श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। बौद्ध-धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ, उनके उपरांत सहस्त्राब्दियों बाद आज भी विश्व स्तर पर प्रासंगिकता के सभी माप पर पूर्णरूपेण सठीक सिद्ध होती हैं। वर्तमान विश्व-परिप्रेक्ष्य के जनजीवन से लेकर राष्ट्र-मंडलों के सामाजिक और सामूहिक जीवन हेतु उनकी शिक्षाएँ, एक विशेष नीति-रेखा बन गईं हैं, जिसके आधार पर ही विश्व-शांति की स्थापना की कल्पना को यथार्थ स्वरूप प्रदान किया जा सकता है और किया जा रहा भी है। परस्पर शांति, प्यार, ज्ञान, खुशी, दया, करुणा, सहनशीलता और सहयोग ही तो, आज विश्व-मानव की प्रमुख आवश्यकता बन गई हैं, जिसे सदियों पहले महात्मा बुद्ध ने स्थापित किया था।
महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ क्रोध, शत्रुता, हिंसा और अज्ञानता को अपने मन को संयमित रख विश्व मानव का प्रशस्त मार्ग प्रदर्शन करती हैं। आज दुनिया भर के देश, उसके अधिकारी और उसके लोग शांति और परस्पर सहयोगिता की तलाश में बेचैन रहे हैं। ऐसी मुश्किल स्थिति में शांति की माँग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। फलतः बौद्ध-दर्शन और महात्मा बुद्ध से जुड़ी पवित्र स्थानों यथा: लुंबिनी, कपिलवस्तु, सारनाथ, कुशीनगर, रामग्राम आदि का महत्व भी निरंतर बढ़ते जा रहा है। ये सभी स्थान मौन रहकर भी निरंतर विश्व-मानवता के पाठ पढ़ा रहे हैं। अतः ये सभी स्थान विश्व-मानवता के प्रबल पीठ रहे हैं।
भगवान बुद्ध की जन्मभूमि लुंबिनी, नेपाल में रूपन्देही जिले में वर्तमान दानों नदी के पश्चिमी किनारे पर, हिमालय के पाद-प्रदेश में समृद्ध और व्यवस्थित भैरहवा (सिद्धार्थनगर) से लगभग 22 किलोमीटर की पश्चिमी दूर पर स्थित है। वर्तमान में लुम्बिनी वृहद आयतकार घेरेबंदी में विभिन्न राष्ट्रों के आकर्षणीय बौद्ध मठों-विहारों से परिपूर्ण है।
जब कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन की गर्भवती पत्नी मायादेवी, अपनी संतान को जन्म देने के उद्देश्य से अपने मायके देवदह, प्राचीन कोलिय गणराज्य की राजधानी, जा रही थी, उसी क्रम में लुम्बिनी के आम्र और शाल से परिपूर्ण वन में एक शाल (शोरेरोबुस्टा) वृक्ष के नीचे ही शिशु सिद्धार्थ का जन्म हुआ था।

बताया जाता है कि मायादेवी प्रसव पीड़ा के कारण इसी वन में अपनी मायके जाने की यात्रा को अल्प विराम देने का आदेश दिया। शाही यात्रा यहीं पर थम गई थी। तत्काल में अतिशीघ्र ही आवश्यक कुछ व्यवस्था की गई। वहीं पर तात्कालिक निर्मित भूमि-सेज पर वह पसर गईं। प्रसव-पीड़ा अपने चरण उत्कर्ष पर जा पहुँचा और फिर दिव्य संतान स्वरूप सिद्धार्थ अर्थात, बोधिसत्व का इस धरती पर अवतरण हुआ था।
उस पवित्र अलौकिक घटना के साथ ही माता मायादेवी की वह परम प्रसव-पीड़ा, अब मधुर संतुष्टि और मुस्कान के रूप में परवर्तित हो गई। बोधिसत्व, अपनी माता मायादेवी सहित सबके दु:खों के निदान करने, इस पवित्र धरती पर जो प्रगट हो चुके थे।
उसी पवित्र स्थान के बहुत ही पास में ही शाक्यों को स्नान करने वाला शीशे के समान अत्यंत ही उज्ज्वल पानी और खिले रक्तिम कमल पुष्पों से शोभायमान एक पवित्र जलकुंड था। बधिस्तव के जन्म के उपरांत उसी में माता मायादेवी स्नान करने के लिए अपनी सेविकाओं की मदद से उतरीं।
स्नान कर वह उस पवित्र जलाशय से उत्तर की ओर बाहर आई। वहाँ से लगभग बीस कदम आगे बढ़ने के बाद वह कुछ पीड़ा की अवस्था में अपने हाथ बढ़ाकर पास के एक अशोक वृक्ष की लटकती एक शाखा को थाम ली। फिर गंभीर साँसे लेने के बाद उन्होंने पूर्व की ओर मुख किए हुए अपनी सेविकाओं के साथ आगे सात कदम चलीं और फिर वहीं बैठी गई थीं, जहाँ आज श्वेत चतुर्भुजी ‘मायादेवी मंदिर’ है।
इस बारे में, ह्वेन-त्सियांग ने भी लिखा है, – ‘वहाँ शाक्यों का नहाने का तालाब था, जिसका पानी शीशे जैसा साफ़ था और जिसकी सतह फूलों ढकी हुई थी। इसके उत्तर में 24 या 25 कदम की दूरी पर बोधिसत्व के जन्म की जगह पर एक गिरा हुआ अशोक फूल का पेड़ था। इस जगह के पूरब में, अशोक-राजा का बनाया हुआ, एक स्तूप था, जहाँ दो ड्रैगन ने राजकुमार के शरीर को नहलाया था।
बोधिसत्व बिना किसी मदद के उस दिशा में चले गए। पास के ही पवित्र जलाशय में माया देवी स्नान की। जलाशय के किनारे के एक अशोक वृक्ष की एक शाखा को पकड़कर वह धीरे-धीरे जलाशय के बाहर आई, जिसे सिद्धार्थ के जन्म के समय मायादेवी ने पकड़ा था। यहाँ पर एक अशोक स्तंभ है, जिस पर महात्मा बुद्ध के यहीं पर जन्म होने की बात लिखी गई है।’
आज भी वह सम्राट अशोक द्वारा स्थापित प्रस्तर स्तम्भ मौजूद है और वह पुरातन इतिहास को मौन बता रहा है। अशोक स्तम्भ पर इस जगह का नाम ‘लुमिनीगेम’ और ‘लुम्बिनी वनाई’ लिखा हुआ है। इस सम्बन्ध में सबसे पहला पुस्तकीय उल्लेख बौद्ध विद्वान सुत्तनिपात द्वारा किया गया है। जबकि कुछ बौद्ध पुस्तकों में इस जगह को ‘रुम्मिनदेई रूपंडेई’ (खूबसूरत पवित्र महिला) के नाम से भी उल्लेख मिलता है।
फिर कुछ पुस्तकों में इस स्थान को ‘पदेरिया’ या ‘परारिया’ के नाम से भी पुकार गया है। ह्वेन-सियांग के अनुसार यह लुम्बिनी, कपिलवस्तु के बाण-कुएँ से लगभग 40 या 50 ली (21.729 या 24.445 किलोमीटर) उत्तर-पूर्व में स्थित था। फाहियान ने भी लुम्बिनी को कपिलवस्तु से लगभग 50 ली (24.445 किलोमीटर) पूरब में ही माना है। उस समय यह कपिलवस्तु, रामग्राम और दूसरे ज़रूरी शहरों से लोकप्रिय ‘उत्तरा पथ’ से जुड़ा था।
लुम्बिनी स्थान का उल्लेख बौद्ध-साहित्य और दर्शन में प्रचुर मिलता है, साथ ही चौथी, पाँचवीं, सातवीं और आठवीं सदी में भारत और नेपाल भ्रमण हेतु आए विभिन्न चीनी यात्रियों और तीर्थ-यात्रियों के लेखों में भी उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथों जैसे; ललितविस्तर, दिव्यावदान, महावंश, जातक निदानकथा आदि में भी इस लुम्बिनी को महात्मा बुद्ध की जन्म-स्थली स्वरूप एक पवित्र स्थान के रूप में उल्लेख हुआ है।
कुछ जातक कथा में बताया गया है कि लुम्बिनी का वह साल और आम्र वन, भगवान बुद्ध के जीवनकाल में शाक्यों और कोलिय लोगों के मिले जुले कब्ज़े में ही हुआ करता था। शाक्यों और कोलिय लोगों के राज में वह वन, उनके क्रीड़ा और मनोरंजन के लिए विशेष जगह हुआ करती थी। अश्वघोष ने अपने ‘बुद्धचरित’ काव्य में महात्मा बुद्ध की जन्मभूमि लुबिनी को ‘हर तरह के पेड़ों वाले अत्तरथ (स्वर्ग) के बगीचे जैसा सुंदर’ बताया है।
बौद्ध दार्शनिक जलानसोल दिव्यावदान के अनुसार, मगध सम्राट अशोक ने अपने इस अधिकार क्षेत्र में उस समय एक लाख सोने वाला एक पगोडा को स्थापित किया था। उन्होंने लुम्बिनी के इसी स्थान (महात्मा बुद्ध की जन्म-स्थली) पर पत्थर का एक स्तम्भ स्थापित किया था, जिसके ऊपर पत्थर का ही बना हुआ, एक घोड़े को भी स्थापित किया था।
उस स्तम्भ पर ब्रहमी लिपि में लिखा हुआ है कि यह लुंबिनी ही वह जगह है, जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था । उस पत्थर के स्तम्भ के आधार से 48.76 सेंटीमीटर की दूरी पर ईंट की रेलिंग लगाई गई थी, जो आज भी टूटे हुए रूप में यहाँ पर परिलक्षित होती है। बाद के समय में अलग-अलग खुदाई के दौरान यहाँ पर मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त काल की बहुत सारी वस्तुएँ मिली हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि यह लुम्बिनी तीसरी सदी ईस्वी पूर्व से ही बौद्धों के लिए एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल के रूप में प्रतिष्ठित रही थी। इस लुंबिनी में शुरुआत से लेकर मध्यकाल तक अच्छी आबादी रही थी। विश्व भर से साधु-संतों तथा साध्वियों का निरंतर यहाँ पर आवागमन हुआ करता था। सम्राट अशोक ने लुम्बिनी गाँव और इसके आस-पास के कई गाँवों को सरकारी कर से मुक्त किया था।
ह्वेन-सियांग के लेख भी अशोक स्तम्भ के ऊपरी हिस्से में घोड़े की आकृति होने की बात को प्रमाणित करता है। बाद में बुहलर ने भी यहाँ पर एक पत्थर के स्तम्भ पर पत्थर का बना हुआ घोड़ा की बात को स्वीकार किया है। सन् 2003 में वह पत्थर से निर्मित घोड़ा, बिजली गिरने की चोट से उस पत्थर स्तम्भ से टूटकर नीचे गिर पड़ा था। वह पत्थर का टुकड़ा आज भी अशोक स्तम्भ के पास ही संरक्षित किया हुआ है, जो इतिहासकारों के लिए विशेष कीमती सूचना प्रदान करने वाला है।
चीनी बौद्ध-विद्वान शुई-चिंग-चू ने लिखा है कि लुंबिनी में अशोक का वह पेड़, जिसे सिद्धार्थ के जन्म के समय, मायादेवी ने पकड़ा था, अभी भी (उसके यात्रा के समय) ज़िंदा हालत में है। उसी के नीचे मायादेवी की एक प्रस्तर निर्मित मूर्ति रखी हुई है, जहाँ स्थानीय भक्त लोग विभिन्न चढ़ावा चढ़ा करते हैं।
जिस स्थान पर बोधिसत्व के कोमल पैर धरती पर सबसे पहले पड़े थे, उनके पवित्र पैरों के उन निशान को सम्राट अशोक ने पत्थरों से ढकवा दिया था, ताकि उसे संरक्षित कर उसे अनंतकाल तक चिह्नित किया जा सके।
सन् 1993 से 1997 तक पुरातत्व विभाग, लुम्बिनी विकास ट्रस्ट और जापानी बौद्ध संघ के संयुक्त उत्खनन के दौरान मिली उल्लेखनीय खोजों ने इसकी पुष्टि की है। फिर इस महत्वपूर्ण तथ्य को नेपाल के तत्कालीन माननीय प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा ने 4 फरवरी 1996 को सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी।
आजकल, लुंबिनी के उस वृहद आयताकार पवित्र संरक्षित क्षेत्र में देश-विदेश के अनेक धार्मिक मठ और विहार स्थापित हैं। सबसे दक्षिण भाग में वृहद अर्ध वृतकार जलाशय और अर्ध वृतकार सड़क के मध्य में हरीतिमा युक्त पेड़-पौधों और पुष्पीय पौधों से सुसज्जित बोधिसत्व की जन्मस्थली युक्त माया देवी मंदिर है।
उसके उत्तर की ओर बढ़ने पर म्यांमार का गोल्डन टेम्पल, अमेरिका का मठ-विहार, कोरिया बौद्ध मठ, भारतीय मठ, थाईलैंड का रॉयल थाई विहार, चीन का जोंग-हुवा मठ, रसियन बौद्ध-स्तूप, सिंगापूर का उरगेन डोरजी चोलिङ्ग मठ, जर्मन का विशाल डरिगूनग कागयु लोटस स्तूप, लुम्बिनी संग्रहलय, श्रीलंका का दुतुगमुनऊ मठ, विश्व शांति स्तूप आदि विशेष आकर्षणीय हैं।
इसके अतिरिक्त महात्मा बुद्ध तथा बौद्ध दर्शन से सम्बन्धित प्रस्तर स्तम्भ, पुष्करिणी जलाशय, स्तूप, विहार, पुराने अवशेषों और कलाकृतियों से वह संरक्षित क्षेत्र परिपूर्ण है। लुम्बिनी संग्रहालय में वहाँ से प्राप्त अवशेषों को समय के क्रम में सजाकर विशेष धरोहर के रूप में संरक्षित किया हुआ है।
लुम्बिनी को तथा इसके सम्बद्ध क्षेत्र को सन् 1997 में यूनेस्को के ‘वर्ल्ड कल्चरल हेरिटेज साइट’ के रूप में शामिल किया गया है। फलतः आज लुम्बिनी बौद्ध दर्शन से सम्बद्ध एक प्रसिद्ध और आवश्यक ऐतिहासिक केंद्र है।
स्रोत –
1) सी-यू-की बुद्धिस्ट रिकॉर्ड्स ऑफ़ द वेस्टर्न वर्ल्ड; (पार्ट II) – एस. बील (1994) (ट्रांस), मोतीलाल बनारसीदास पब्लिकेशन्स,
2) द एंशिएंट जियोग्राफी ऑफ़ इंडिया, (रीप्रिंटेड): – ए. कनिंघम (1990) लो प्राइस पब्लिशर्स,
3) एंटीक्विटीज़ ऑफ़ द बुद्धाज़ बर्थप्लेस इन द नेपालीज़ तराई; – ए. फ्यूहरर, (1972) रीप्रिंटेड इंडोलॉजिकल बुक हाउस,
4) आर्ट एंड आर्किटेक्चर रिमेन्स इन द वेस्टर्न तराई रीजन ऑफ़ नेपाल, – जी. गिरी, (2003) एड्रोइट पब्लिशर्स,
5) लाइफ़ ऑफ़ बुद्ध, रीप्रिंटेड, – डब्ल्यू. डब्ल्यू. आर. हिल, (1972) ओरिएंटेल इंडिका,
6) बुद्ध का जीवन; (रिप्रिंटेड), – एच.सी. वॉरेन, (1986). ईस्टर्न बुक लिंकर्स,
7) “रुम्मिनदेई शिलालेख, अशोक के पदरिया शिलालेख, द इंडियन एंटीक्वेरी, वॉल्यूम XXXIV – ए.वी. स्मिथ, (1905)
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व लेखक
ई-मेल सम्पर्क – rampukar17@gmail.com

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