केशव कुमार भट्टड़, कोलकाता। बीकानेर, राजस्थान का एक ऐतिहासिक शहर, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। यहां के भुजिया, रसगुल्ले और भव्य किले न केवल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, बल्कि शहर की अनूठी ‘पाटा संस्कृति’ भी इसकी पहचान का अभिन्न अंग है।
पाटा संस्कृति, जिसे ‘पाटे’ के रूप में जाना जाता है, पुराने शहर के चौकों और मोहल्लों में स्थापित लकड़ी या लोहे के बड़े तख्तों पर आधारित सामूहिक बैठकों का प्राचीन चलन है। पाटा संस्कृति की नींव 1488 ई. में रखी गई, जब राव बीका ने इस सुनहरे शहर की स्थापना की।
1950 ई. से पूर्व शहर में लगभग 120 पाटे थे, जो सामाजिक एकता के प्रतीक बने। चांदी के पाटे उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक माने जाते थे। ये पाटे न केवल सुख-दुख साझा करने के स्थल हैं, अपितु सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संवाद के जीवंत केंद्र हैं।

पाटा संस्कृति बीकानेर की सामाजिक एकजुटता और बौद्धिक जागरूकता का प्रतीक है। ये पाटे शहर को ‘मस्त मौला’ (आनंदमय) और ‘संतोषी’ (संतुष्ट) बनाते हैं। ये जन्म, विवाह, मृत्यु जैसे संस्कारों से लेकर धार्मिक उत्सवों और होली के रम्मत आयोजनों तक का केंद्र रहते हैं।
इनके माध्यम से सांस्कृतिक पोषण होता है, जैसे ‘रम्मत’ आयोजनों के माध्यम से ऐतिहासिक कथाओं का प्रसार। यात्री इन्हीं पर ठहरकर जिम्मेदार नागरिकों से जुड़ते हैं।
पाटे बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत के गवाह हैं, जहां ‘अमर सिंह राठौड़’ जैसे ऐतिहासिक पात्रों की कथाएं ‘रम्मत’ से जीवंत होती रही हैं। होली के रम्मत (नाटकीय प्रस्तुतियां) आचार्य चौक के पाटे पर 85 वर्षों से आयोजित हो रही हैं।
1970 में प्रदर्शित बॉलीवुड फिल्म ‘यादगार’ के गीत ‘एक तारा बोले….’ का फिल्मांकन दम्माणी चौक के ‘छतरी वाले’ पाटे पर किया गया। ये पाटे बीकानेर की सामूहिक चेतना को प्रतिबिंबित करते हैं, जहां पारंपरिक तख्तों पर बैठकर संवाद की परंपरा फली-फूली।
वैश्विक स्तर पर, ये पाटे बीकानेर के सॉफ्ट-पावर के रूप में चर्चित हैं, जहां देश-विदेश के मुद्दों पर सार्थक संवाद होता है। जातीय पंचायतों में इनका उपयोग विवाद समाधान के लिए होता था। ये इस संस्कृति की लोकप्रियता का प्रमाण है।
लोक मान्यताओं के अनुसार, शासक पाटों पर विराजमान होकर शासन व्यवस्था संचालित करते थे। 1708 ई. के कवि उदयचंद की रचनाओं में चौकों और पाटों का उल्लेख मिलता है, जो इनकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। प्रारंभ में ये पत्थर की चौकियां थीं, किंतु 18वीं शताब्दी से लकड़ी के कलात्मक पाटे प्रचलित हुए।
यहां बुजुर्ग और युवा एकत्र होकर स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं, जो सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करता है। पाटे पूर्वजों की कर्मभूमि के रूप में पवित्र माने जाते हैं, जहां महिलाएं भी घूंघट ओढ़ती हैं।
पाटे सामान्यतः लकड़ी या लोहे के बड़े और मजबूत तख्ते होते हैं, जो एक से चार की संख्या में चौकों या मोहल्लों के किनारे लगे रहते हैं। इनकी ऊंचाई और चौड़ाई ऐसी होती है कि दस से पंद्रह व्यक्ति आसानी से बैठ सकें। शाम ढलते ही, स्थानीय निवासी – बुजुर्ग से लेकर युवा तक- इन पर एकत्रित हो जाते हैं।
चर्चा के विषय विविधतापूर्ण होते हैं : स्थानीय चुनावी मुद्दों से लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं, जैसे अमेरिका की राजनीति या पाकिस्तान के हालात, तक। बॉलीवुड फिल्में, ज्योतिषीय भविष्यवाणियां और त्योहारों की तैयारियां भी इन महफिलों का हिस्सा बनती हैं।
जहां गपशप से लेकर जीवन के गहन रहस्यों तक की बातें उभरती हैं।विदेश में बसे बीकानेरी भी इन चर्चाओं की जानकारी लेते रहते हैं, जो शहर की सामूहिक स्मृति को जीवित रखती हैं।
पाटे न केवल संवाद के केंद्र हैं, अपितु सामाजिक सुरक्षा के द्वारपाल भी, जहां अजनबी को रोका जाता है और अपराधों पर नजर रखी जाती है, और इस प्रकार अपराध दर को न्यूनतम रखने में सहायक सिद्ध होती हैं।
यह आधुनिक डिजिटल संवाद के दौर में पारंपरिक मुखोन्मुखी संचार और व्यक्तिगत संपर्क की गरिमा को संरक्षित रखती है। पाटे पर होने वाली चर्चाएं सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देती हैं। इस प्रकार, पाटा संस्कृति बीकानेर की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाती है।
बीकानेर की पाटा संस्कृति मात्र एक स्थानीय परंपरा नहीं, अपितु सामाजिक संवाद की जीवंत धरोहर है, जो शहर की आत्मा को प्रतिबिंबित करती है। ये पाटे सिखाते हैं कि सच्ची प्रगति संवाद और एकजुटता में निहित है। आधुनिक जीवनशैली और शहरीकरण चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन बीकानेर के निवासियों की प्रतिबद्धता से यह संस्कृति जीवित रहेगी।
बीकानेर की यह अनमोल धरोहर चिरकाल तक फलती-फूलती रहे। यदि अवसर मिले, तो इन पाटों पर जाकर अनुभव कीजिए।

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