।।झलकारी बाई शौर्य की अग्नि।।
अशोक वर्मा “हमदर्द”
धूपों में पली जो मिट्टी, वही दीप जलाती है,
सीने में दबी चिंगारी भी पवन से बढ़ जाती है,
जो बेटी अँधेरों में भी राहों को पकड़ जाती है,
वो रण में उतरकर दुश्मन की साँसें जला जाती है
वहां शौर्य पनपता है।
झलकारी के मन में कोई डर नहीं पलता था,
रणचंडी-सा रूप उनका देख अँधेरा हिलता था,
रानी की हमशक्ल होकर भी गर्व अलग खिलता था,
जैसे अपनी छाया बनकर भी तेज अधिक मिलता था
वहां शौर्य पनपता है।

जाति की दुविधाएँ उनके रथ के पहिए थाम न सकीं,
सामाजिक बेड़ियाँ आकर भी साहस को बांध न सकीं,
दर्पण ने एक स्त्री देखी, पर रणभूमि जान न सकी,
कि जिस देह को छोटा समझा, उस देह में आग बसी
वहां शौर्य पनपता है।
तोपों की गड़गड़ में भी जो आँख न झपक पाती थी,
धूलों की आँधी में भी जो रानी-सी दीख जाती थी,
एक छलावा बनकर दुश्मन को सीने से टकराती थी,
अपने ही बलिदान से रानी की राह बचाती थी
वहां शौर्य पनपता है।
कैदों के अंधेरों में भी मन उनका न रोया था,
हर क़िस्सा कहता है—अंग्रेज़ों ने सब खोया था,
क़ातिल के सामने खड़े रहकर भी सिर न झुका था,
वो सत्य की मूर्ति थीं, उनका हर उत्तर जगा था
वहां शौर्य पनपता है।
इतिहास ने बहाना बनकर नाम उन्हें छोटा लिखा,
जाति की सलवट में उनका साहस कहीं मोड़ा गया,
पर जन-जन के मुख से उनकी गाथा रोज़ उठी,
जिस मिट्टी ने जन्म दिया, उसने ही कथा रची
वहां शौर्य पनपता है।
झलकारी अब भी उस धरती के हृदय में जलती हैं,
माँ-बाप की बेटियों को साहस की राह दिखाती हैं,
जो अन्याय से भिड़ने का संकल्प जगाती जाती हैं,
शौर्य की नदी-सी बहकर पीढ़ी को धोती जाती हैं
वहां शौर्य पनपता है।

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