'Ship of the desert' battling scorching heat

भीषण गर्मी से जूझ रहा रेगिस्तान का जहाज़, अफ्रीका में ऊंटों पर बढ़ा जलवायु संकट का असर

निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: जिस जानवर को सदियों से रेगिस्तान में जीने का प्रतीक माना जाता रहा, अब वही बढ़ती गर्मी के आगे संघर्ष करता दिखाई दे रहा है। अफ्रीका के कुछ हिस्सों से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक Horn of Africa और North Africa में पड़ रही भीषण गर्मी, लंबे सूखे, पानी की कमी और सूखते चरागाहों का असर अब ऊंटों पर भी साफ़ दिखाई देने लगा है।

वैज्ञानिकों और पशुपालकों का कहना है कि कई इलाकों में ऊंटों की मौतें बढ़ रही हैं और उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ रहा है।

यह सिर्फ़ एक पशु की कहानी नहीं है। यह उस बदलती जलवायु की कहानी भी है, जिसमें अब वे जीव भी प्रभावित होने लगे हैं जिन्हें कभी सबसे अधिक गर्मी सहने वाला माना जाता था। रिपोर्टों के मुताबिक अफ्रीका और सहारा के कुछ हिस्सों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच रहा है।

Impact of climate crisis on camels in Africa intensifies.


ऊंटों पर गर्मी का असर

विशेषज्ञों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार ऊंट आमतौर पर करीब 40 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी सहने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन जब कई दिनों तक तापमान 41 से 45 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बना रहता है, तो उनके शरीर पर गंभीर शारीरिक दबाव पड़ सकता है।

इथियोपिया के अफार क्षेत्र के एक पशुपालक, जिसके पास करीब 500 ऊंट हैं, ने बताया कि उसने सिर्फ़ एक महीने में आठ ऊंट के बच्चों को खो दिया। उनका मानना है कि इसकी बड़ी वजह लगातार पड़ रही भीषण गर्मी रही।

पशुपालकों का कहना है कि ऊंटों के पैरों में तपती रेत से छाले पड़ रहे हैं। उनकी आंखों से लगातार पानी निकल रहा है। त्वचा झुलस रही है और कई जानवरों के बाल झड़ने लगे हैं। कई ऊंट पहले की तरह लंबी दूरी तय नहीं कर पा रहे।

यह भी पढ़ें:  बढ़ती गर्मी छीन रही फुटबॉल की रफ्तार: 2026 World Cup पर मंडरा रहा 'क्लाइमेट चेंज' का साया

Heat wave


क्षेत्रीय आंकड़े और संकट

समस्या सिर्फ़ इथियोपिया तक सीमित नहीं है। जून में प्रकाशित एक शोध के अनुसार सोमालिया में करीब 46 प्रतिशत ऊंट पालने वाले परिवारों ने सूखे से जुड़ी ऊंटों की मौत का सामना किया। वहीं सूल (Sool) क्षेत्र में यह आंकड़ा करीब 73 प्रतिशत परिवारों तक पहुंच गया।

उधर केन्या के मार्साबिट काउंटी में पशु चिकित्सा अधिकारियों ने पिछले दो वर्षों में ऊंटों की मौत में 15 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या सिर्फ़ बढ़ते तापमान की नहीं है।

जब भीषण गर्मी, लंबे समय तक पड़ा सूखा, पानी की कमी, घटती वनस्पति और छाया का अभाव एक साथ सामने आते हैं, तो ऊंटों पर गर्मी का दबाव कई गुना बढ़ जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में ऊंटों में निर्जलीकरण, थकान, संक्रमण, दूध उत्पादन में कमी, प्रजनन संबंधी समस्याएं, गुर्दों से जुड़ी दिक्कतें और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

Impact of climate crisis on camels in Africa intensifies.2


आजीविका पर असर

इसका असर सिर्फ़ जानवरों तक सीमित नहीं रहता। Horn of Africa और North Africa के कई पशुपालक समुदायों के लिए ऊंट दूध, परिवहन और आय का प्रमुख स्रोत हैं। इसलिए जब ऊंट मरते हैं, तो परिवारों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित होती हैं।

यह भी पढ़ें:  क्यों हो रही है मुंबई में इतनी बारिश? सिर्फ़ अल नीनो नहीं, जलवायु परिवर्तन भी बड़ी वजह

हालात इतने मुश्किल हो चुके हैं कि कई पशुपालक अपने झुंड लेकर पानी और चरागाह की तलाश में दूसरे इलाकों की ओर जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक सोमालिया के कुछ हिस्सों में पानी की कीमत 2,000 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है, जिससे यह संकट और गहरा गया है।


जलवायु परिवर्तन का व्यापक प्रभाव

वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तर अफ्रीका दुनिया के सबसे तेज़ी से गर्म हो रहे क्षेत्रों में शामिल है। 1991 से 2025 के बीच यहां तापमान औसतन 0.43 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ा है। यही वह क्षेत्र है जहां दुनिया के करीब 80 प्रतिशत एक-कूबड़ वाले ड्रोमेडरी ऊंट पाए जाते हैं।

Impact of climate crisis on camels in Africa intensifies.1


निष्कर्ष: यह कहानी एक बड़ा सवाल भी छोड़ जाती है। अगर रेगिस्तान में जीने के लिए सबसे उपयुक्त माने जाने वाले जीव भी बढ़ती गर्मी के असर से जूझ रहे हैं, तो बदलती जलवायु का प्रभाव आखिर कितना व्यापक होता जा रहा है?

यह सिर्फ़ वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि उन समुदायों की भी चुनौती है जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी ऊंटों पर निर्भर करती है।

ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।

Nishant Avatar
यह भी पढ़ें:  अरावली मामला: सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनेगी कमेटी, अवैध खनन पर राज्य सरकार को सख्त निर्देश

“निशांत जी जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर रिपोर्टिंग करते हैं। देश दुनिया में पर्यावरणीय मुद्दों, प्रदूषण, वन संरक्षण और जलवायु प्रभाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग में विशेष रुचि रखते हैं।”

Fact Checked & Editorial Guidelines

Our Fact Checking Process

We prioritize accuracy and integrity in our content. Here's how we maintain high standards:

  1. Expert Review: All articles are reviewed by subject matter experts.
  2. Source Validation: Information is backed by credible, up-to-date sources.
  3. Transparency: We clearly cite references and disclose potential conflicts.
Reviewed by: Subject Matter Experts

Our Review Board

Our content is carefully reviewed by experienced professionals to ensure accuracy and relevance.

  • Qualified Experts: Each article is assessed by specialists with field-specific knowledge.
  • Up-to-date Insights: We incorporate the latest research, trends, and standards.
  • Commitment to Quality: Reviewers ensure clarity, correctness, and completeness.

Look for the expert-reviewed label to read content you can trust.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

2 × five =