस लेने का मौक़ा दे सकते हैं.

⚖️ वैश्विक महत्व

  • रिपोर्ट ने साफ किया कि फॉसिल फ्यूल्स का चरणबद्ध अंत और मौजूदा जंगलों की रक्षा ही असली समाधान हैं।
  • केवल ट्री-प्लांटेशन योजनाओं पर भरोसा करना जलवायु संकट को और गहरा कर सकता है।
  • COP30 ने यह संदेश दिया कि अब वादों को ज़मीन पर उतारना ही असली परीक्षा है

व्यापार नियमों पर भी रिपोर्ट कड़ी हैकहती है कि मौजूदा ट्रेड पॉलिसीज़ सिर्फ़ अवैध लकड़ी रोकने तक सीमित हैंजबकि असली समस्या तो वही “कानूनी” खेती और खनन है जो जंगल निगल रही है.

रिपोर्ट का सुझाव है कि ट्रेड पॉलिसीज़ को कॉमोडिटी ट्रेडर्स से हटाकर छोटे किसानों और सतत खाद्य प्रणालियों की तरफ़ मोड़ना होगा.

क्लाइमेट कहानी का सार

COP30 की चर्चाओं के बीच Land Gap Report 2025 एक आईना है, जो दिखाती है कि जलवायु वादे सिर्फ़ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रह सकते.
कर्ज़ के बोझ तले दबे देशों को विकास और जंगलों के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए.

असल में, विकास और पर्यावरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और जब तक दुनिया इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करती, तब तक कोई भी COP हमें उस भविष्य तक नहीं ले जा पाएगी, जहाँ धरती सांस ले सके.

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