कोलकाता न्यूज डेस्क | 1 मार्च 2026: कोलकाता के बीएम बिरला हार्ट हॉस्पिटल (BM Birla Hospitals) ने कार्डियक केयर में एक ऐतिहासिक और विश्व स्तर की उपलब्धि हासिल की है।
अस्पताल की टीम ने 7 साल से अधिक समय (2018 से इम्प्लांटेड) पुराने लीडलेस पेसमेकर को सफलतापूर्वक निकालकर नया डिवाइस लगाया है।
दुनिया का पहला केस
यह दुनिया का पहला डॉक्यूमेंटेड केस है, जहां इतने लंबे समय तक लगे लीडलेस पेसमेकर को सुरक्षित रूप से निकाला गया। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी ऐसा पहला मामला दर्ज हुआ है।

79 वर्षीय बुजुर्ग मरीज में 2018 में इम्प्लांट किया गया लीडलेस पेसमेकर बार-बार होने वाले इंफेक्शन के कारण गंभीर समस्या बन गया था।
डॉ. अनिल मिश्रा (कार्डियोलॉजी डायरेक्टर) और उनकी अनुभवी टीम ने इस जटिल प्रक्रिया को अंजाम दिया।
पुराने पेसमेकर को निकालने की चुनौतियां और जोखिम
- डिवाइस दाहिने वेंट्रिकल में लगा था।
- 7 साल से अधिक समय बीतने के कारण फाइब्रोटिक एनकैप्सुलेशन (हार्ट टिश्यू से घिर जाना) हो गया था, जिससे निकालना बेहद जोखिम भरा और तकनीकी रूप से मुश्किल था।
- पहले जापान और मलेशिया में केवल 2 से 4 साल पुराने लीडलेस पेसमेकर निकाले गए थे – 7+ साल का केस दुनिया में पहला डॉक्यूमेंटेड मामला है।
- टीम ने गहन जांच, इमेजिंग और रिस्क असेसमेंट के बाद निर्णय लिया कि डिवाइस को छोड़ना सुरक्षित नहीं होगा।
प्रक्रिया कैसे पूरी हुई?
- बायें सबक्लेवियन वेन के रास्ते से टेम्पररी पेसिंग सपोर्ट स्थापित किया गया।
- कंट्रोल्ड ट्रैक्शन और सटीक कैथेटर मैनिपुलेशन के साथ एक ही कोशिश में पुराना डिवाइस बिना किसी जटिलता के निकाल लिया गया।
- तुरंत बाद हार्ट के निचले दाहिने वेंट्रिकुलर सेप्टल में नया सिंगल-चेंबर (VVIR) एवेइर वीआर लीडलेस पेसमेकर लगाया गया।
- स्थिर थ्रेशोल्ड, बेहतरीन इलेक्ट्रिकल पैरामीटर और कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं – प्रक्रिया पूरी तरह सफल रही।
डॉ. अनिल मिश्रा का बयान
“लीडलेस पेसमेकर ट्रांसवीनस सिस्टम की कई समस्याओं (इंफेक्शन, लीड फ्रैक्चर, वेन थ्रॉम्बोसिस) को कम करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। लेकिन लंबे समय बाद निकालना अनिश्चित और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण होता है।
इस केस में सबसे महत्वपूर्ण था – फिक्सेशन की डिग्री समझना, संभावित जोखिमों के लिए प्लानिंग करना और हर स्टेज पर पेसिंग बैकअप सुनिश्चित करना।
मरीज की उम्र, कमजोरी और को-मॉर्बिडिटी को देखते हुए डिवाइस को छोड़ने का विकल्प नहीं था। इस प्रक्रिया में कंट्रोल्ड ट्रैक्शन, सटीक कैथेटर मैनिपुलेशन और लगातार हीमोडायनामिक मॉनिटरिंग की जरूरत थी।
ऐसे मामले रूटीन इंटरवेंशन नहीं होते – इनके लिए अनुभवी, कोऑर्डिनेटेड टीम और उन्नत सुविधाओं की आवश्यकता होती है। यह सफलता कार्डियक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी में बीएम बिरला हार्ट हॉस्पिटल की लीडरशिप को दर्शाती है।”
यह उपलब्धि बुजुर्ग मरीजों में लंबे समय तक चलने वाले लीडलेस डिवाइस मैनेजमेंट के लिए नई उम्मीद जगाती है और भारत में एडवांस्ड कार्डियक केयर की वैश्विक क्षमता को मजबूत करती है।
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