निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: जंगल हमेशा से बदलते रहे हैं, और मौसम का मिजाज भी कभी स्थिर नहीं रहा। लेकिन आज जिस बदलाव का सामना हमारी पृथ्वी कर रही है, वह चिंताजनक है। अब खतरा केवल तापमान के धीरे-धीरे बढ़ने का नहीं है, बल्कि ‘झटकों की एक न खत्म होने वाली श्रृंखला’ का है।
जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (PIK) के नेतृत्व में 18 वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा जर्नल Nature Ecology & Evolution में प्रकाशित नई स्टडी ने दुनिया को आगाह किया है कि अगर हमने उत्सर्जन (Emission) पर लगाम नहीं लगाई, तो 2085 तक दुनिया के 36 प्रतिशत स्थलीय जानवरों के आवास एक साथ कई चरम जलवायु घटनाओं (जैसे हीटवेव, आग, सूखा और बाढ़) की चपेट में होंगे।
सिर्फ तापमान नहीं है असली दुश्मन
स्टडी की लीड लेखिका स्टेफनी हाइनिके का कहना है कि हम जलवायु परिवर्तन को अभी भी कम करके आंक रहे हैं। उनके अनुसार, यह अब तापमान की क्रमिक वृद्धि की कहानी नहीं रह गई है।
समस्या यह है कि एक घटना के बाद दूसरी का आना पारिस्थितिकी तंत्र के उबरने की क्षमता को खत्म कर देता है। मान लीजिए, पहले किसी इलाके में गहरा सूखा पड़ा, जिससे मिट्टी सूख गई।
इसके तुरंत बाद अगर जंगल में आग लग गई, तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। फिर अगर अचानक बाढ़ आ जाए, तो उस पूरे इलाके की जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। प्रकृति के पास इन झटकों के बीच स्वयं को ठीक करने का समय ही नहीं बच रहा है।
2019-20 का ऑस्ट्रेलिया संकट एक चेतावनी
शोधकर्ता इस विनाशकारी पैटर्न का उदाहरण ऑस्ट्रेलिया की 2019-20 की आग के रूप में देते हैं। जिन इलाकों में आग से पहले सूखा पड़ा था, वहां पौधों और जानवरों की संख्या में 27 से 40 प्रतिशत तक अधिक गिरावट देखी गई।
यह इस बात का प्रमाण है कि ‘संयुक्त आपदाएं’ (Compound Events) जीवों के लिए घातक सिद्ध होती हैं।
शोध के मुख्य बिंदु:
- 2050 तक का खतरा: एमिशन इसी रफ्तार से जारी रहा, तो 74% जानवरों के आवास हीटवेव, 16% जंगल की आग, 8% सूखे और 3% बाढ़ के खतरे में होंगे।
- प्रमुख प्रभावित क्षेत्र: अमेजन बेसिन, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे जैव विविधता वाले क्षेत्र इस खतरे के केंद्र में हैं।
- ब्लाइंड स्पॉट: स्टडी की सह-लेखिका कात्या फ्रिलर मानती हैं कि जंगल की आग के जोखिम को अब तक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ माना गया था, जिसे गंभीरता से नहीं लिया गया, जबकि यह सबसे खतरनाक साबित हो सकता है।
क्या अभी भी उम्मीद बाकी है?
स्टडी एक बहुत ही सकारात्मक दिशा भी दिखाती है। अगर दुनिया तेजी से एमिशन घटाती है और तापमान वृद्धि को सदी के मध्य तक नियंत्रित कर लेती है, तो 2085 तक ऐसे जोखिम वाले आवासों की संख्या 36 प्रतिशत से घटकर केवल 9 प्रतिशत रह सकती है।
स्टेफनी हाइनिके के अनुसार, “अभी भी हमारे पास फर्क लाने का मौका है। यदि हम आज से ही उत्सर्जन कम करना शुरू कर दें, तो बड़ी आपदाओं को टाला जा सकता है।”
संरक्षण की पुरानी रणनीतियां हुई पुरानी
यह शोध एक कड़वा सच सामने लाता है: अब तक वन्यजीव संरक्षण की नीतियां इस विचार पर बनी थीं कि जलवायु धीरे-धीरे बदलेगी और प्रजातियां उसके अनुकूल ढल जाएंगी। लेकिन जब बदलाव ‘झटकों’ के रूप में आता है, तो ‘अनुकूलन’ (Adaptation) की कोई गुंजाइश नहीं बचती।
अब समय आ गया है कि संरक्षण की रणनीतियों को बदला जाए। यह केवल जानवरों के घर की कहानी नहीं है, बल्कि उस संतुलन की सुरक्षा का सवाल है जिस पर मानव सभ्यता का भविष्य भी टिका है।
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