आशीष तिवारी, बलिया। “भूखे भजन न हो हूं गोपाला, लेलो अपनी कंठी माला।” यह कहावत किसी व्यंग्य से कम नहीं, बल्कि एक पीड़ा की व्याख्या है- एक ऐसी पीड़ा जो आज भारतीय युवाओं के मन में गहरी पैठ बनाए हुए है। जब पेट खाली हो, तो आदर्शों, नारेबाज़ी और वादों का कोई प्रभाव नहीं होता।
मोदी सरकार ने “स्टार्टअप इंडिया”, “मेक-इन-इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” जैसे सक्षम नारे दिए- इन पर युवा पीड़ा के स्वर के साथ भरोसा किया। दीर्घकालीन तैयारी, प्रतियोगी परीक्षाएँ, तकनीकी और उच्च शिक्षा- युवा अपने भविष्य की उम्मीदों से लैस थे। लेकिन अब, प्रगति, आत्मनिर्भरता और रोजगार की ये उम्मीदें धरातल पर झुकती दिखाई दे रही हैं।
आंकड़ों की भाषा साफ है। जुलाई 2025 में भारत की कुल बेरोजगारी दर 5.2% रही, जो जून में 5.6% पर थी। यह गिरावट उत्साह देने वाली है, फिर भी यह सतही सच है, क्योंकि इसके पीछे युवा वर्ग के लिए चुनौतियाँ कहीं गहरी हैं।
युवा (आयु 15-29) बेरोज़गारी दर Q1 (अप्रैल-जून 2025) में 14.6% दर्ज हुई, जिसमें महिलाओं का स्तर (16%) पुरुषों (14.1%) से भी अधिक था। जुलाई में स्थिति थोड़ी और उतार-चढ़ाव भरी रही- युवा बेरोजगारी दर गिरकर 14.9% पर आई, जून में यह 15.3% था।
लेकिन इस गिरावट के बावजूद, शहरी युवा बेरोजगारी दर चिंता का विषय बनी रही- 19% पर पहुँची, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 13% था इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि “रोज़गार के नारे” भूख की व्यथा को नहीं मिटा पाते। विशेषकर शहरी युवा, जो अधिक महँगी जीवनशैली और उच्च आशाओं के बीच जूझते हैं, उन्हें यह दर बहुत अधिक, बहुत बढ़ा हुआ महसूस होती है।
इसी बीच राज्यों की स्थिति अधिक चिंताजनक है। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में युवा बेरोज़गारी राष्ट्रीय औसत (14.6%) से कहीं अधिक रही। हिमाचल प्रदेश में यह दर 29.6% तक पहुँच गई, और शहरी महिलाओं के लिए यह भयावह 41.2% थी; पंजाब में 20.2%, और हरियाणा में 15.6% यह संख्या रही। यह दिखाता है कि समस्या सिर्फ राष्ट्रीय नीतियों की कमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक असंतुलन और विकास की असमानता का परिणाम है।
सरकार ने कुछ सकारात्मक पहल की छाप छोड़ी है- जैसे जुलाई 2025 में सुप्रीम बाज़ार आत्मनिर्भरता के लिए ELI (Employment-Linked Incentive) योजना मंज़ूर की गई, जिसके तहत ₹1 लाख करोड़ (~USD 11.7 बिलियन) की सहायता से अगले दो वर्षों में 3.5 करोड़ नौकरियाँ सृजित करने का लक्ष्य रखा गया है।
साथ ही Skill India जैसे मंच भी सक्रिय हैं, लेकिन PMKVY (Pradhan Mantri Kaushal Vikas Yojana) का प्रभाव सीमित रहा—अब तक 1.6 करोड़ से अधिक प्रशिक्षित युवाओं में से केवल 15% के आसपास ही रोजगार हासिल कर पाये हैं।
यह आंकड़े दिखाते हैं कि कौशल विकास पर सिर्फ प्रशिक्षण से काम नहीं बनेगा-उन प्रशिक्षणों के परिणाम स्वरूप वास्तविक रोजगार की दिशा में ठोस प्रयास और नीति-संगत मार्गदर्शन आवश्यक है।
जब युवा यह कहते हैं- “भूखे भजन न हो हों गोपाला…”- तो वह सिर्फ वाक्य नहीं, यह निराशा की पुकार है। पेट भरना, जीवन सुनिश्चित करना, भविष्य की चिंता हल करना- यही अब उनकी प्राथमिकताएँ हैं और जब तक इस गुंजारिश का उत्तर रोजगार, अवसर और आत्मनिर्भरता से नहीं होगा, तब तक यह व्यंग्य नहीं, बल्कि यथार्थ बने रहेगा।
हमारे युवा देश की रीढ़ हैं, उनकी पीड़ा लोकतंत्र की चेतावनी है। इसके बीच सरकार और संस्थाओं की जिम्मेदारी यह है कि वे आंकड़ों में सुधर लाएँ, योजनाओं को प्रभावी बनाएँ, और स्थानीय धरातल पर रोजगार निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएँ।
जब भूख मिटेगी, तब भजन की महिमा का मतलब भी गहरा होगा। तब यह वाक्य सिर्फ कहावत नहीं, राष्ट्र-निर्माण का मंत्र बन सकेगा।

(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)
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