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चातुर्मास प्रारम्भ : जानिए 20 बड़े नियम और पूजा के तरीके

वाराणसी : चातुर्मास 4 महीने की अवधि जो इस साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी दिनांक 10 जुलाई 2022 रविवार से प्रारंभ होकर 04 नवंबर 2022 दिन शुक्रवार, कार्तिक शुक्ल एकादशी तक है। हिन्दू माह का चौथा माह होता है आषाढ़ माह। इस माह की शुक्ल एकादशी से चातुमास प्रारंम हो जाते हैं। आषाढ़ी एकादशी के दिन से चार माह के लिए देव सो जाते हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस बार चातुर्मास का प्रारंभ 10 जुलाई 2022 को हो गया है। आइए जानते हैं इस चार माह में क्या करें और क्या नहीं।

चातुर्मास के 20 बड़े नियम और पूजा के तरीके :
1. चार माह तक एक समय भी भोजन करते हैं।
2. इस दौरान फर्श या भूमि पर ही सोते हैं।
3. इस दौरान राजसिक और तामसिक खाद्य पदार्थों का त्याग कर देते हैं।
4. चार माह ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
5. प्रतिदिन अच्‍छे से स्नान करते हैं।

6. उषाकाल में उठते हैं और रात्रि में जल्दी सो जाते हैं।
7. यथा शक्ति दान करते हैं।
8. 4 माह में विवाह संस्कार, जातकर्म संस्कार, गृहप्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध माने गए हैं।
9. उक्त चार माह बाल और दाढ़ी नहीं कटवाते हैं।
10. इन 4 महीनों में क्रोध, ईर्ष्या, असत्य वचन, अभिमान आदि भावनात्मक विकारों से बचते हैं।

11. उक्त चार माह में यदि व्रत धारण करके नियमों का पालन कर रहे हैं तो यात्रा नहीं करते हैं।
12. इन चार माह में व्यर्थ वार्तालाप, अनर्गल बातें, मनोरंजन के कार्य आदि त्याग देते हैं।
13. अधिकतर समय मौन ही रहते हैं।
14. साधुओं के साथ सत्संग का लाभ लेते हैं।
15. नित्य संध्यावंदन करते हैं।

16. नित्य विष्णुजी का ध्यान करते हैं।
17. साधुजन योग, तप और साधना करते हैं आमजन भक्ति और ध्यान करते हैं।
18. यज्ञोपवीत धारण करते हैं या उनका नवीनीकरण करते हैं।
19. व्रत को खंडित नहीं करना चाहिए। नियम का पालन कर सके तभी चतुर्मास करना चाहिए।
20. विष्णु जी के साथ ही लक्ष्मी, शिव, पार्वती, गणेश, पितृदेव, श्रीकृष्‍ण, राधा और रुक्मिणीजी की पूजा करते हैं।

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ईष्टदेव की पूजा के तरीके :
1. पूजन में शुद्धता व सात्विकता का विशेष महत्व है, इस दिन प्रात:काल स्नान-ध्यान से निवृत हो भगवान का स्मरण करते हुए भक्त व्रत एवं उपवास का पालन करते हुए भगवान का भजन व पूजन करते हैं।
2. नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद अपने ईष्ट देव या जिसका भी पूजन कर रहे हैं उन देव या भगवान की मूर्ति या चि‍त्र को लाल या पीला कपड़ा बिछाकर लकड़ी के पाट पर रखें। मूर्ति को स्नान कराएं और यदि चित्र है तो उसे अच्छे से साफ करें।
3. पूजन में देवताओं के सामने धूप, दीप अवश्य जलाना चाहिए। देवताओं के लिए जलाए गए दीपक को स्वयं कभी नहीं बुझाना चाहिए।

4. फिर देवताओं के मस्तक पर हलदी कुंकू, चंदन और चावल लगाएं। फिर उन्हें हार और फूल चढ़ाएं। फिर उनकी आरती उतारें। पूजन में अनामिका अंगुली (छोटी उंगली के पास वाली यानी रिंग फिंगर) से गंध (चंदन, कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहंदी) लगाना चाहिए।
5. पूजा करने के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) चढ़ाएं। ध्यान रखें कि नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं किया जाता है। प्रत्येक पकवान पर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है।

6. अंत में आरती करें। जिस भी देवी या देवता के तीज त्योहार पर या नित्य उनकी पूजा की जा रही है तो अंत में उनकी आरती करके नैवेद्य चढ़ाकर पूजा का समापन किया जाता है।
7. घर में या मंदिर में जब भी कोई विशेष पूजा करें तो अपने इष्टदेव के साथ ही स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी किया जाता। लेकिन विस्तृत पूजा तो योग्य पंडित ही करता है।

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वर्जित कार्य : उक्त 4 माह में विवाह संस्कार, जातकर्म संस्कार, गृह प्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध माने गए हैं।

भोज्य पदार्थों का निषेध : इस व्रत में दूध, शकर, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, सुपारी, मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता। श्रावण में पत्तेदार सब्जियां यथा पालक, साग इत्यादि, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में प्याज, लहसुन और उड़द की दाल आदि का त्याग कर दिया जाता है।

चातुर्मास प्रकृति की पूजा करने का समय है। इस अवधि में पृथ्वी पर असंख्य जीव, नन्हें पौधे और वनस्पतियों का सृजन होता है। चातुर्मास में पीपल को जल देने, तुलसी को सींचने और अक्षय नवमी को आंवले के पेड़ की पूजा पर्यावरण को सहेजने का ही कार्य है। पर्यावरण को सहेजने का भाव हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। जीवनदायनी तुलसी, आंवला और पीपल के पेड़ और पौधों को रक्षा चातुर्मास के नियमों का हिस्सा है। चातुर्मास में सावन का महीना बेहद पवित्र माना जाता है। इस माह में भगवान शिव की उपासना की जाती है। अगर आप सावन में व्रत आदि रख रहे हैं, तो पूरे माह दाढ़ी, नाखून और बाल आदि न कटवाएं।

ज्योतिर्विद वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 9993874848

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