1964 की अधिसूचना के आधार पर प्रतिबंध लगाने का मामला, अदालत ने पूछा—क्या केवल नैतिक आधार पर किसी वस्तु को प्रतिबंधित किया जा सकता है?
कोलकाता हिन्दी न्यूज | 17 सितम्बर 2026: भारत में सेक्स टॉय के आयात पर कथित प्रतिबंध को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठा है। न्यायमूर्ति स्मिता दास दे की एकल पीठ ने पूछा कि क्या सेक्स टॉय या बॉडी मसाजर जैसे उत्पादों को प्रतिबंधित करने का अधिकार वास्तव में कस्टम्स विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विवाद केवल तथ्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी शामिल हैं। अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी।
1964 की अधिसूचना का हवाला
मामले के अनुसार, वर्ष 1964 में सीमा शुल्क विभाग की ओर से जारी एक अधिसूचना में अश्लील पुस्तकों, तस्वीरों और सेक्स टॉय से संबंधित वस्तुओं को ‘अश्लील’ श्रेणी में उल्लेखित किया गया था।
मामला दायर करने वाली कंपनी का कहना है कि बॉडी मसाजर या सेक्स टॉय को सीधे तौर पर प्रतिबंधित वस्तु नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता के अनुसार, 1962 के कस्टम्स कानून में ऐसे उत्पादों पर स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाने का कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है।
बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं उत्पाद
याचिकाकर्ता कंपनी ने अदालत में दलील दी कि इस प्रकार के उत्पाद देश के बाजारों और ऑनलाइन बिक्री प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में केवल आयात पर रोक लगाने से संबंधित व्यवसायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
कंपनी का दावा है कि किसी व्यक्ति या संस्था के वैध व्यापारिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि किसी उत्पाद को प्रतिबंधित करने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार होना आवश्यक है।
कस्टम्स ने उठाई मामले की स्वीकार्यता पर आपत्ति
दूसरी ओर, कस्टम्स विभाग ने मामले की सुनवाई योग्य होने पर ही सवाल उठाया है। विभाग की ओर से कहा गया कि कस्टम्स कानून की धारा 128 के तहत याचिकाकर्ता को संबंधित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपील करनी चाहिए थी।
कस्टम्स का तर्क है कि चूंकि याचिकाकर्ता ने निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया, इसलिए सीधे हाई कोर्ट में दायर की गई याचिका की स्वीकार्यता पर प्रश्न उठता है।
हाई कोर्ट ने कहा—महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न मौजूद
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति स्मिता दास दे की पीठ ने कहा कि मामले में केवल तथ्यात्मक मतभेद नहीं हैं, बल्कि महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी उठते हैं।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कोई प्राधिकरण केवल व्यक्तिगत या व्यक्तिनिष्ठ नैतिकता के आधार पर किसी वस्तु को ‘प्रतिबंधित’ घोषित करता है और इससे किसी नागरिक के व्यापारिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।
हाई कोर्ट ने कहा कि यह जांचना जरूरी है कि सेक्स टॉय के आयात पर प्रतिबंध किस कानूनी प्रावधान के तहत लगाया गया है और उसे किस प्रकार लागू किया गया है।
दो सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश
कलकत्ता हाई कोर्ट ने कस्टम्स विभाग को अगले दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष हलफनामे के रूप में अदालत में दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करना होगा।
मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। इस सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि संबंधित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए कस्टम्स विभाग के पास कौन-सा वैधानिक आधार उपलब्ध है।
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