निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: गर्मी सबके लिए एक जैसी नहीं होती। बच्चों के लिए खतरा और बड़ा है। Vrije Universiteit Brussel (VUB) के नेतृत्व में हुई नई रिसर्च के मुताबिक, दुनिया में 56 करोड़ तक बच्चे (0 से 9 साल की उम्र के करीब 43 प्रतिशत) हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने ऐसी नम गर्मी यानी ह्यूमिड हीट का सामना कर रहे हैं, जो मानवजनित जलवायु परिवर्तन की वजह से पैदा हुई है।
यह असर किसी भी दूसरे आयु वर्ग की तुलना में बच्चों पर ज्यादा है।
रिसर्च की मुख्य बातें
स्टडी 26 अगस्त को Science Advances में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं ने पहली बार वैश्विक स्तर पर मापा है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अतिरिक्त गर्मी अलग-अलग आयु वर्गों को कैसे प्रभावित कर रही है।
यहां हीट स्ट्रेस सिर्फ थर्मामीटर का तापमान नहीं है। स्टडी ने ह्यूमिड हीट पर ध्यान दिया है—ऐसी गर्मी जिसमें नमी ज्यादा होने से शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। छाया में 28°C से ऊपर वेट-बल्ब ग्लोब तापमान को हीट स्ट्रेस माना गया है।
आज की दुनिया में करीब 35 करोड़ बच्चे (लगभग 27 प्रतिशत) हर साल कम से कम पांच महीने की कुल हीट स्ट्रेस स्थितियों के संपर्क में आते हैं। जलवायु परिवर्तन के बिना यह संख्या करीब 12 करोड़ (9 प्रतिशत) होती। यानी जोखिम लगभग तीन गुना बढ़ गया है।
सबसे प्रभावित क्षेत्र
दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी अफ्रीका वे क्षेत्र हैं जहां सबसे ज्यादा बच्चे खतरनाक ह्यूमिड हीट के संपर्क में हैं। इन क्षेत्रों में गर्म-नम परिस्थितियां और बच्चों की बड़ी आबादी दोनों मौजूद हैं।
VUB की प्रमुख लेखिका रोजा पिएत्रोइउस्ती के मुताबिक, विकासशील देशों के बच्चे जलवायु चरम घटनाओं के ज्यादा संपर्क में हैं, जबकि उनके ऐतिहासिक उत्सर्जन सबसे कम रहे हैं।
बच्चों का शरीर क्यों ज्यादा संवेदनशील?
बच्चों का शरीर वयस्कों की तुलना में तेजी से गर्म होता है और पसीने के जरिए ठंडा करने में कम प्रभावी होता है। छोटे बच्चे वयस्कों की देखभाल पर निर्भर रहते हैं। ज्यादा गर्मी से डिहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक और लंबे समय में सीखने-संज्ञानात्मक विकास पर असर पड़ सकता है।
भविष्य के अनुमान
- 1.5°C वार्मिंग पर: करीब 62 करोड़ बच्चे (49 प्रतिशत) अतिरिक्त हीट स्ट्रेस झेल सकते हैं।
- 2°C पर: करीब 65 करोड़ बच्चे (59 प्रतिशत) प्रभावित हो सकते हैं।
VUB के प्रोफेसर विम थियरी का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए फॉसिल फ्यूल उत्सर्जन में तेजी से कटौती, पेरिस समझौते के लक्ष्य और विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त व हीट एक्शन प्लान जरूरी हैं।
निष्कर्ष:
जलवायु परिवर्तन का असर बच्चों के शरीर पर आज दर्ज हो रहा है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि दुनिया कितनी गर्म हो रही है, बल्कि यह भी कि बच्चे कितने दिन सुरक्षित बचपन जी पाएंगे।
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