Green Transition

चीन का नया 5-वर्षीय प्लान: ग्रीन ट्रांजिशन तेज, लेकिन कोयला अभी नहीं जाएगा

निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: बीजिंग में हर साल होने वाली National People’s Congress (NPC) की बैठक दुनिया की ऊर्जा और क्लाइमेट राजनीति का रुख तय करती है। यहीं से निकलता है चीन का पाँच साल का रोडमैप।

इस बार जो दस्तावेज़ सामने आया है, वह एक दिलचस्प कहानी कहता है – एक तरफ साफ ऊर्जा का तेज़ विस्तार, दूसरी तरफ कोयले के लिए खुला दरवाज़ा।

दुनिया की “ग्रीन फैक्ट्री” बनने की रणनीति

पिछले दस सालों में चीन ने साफ ऊर्जा की इंडस्ट्री को औद्योगिक पैमाने पर बदल दिया है। सोलर पैनल से लेकर बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों तक, दुनिया की सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा अब चीन में बनता है।

ODI Global की रिसर्चर रेबेका नाडिन के शब्दों में, चीन इस योजना के जरिए खुद को “दुनिया की clean-tech workshop” के रूप में और मजबूत कर रहा है।

Green Transition Information Factory pillars

उनके अनुसार, “सोलर, बैटरियों, ग्रिड उपकरण और स्मार्ट ईवी टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों को ‘नई गुणवत्ता वाली उत्पादक शक्तियाँ’ कहा गया है। चीन पहले ही वैश्विक सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखता है।”

मुख्य बातें – एक नजर में:

  • 15वाँ Five-Year Plan (2026–2030): साफ ऊर्जा पर जोर, कोयला बफर
  • कार्बन इंटेंसिटी लक्ष्य: 2030 तक 17% कमी (पिछली योजना से थोड़ा कम)
  • गैर-जीवाश्म ऊर्जा: अगले 10 साल में दोगुना करने का लक्ष्य
  • ग्रीन हाइड्रोजन, अमोनिया, मेथनॉल, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल पर फोकस
  • उत्सर्जन: 2025 में हल्की गिरावट, 2030 तक चरम पर पहुंचने का लक्ष्य

क्लाइमेट टारगेट थोड़ा धीमा, लेकिन दिशा वही

नए प्लान में एक अहम लक्ष्य रखा गया है – 2030 तक कार्बन इंटेंसिटी (GDP की प्रति यूनिट पर उत्सर्जन) को 17 प्रतिशत कम करना। यह पिछली योजना के 18 प्रतिशत लक्ष्य से थोड़ा कम है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह महत्वाकांक्षा विज्ञान की अपेक्षा से कम है। लेकिन ऊर्जा विश्लेषक मुयी यांग कहते हैं कि असली चुनौती अब शुरू हो रही है।

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Chinas accelerating green transition

उनके अनुसार, “डिकार्बोनाइजेशन अब आसान चरण से आगे निकल चुका है। अब कठिन सेक्टर सामने हैं – भारी उद्योग, बिजली ग्रिड में बड़ी मात्रा में नवीकरणीय ऊर्जा को समायोजित करना, और एक लचीली बिजली प्रणाली बनाना।”

कोयला अभी पूरी तरह जा नहीं रहा

इस योजना की सबसे दिलचस्प परत यहीं है। जहाँ एक तरफ चीन ग्रीन टेक्नोलॉजी पर बड़ा दांव लगा रहा है, वहीं कोयले के लिए भी रणनीतिक जगह छोड़ी गई है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भू-राजनीति का असर है।

ऊर्जा नीति विश्लेषक मैथियस लार्सन कहते हैं कि चीन भविष्य के झटकों के लिए एक “बफर” रखना चाहता है। अगर तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति में झटका लगे, तो चीन कोयले का सहारा ले सके। हाल के वर्षों में यूक्रेन युद्ध, रेड सी और स्वेज संकट, और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने ऊर्जा सुरक्षा को फिर से वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

तेल के रास्तों पर निर्भरता कम करने की कोशिश

चीन की ऊर्जा रणनीति का एक और पहलू समुद्र से जुड़ा है। दुनिया के बड़े तेल व्यापार मार्गों में से एक है Strait of Hormuz। चीन के आयातित कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। क्लाइमेट पॉलिसी रिसर्चर ज़ीकुन जिया कहते हैं कि यही वजह है कि चीन अब नॉन-फॉसिल ऊर्जा को तेजी से बढ़ाने की योजना बना रहा है।

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Green manufacturing

नई योजना में एक प्रस्ताव है – अगले दस साल में गैर-जीवाश्म ऊर्जा को दोगुना करने का। अगर ऐसा हुआ तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी और उत्सर्जन पर दबाव भी घटेगा।

अगला बड़ा दांव – ग्रीन फ्यूल

सोलर और बैटरियों के बाद अब चीन की नजर एक और सेक्टर पर है – ग्रीन हाइड्रोजन और उससे बनने वाले ईंधन। नई योजना में सिर्फ हाइड्रोजन ही नहीं, बल्कि उससे बनने वाले उत्पादों पर भी जोर है। जैसे ग्रीन अमोनिया, ग्रीन मेथनॉल, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल।

जिया के अनुसार, “दुनिया में इन ईंधनों की मांग तेजी से बनने वाली है, खासकर यूरोप की नई विमानन नीतियों के कारण। चीन उसी औद्योगिक मॉडल को दोहराने की कोशिश कर रहा है जिसने उसे सोलर और बैटरियों में आगे किया।”

उत्सर्जन शायद पहले ही ठहरने लगे हैं

कुछ संकेत यह भी बताते हैं कि चीन के उत्सर्जन शायद धीरे-धीरे स्थिर होने लगे हैं। विश्लेषकों के अनुसार 2025 में ऊर्जा से जुड़े CO₂ उत्सर्जन में हल्की गिरावट देखी गई। इसके पीछे कई कारण हैं – अर्थव्यवस्था की गति में बदलाव, स्टील और सीमेंट की मांग में कमी, और नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार। लेकिन अधिकारी अभी भी औपचारिक रूप से यही कहते हैं कि चीन का उत्सर्जन 2030 तक चरम पर पहुंचेगा। यह वही लक्ष्य है जो चीन ने Paris Agreement के तहत अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं में रखा है।

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China's carbon emissions have remained nearly stable for a year and a half, with further decline expected.

दुनिया के लिए इसका मतलब क्या है

यह योजना एक दिलचस्प संतुलन दिखाती है। चीन साफ ऊर्जा की वैश्विक सप्लाई चेन को और मजबूत करना चाहता है। लेकिन अपने घरेलू ऊर्जा सिस्टम में वह अभी भी सावधानी से कदम रख रहा है।

क्लीन एनर्जी रिसर्चर बेलिंडा शेपे कहती हैं, “यह योजना दिखाती है कि साफ ऊर्जा चीन की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा नीति के केंद्र में बनी रहेगी। लेकिन कोयले पर स्पष्ट सीमाएँ न होने से उत्सर्जन बढ़ने की गुंजाइश भी बनी रहती है।” यानी कहानी सीधी नहीं है।

एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी ग्रीन टेक फैक्ट्री। दूसरी तरफ एक ऐसा देश जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए हर विकल्प खुला रखना चाहता है। और शायद यही आज की वैश्विक ऊर्जा राजनीति की सच्चाई भी है।

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