लौट आया मेरा बचपन
अब इस बुढ़ापे में
खेल रहा हूँ बच्चों संग
अब इस बुढ़ापे में
वही खिलखिलाना
वही इतराना इठलाना
मिट्टी में लोटना
फिर डाँट सुनना
अच्छा लगता हैं
अब इस बुढ़ापे में।।
मेरे दोस्त मेरे बच्चें
लड़ना झगड़ना
फिर मुँह फुलाना
फिर मान जाना
अच्छा लगता है
अब इस बुढ़ापे में।।
मेरे बच्चे अंगुली थामे
शहर गली घुमाते
नवयुग राह दिखाते
याद आता अपना बचपन
सफर सुहाने वही दिन
अच्छा लगता हैं
अब इस बुढ़ापे में।।
काँपते हाथो में डंडे
मोटे ऐनक कानों बँधे
लड़ाखड़ाना संभलना
बच्चों का चिढ़ाना
फिर ठहाके लगाना
अच्छा लगता हैं
अब इस बुढ़ापे में।।
मेरे बच्चों ने लौटाया
मेरे सुनहरे बचपन
लौट आया मेरा बचपन
अब इस बुढ़ापे में।।

सुधीर सिंह, कवि

सुधीर सिंह, आसनसोल

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