कोलकाता हिन्दी न्यूज | 12 अगस्त 2026: पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण से जुड़े मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति तपोब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति राजाशेखर मंथा की खंडपीठ ने 2010 के बाद जारी किए गए OBC प्रमाणपत्रों को रद्द करने का आदेश दिया था।
अदालत के इस फैसले के बाद राज्य में जारी बड़ी संख्या में OBC प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल खड़े हुए थे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इस फैसले से करीब 5 लाख प्रमाणपत्र प्रभावित हुए थे।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि 2010 से पहले OBC के रूप में मान्यता प्राप्त वर्गों के प्रमाणपत्र वैध रहेंगे। साथ ही, जिन लोगों ने बाद में जारी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल की है, उनकी नौकरी को इस फैसले से रद्द नहीं किया जाएगा।
क्या OBC-A और OBC-B दोनों श्रेणियां खत्म हो गईं?
इस मामले को केवल OBC-A और OBC-B प्रमाणपत्रों के रद्द होने तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। हाई कोर्ट के मूल फैसले का केंद्र 2010 के बाद जारी OBC प्रमाणपत्रों की वैधता था। अदालत ने राज्य को कानून के मुताबिक नई OBC सूची तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ने को कहा था।
अदालत के अनुसार, नई सूची तैयार करने की प्रक्रिया West Bengal Backward Classes Commission Act, 1993 के प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। इसके बाद सूची को विधानसभा के समक्ष रखा जाना था।
करीब 5 लाख प्रमाणपत्रों पर पड़ा था असर
हाई कोर्ट के फैसले के बाद करीब पांच लाख OBC प्रमाणपत्रों के रद्द होने की बात सामने आई थी। अदालत का मानना था कि 2010 के बाद OBC वर्ग में शामिल किए गए समूहों और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी।
हालांकि, अदालत ने नौकरी कर रहे लोगों को राहत दी थी। रिपोर्टों के अनुसार, जिन लोगों ने इन प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल की थी या भर्ती प्रक्रिया में शामिल थे, उनके रोजगार पर सीधे असर नहीं पड़ेगा।
मामले की जड़ में क्या था विवाद?
OBC प्रमाणपत्रों को लेकर विवाद का मामला काफी पहले अदालत पहुंचा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया था कि 2010 के बाद कई समुदायों को OBC सूची में शामिल करने की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और पर्याप्त अध्ययन का पालन नहीं किया गया।
इसी आधार पर OBC सूची और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद 2010 के बाद जारी प्रमाणपत्रों को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया था।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया
कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर तत्काल रोक नहीं लगाई थी। इसके बाद भी OBC सूची और प्रमाणपत्रों को लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे चलती रही।
बाद की कार्यवाही में हाई कोर्ट ने राज्य की ओर से तैयार की गई नई OBC सूची और उससे संबंधित अधिसूचनाओं पर भी सुनवाई की। जून 2025 में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने राज्य की नई OBC सूची से संबंधित अधिसूचनाओं पर अंतरिम रोक लगाई थी।
आगे क्या होगा?
OBC आरक्षण और प्रमाणपत्रों का मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। OBC सूची में किसी समुदाय को शामिल करने या हटाने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
इसलिए वर्तमान स्थिति को समझने के लिए 2010 के बाद जारी प्रमाणपत्रों पर हाई कोर्ट के मूल आदेश के साथ-साथ उसके बाद की न्यायिक कार्यवाही को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
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