श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। उच्चकोटि के साहित्यिक महामानव। ग्रामीण सादा जीवन, उच्च विचार के दृढ़ पोषक। बाहर से बिल्कुल साधारण, परन्तु अन्दर से अद्भुत जीवट प्राण-शक्ति के मालिक। हृदय से जरा-सा भी किसी ने देख लिया, उसका तो बिन बोल के मित्र। आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर। जीवन में न तो विलास की आकांक्षा, न अर्थ की ही कामना। अपने हर काम स्वयं करने वाले, हिंदी कथा और उपन्यास के एक देदीप्यमान नक्षत्र का ही नाम है ‘प्रेमचन्द’ अर्थात, ‘मुंशी प्रेमचंद’।
धनपत राय के साहित्यिक जीवन का आरंभ 1901 से ही हो चुका था। प्रारंभ में वे ‘नवाब राय’ के नाम से उर्दू में लिखा करते थे। उनका पहला उपलब्ध उर्दू उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ है, जिसका हिंदी रूपांतरण ‘देवस्थान रहस्य’ नाम से हुआ है। उनका दूसरा उपन्यास ‘हमखुर्मा व हमसवाब’ है, जिसका हिंदी रूपांतरण ‘प्रेमा’ नाम से प्रकाशित हुआ है। 1908 ईo में नवाब राय के नाम से ही उनका देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण कहानी-संग्रह ‘सोज़े-वतन’ प्रकाशित हुआ।
इस संग्रह की कहानियों में राजद्रोह की बातें कहकर अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया और लेखक नवाब राय को भविष्य में लेखन न करने की चेतावनी दी। फलतः अपने एक मित्र मुंशी दयानारायण निगम द्वारा प्रस्तावित छद्मनाम ‘प्रेमचंद’ को अपनाया और अब हिन्दी में अपनी रचनाएँ लिखने लगे। ‘मुंशी प्रेमचंद’ नाम से उनकी पहली कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ कानपुर से प्रकाशित ‘जमाना’ पत्रिका के 1910 के दिसंबर के अंक में प्रकाशित हुई थी।
1918 ई. में मुंशी प्रेमचंद का पहला हिंदी उपन्यास ‘सेवासदन’ प्रकाशित हुआ। इसकी लोकप्रियता ने उन्हें हिंदी का प्रतिष्ठित कथाकार बना दिया। फिर तो उन्होंने देश और समाज में ही व्याप्त समस्याओं को उभारते हुए प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, कायाकल्प, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मंगल सूत्र (अपूर्ण) जैसे डेढ़ दर्जन उपन्यासों को लिखा। इसके साथ ही साथ उन्होंने देश और समाज के निम्न व मध्यम वर्ग से रस खींचकर लगभग तीन सौ से भी अधिक हिन्दी कहानियों की कालजयी सुंदर कथा-वाटिका सजा दी।
अपनी कथा-वस्तु के लिए प्रेमचंद राजमहलों, जंगलों या फिर शहरों में भागते-फिरते नजर न आयें, बल्कि अपने ही घर-द्वार, गली-रास्तों, खेत-खलिहानों से ही कथा-वस्तु की खोज कर उसे बिना किसी मलमा के ही अपने सरल शब्दों में कथा-रूप प्रदान किया। फिर तो इनकी कहानियों में बूढ़ी काकी, हल्कू, होरी, धनिया, गोबरा, सुखिया, अमीना, अलगु, बेचन आदि देहाती पात्र के रूप में स्थापित होने लगे।
ऐसे ही ग्रामीण पात्रों से सुसज्जित पूस की रात, नामक का दरोगा, सौत, सज्जनता का दण्ड, पंच परमेश्वर, ईदगाह, उपदेश, परीक्षा, राजा हरदौल, रानी सारन्धा, मर्यादा की वेदी, पाप का अग्निकुण्ड, जुगुनू की चमक, धोखा, अमावस्या की रात्रि, ममता, पछतावा आदि लगभग तीन सौ कहानियाँ लिख डाली, जिनका समग्र रूप ‘मानसरोवर’ के रूप में आठ खंडों में प्रकाशित हुई।
मुंशी प्रेमचंद की लगभग सभी रचनाएँ समाज की वास्तविकता का प्रतिबिंब है, जो गरीबों और शहरी मध्यवर्ग की समस्याओं को व्यक्त करती हैं। कालजयी लेखक की इस अद्वितीय लेखन-क्षमता के आधार पर ही इन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा गया है।
मुंशी प्रेमचंद ने मुंबई (बंबई) के मोहन दयाराम भवनानी की ‘अजंता सिनेटोन कंपनी’ में कुछ समय के लिए फिल्मी कथा-लेखक की नौकरी भी की थी। 1934 में प्रदर्शित फिल्म ‘मजदूर’ की कहानी उन्होंने ही लिखी थी। लेकिन फिल्मी नगरी बंबई की आबोहवा तथा फिल्म जगत से जुड़े बड़े-बड़े व्यापारियों के व्यवहार उन्हें रास नहीं आई। फलतः एक वर्ष का फिल्मी अनुबन्ध भी वे पूरा न कर सके और दो महीने का वेतन छोड़कर वापस बनारस लौट आए।
साहित्य के प्रति और साहित्य की हर दृष्टि के प्रति, यानी राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक आदि सभी पहलुओं को उन्होंने जिस तरह अपनी रचनाओं में समेटा और खास करके एक आम आदमी को, एक किसान को, एक आम दलित वर्ग को जिस तरह से अपने पात्र के रूप शक्ति प्रदान किया, वह अपने आप में आज भी विशेष दृष्टांत ही है।
किसी भी साहित्यकार के लिए उसकी अमूल्य निधि, इंसानी जिन्दगी में अपने मन को स्थापित कर, इंसानी संघर्ष की भूमि पर अपनी मुस्कराहट के साथ सदा अटल बने रहकर, मानवीय संवेदना को निरंतर ग्रहण करना ही तो है। उसके लिए इंसानी जिन्दगी में दिन प्रतिदिन की घटना ही एक नई ‘रचना’ होती है। उसे घाट-घाट का पानी पीना पड़ता है। उसे जाति, धर्म, वर्ग, प्रांत आदि के तथाकथित घेरे को तोड़ कर बाहर निकलना पड़ता है। तब जाकर ‘धनपत राय’ जैसा साधारण व्यक्ति विशेष ‘नवाब राय’ बनते हुए एक दिन उपन्यास और कथा सम्राट ‘मुंशी प्रेमचन्द’ बन जाता है।
यह बात तो सत्य ही है कि जो व्यक्ति जितना भोगता है, जितना सहता है, जिसका प्रत्यक्ष गवाह होता है, उसी को वह अपनी कलम के माध्यम से पाठकों के सम्मुख परोसता है। यही साहित्यिक भावनाएँ प्रेमचन्द को ‘कलम का जादूगर’ बना देती हैं। प्रेमचंद ने अपनी संवेदनाएँ गरीबी और कष्ट को झेलते हुए भी चट्टानों से लड़ने की जिजीविषा रखने वाले होरी-धनिया, गोबर-झुनिया, बूढी काकी, पिसनहारी, हामिद की दादी, अमीना, सूरदास आदि के माध्यम से व्यक्त की है।
तो दूसरी ओर उस भौतिकवादी व्यवस्था पर भी कठोर प्रहार किया है, जो गरीबों के ही शोषण से संचित धन से उच्च शिक्षा को प्राप्त कर, उन्हीं गरीबों को नीच और त्याज्य मानते हैं। धन-शोषण का माध्यम मात्र ही मानते हैं। पंडित अलोपिदीन, बुद्धिराम, कुंवर विशाल सिंह, डॉ. चढ्ढा, मातादीन, विप्र महाशय आदि ऐसे ही पात्र हैं, जिनको समझने मात्र से ही हम पाठकों के मन में उनके प्रति घृणा और उपेक्षा की भावना जागृत होती है।
प्रेमचन्द का निजी अनुभव अथाह था, क्योंकि उनका सम्बन्ध आम जनता के साथ ही था। वह समाज में दबे-कुचले हुए अनगिनत उपेक्षित जनों के साथ ही अपना जीवन वसर करते हुए कालान्तर में उनकी ही आवाज बनकर सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विपन्न तथा विकास के राह से किनारे हुए लोगों को सही राह दिखाने वाले आजीवन कर्मठ व्रती बने रहें।
उनका विचार पूर्णतः मानवतावादी रहा है। मानवतावाद ही उनकी सृजन की मूल प्रेरणा थी। उनका मानना है कि समाज में सबको रहने और जीने का अधिकार है और इसके लिए समाज में परस्पर समानता की भावना होनी चाहिए।
प्रेमचंद हिन्दी सिनेमा के लोकप्रिय कथाकारों में से रहे हैं। उनके देहांत के दो वर्षों बाद सुब्रमण्यम ने ‘सेवासदन’ उपन्यास पर (1938) में फ़िल्म बनाई। इसी तरह से 1963 में ‘गोदान’ और 1966 में ‘गबन’ उपन्यास पर फ़िल्में बनीं, जो बहुत लोकप्रिय हुईं । मृणाल सेन ने उनकी कहानी ‘कफन’ पर आधारित ‘ओका ऊरी कथा’ (1977) नाम से एक तेलुगू फ़िल्म बनाई, जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। सत्यजित राय ने उनकी दो कहानियों ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977) और ‘सद्गति’ (1981) पर यादगार फ़िल्में बनाईं। उनके उपन्यास ‘निर्मला’ पर बना टीवी धारावाहिक ‘निर्मला’ (1980) भी बहुत लोकप्रिय हुआ था।
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के जीवन से संबंधित अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, परंतु इनमें से उनकी प्रामाणिक जीवनी को उजागर करने वाली प्रमुख तीन पुस्तकें हैं। यथा –
1) ‘प्रेमचंद घर में’ – यह पुस्तक प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी द्वारा 1944 में लिखी गई है, जिसमें उनके व्यक्तित्व के घरेलू पक्ष को उजागर किया गया है। इसके संशोधित स्वरूप को प्रेमचंद के नाती प्रबोध कुमार ने 2005 में दोबारा प्रकाशित कराया।
2) ‘प्रेमचंद कलम का सिपाही’ – प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय द्वारा 1962 में लिखी गई पुस्तक है। यह एक तरह से प्रेमचंद की वृहद जीवनी है, जिसे प्रामाणिक बनाने के लिए लेखक अमृतराय ने प्रेमचंद के कई पत्रों का बहुत उपयोग किया है।
3) ‘कलम का मज़दूर : प्रेमचन्द’ – मदन गोपाल द्वारा रचित और डॉ. रामविलस शर्मा द्वारा लिखित भूमिका वाली पुस्तक 1964 में प्रकाशित जि। यह पुस्तक मूलतः मदन गोपाल द्वारा अंग्रेजी में लिखी गई थी, जिसका बाद में हिंदी रूपांतरण प्रकाशित हुआ। यह प्रेमचंद संबंधी तथ्यों का अधिक तटस्थ रूप से मूल्यांकन करती है।
मुंशी प्रेमचंद चुकी प्रगतिशील विचारधार से संबंधित थे। अतः अवसर मिलने पर उन्होंने बीमार की अवस्था में लखनऊ में 1936 ईo में आयोजित ‘अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ’ के प्रथम सम्मेलन की अध्यक्षता की, जिसमें नोबल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से लेकर विभिन्न भारतीय भाषाओं के अनेक साहित्यकारगण उपस्थित थे।
हिन्दी साहित्य का ‘कलम का जादूगर’ मुंशी प्रेमचंद असाध्य रोग से पीड़ित होकर 8 अक्टूबर, 1936 को सदा के लिए माँ भारती की गोद में सो गए। परंतु अपनी विविध रचनाओं के माध्यम से वे कालजयी हैं। उनकी रचनाओं के बिना हिन्दी साहित्य विपन्न ही रहेगा। 
(‘प्रेमचन्द जयंती’ 31 जुलाई, 2025)
श्रीराम पुकार शर्मा
ई-मेल सम्पर्क – rampukar17@gmail.com

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